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When the country is experiencing lot of policy confusion, resulting in disturbing number of scams all around and short changing core public sector industries, the policy enunciated by Late Rajiv Gandhi needs reiteration. A keen observer would find that the liberalisation initiated by Rajiv Gandhi is being distorted resulting in these scams. Keeping Rajiv’s leadership at the center, the following book in Hindi language (official language of the Union of India, Article 343 through 351 of the Constituion of India) povides the student of policital economy and management an excellent framework for leadership in India for the 21st century.

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License information for the book:

आर्थिक सुधारों का सूत्रधार राजीव गांधी by Madan Lal Gupta is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivs 3.0 Unported License.

 

आर्थिक सुधारों का सूत्रधार

राजीव गांधी

मदन लाल गुप्ता

विषय क्रम

पृष्ठ

आमुख                                                              ७

लेखक-परिचय                                                 ११

१            राज्य व्यवस्था का विकास                 १३

२            अपनी स्थिति                                     २०

३            सच                                                     २३

४            सफलता का मूल्य चुकाना                  ५७

५            िबरवान के पात                                ६०

६            फल-फूल                                            ६३

७           राजनीति की चाल                                ६५

८            उभरती स्थितियॉ                                ८१

९            स्पष्टवादी राजीव                                 ८३

१० राजीव हत्या के बाद ८५

११           कांग्रेस की मजबूरी                              ९३

१२            सोनिया की प्रासंगिकता                     १०१

१३            राजीव की भूलें                                    १२९

१४            २१वीं सदी के दूसरे चरित                    १३३

१५            कठपुतली नहीं नेतृत्व                         १४१

१६            भारतीय क्षमतायें                                १४६

१७           ब्रेन ड्रेन नहीं ब्रेन गेन                            १४९

१८            अब चूके तो फिर                                  १५५

१९            १६ मई २००९                                       १७६

२०           भारत २०५० विश्व                                 १८४

ज्ञान से ज्ञा

तक का सफर

जिनकी उँगली पकड़े तय किया

मातु-पिता-गुरु

तथा बन्धुजन को सादर समर्पित

 

आमुख


भारत में आर्थिक सुधारों का सूत्रधार कौन है? आर्थिक सुधारों का शुभारम्भ कब हुआ? 1991 में या उससे भी पहले? यह प्रश्न महत्वपूर्ण है । क्योंकि आये दिन किसी न किसी माध्यम से यह बात प्रचारित होती रहती है कि भारत में आर्थिक सुधारों का श्रीगणेश सन् 1991 में हुआ, जो कि सच नहीं है।

भारत में आर्थिक सुधारों का सूत्रधार राजीव गाँधी था जिसने आर्थिक सुधारों का सूत्रपात सन् 1985 में किया था जब औद्यौगिक लाईसेंस कानून में सम्मिलित उन वस्तुओं को, जिनके उत्पादन के करने के लिये लाईसेंस प्राप्त करना जरुरी था, (करीब 40% वस्तुओं के लिये) लाईसेंस लेने की अनिवार्यता ही समाप्त कर दी। दूसरे शब्दों में उन्हें डी-लाईसेंस कर दिया। ऐसा करने के लिये हिम्मत की जरुरत थी, चौड़ी छाती की जरुरत थी। लाईसेंस परमिट-कोटा व्यवस्था ने किस तरह लोगों की मति ही भ्रष्ट कर दी थी, यह भुक्त-भोगी जानते होंगे। राजीव के इस प्रयास को विफल करने की हर संभव कोशिश की गई। मैं स्वयं इसका साक्षी हूँ। मैं उस समय भारत सरकार के उद्योग मंत्रालय के सेक्रेटेरियट फॅार इंडस्ट्रीयल अप्रूवल में वतौर डिप्टी सैक्रेटरी तैनात था।

इतिहास के उस क्रांतिकारी मोड़ पर मैं आर्थिक सुधारों के शुभारंभ की नीति को क्रियान्वित करने के काम से व्यक्तिगत रुप से जुड़ा होने के कारण, सच को पाठकों के समक्ष रखने के लिये उत्प्रेरित होता रहा हूँ। कई बार लिखने की सोची फिर टाल गया, पर अंदर से उठी इस आवाज़ को ज्यादा दबा न सका। देर अवश्य हुई पर यह विवरण इस पुस्तक के रुप में आपके समक्ष है ।

पुस्तक लिखते समय, उसके प्रारुप की संकल्पना ने कुछ दूसरे पहलुओं को भी शामिल करने का प्रोत्साहन दिया। असल में आर्थिक सुधारों को शुरु हुए एक लम्बा अर्सा बीत चुका है। इस अवधि में देश के राजनैतिक जीवन और शासन में अनेक उतार-चढाव देखने को मिले है। तब आर्थिक सुधारों के सूत्रपात के पहिले के माहौल का जायजा लेना भी अनिवार्य हो गया। एक तरफ सूत्रपात पूर्व का सारा काल, दूसरी तरफ उसके बाद के समय – आर्थिक सुधारों के शुभारम्भ को केन्द्र में रखकर नेतृत्व के इस महत्वपूर्ण विषय पर मेरी कलम स्वयं कैसे चल पड़ी है, मैं नहीं जानता। बस इतना जानता हूँ कि मुझे जो आभास हुआ वह यह था कि नेतृत्व विशुद्ध भारतीय परम्परा में नायकत्व है। यहाँ केवल नेतागिरी झाड़ने वालों के लिये जनमानस में कोई स्थान ही नहीं है – वहाँ तो जो कुछ है नायक के लिये है। यही धर्म का शासन है, जिसे आज की दुनिया ‘न्याय का शासन’ या रुल ऑफ लॉ कह कर पुकारती है और केवल न्याय के शासन को ही स्वच्छ, हितकर और स्वस्थ मानती है।

इतिहास के लम्बे काल को, कम से कम पन्नों में समेटना ही मेरा प्रयास रहा है। चाहता तो मैं भी पुस्तक को पाँच सौ से भी ज्यादा पृष्ठों तक का विस्तृत आकार प्रदान कर सकता था। पर मेरी ईच्छा थी एक ऐसा ग्रंथ तैयार करने की जिसे प्रबुद्ध पाठक आसानी से एक या दो बार में सहज पढ़ जायें। आकार देख कर वे उसे उठा कर एक ओर न रख दें – यह सोचकर कि फिर कभी पढ़ेंगे। इसी उद्देश्य से कम-से-कम शब्दों में सभी आवश्यक राजनैतिक-आर्थिक-सामाजिक डेवलपमेंटस को, िबन्दुओं को, समेटने का प्रयास किया गया है।

स्वतंत्र भारत का इतिहास अपने आप मे बेेहद रोचक है। प्राचीन देश होने के कारण यहाँ राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और दूसरे सारे परिवर्तन बहुत धीमी गति से स्वीकारे जाते हैं। इस लम्बे इतिहास ने भ्रांतियों, अंधविश्वासों, कुरीतियों को स्थापित कर दिया है। नई चेतना पूरे समाज को नई दिशा में एक साथ ले जाने में सफल नहीं हो पाती है। कहीं गति बैल गाड़ी की मध्यम गति बनी रहती है तो कहीं एकदम हवाईजहाज की गति पकड़ लेती है। एक तरफ आज के महानगर हैं तो दूसरी ओर खेत-खलिहान-जंगलों वाला भारत है। विविधता का ऐसा उदाहरण अनूठा तो है, किन्तु विकास की प्रक्रिया को गति देने में सहायक नहीं। ऐसा नेतृत्व जो सभी वर्गो का सफल नेतृत्व कर सकें, विकसित करना पड़ेगा। यह केवल सेवा का अवसर है। जो ठान लेगा, उसकी जिंदगी इसी साधना में बीत जायेगी। व्यक्ति आत्मा से महात्मा तो वन जायेगा, श्री से ऋषि भी बन जायेगा, पर-विलास में लिप्त नहीं हो पायेगा। यह तो त्याग की अवस्था है, इकठ्ठा करने की नहीं। समय किसी के लिये रुकेगा तो नहीं। पर नेतृत्व वही कुशल कहलायेगा जो आने वाले समय की चाल का पहले से ही अनुमान लगा ले और वह भी सही-सही, जैसा कि लाईसेंस-परमिट-कोटा राज वाले भारतीय शासन तंत्र के समय में आर्थिक सुधारों की आवश्यकता के बारे में राजीव गांधी ने लगाया था, जो ईक्कीसवीं सदी की आहट 1985 में सुनने लग गये थे। अगर राजीव ने हिम्मत न दिखाई होती ओर आर्थिक सुधारों का सूत्रपात नहीं किया होता तो भारत आज वह आर्थिक शक्ति नहीं बन पाता, जिसके रूप में दुनिया आज उसे पहचानने लगी है। दिलचस्प बात यह भी है कि अभी तक किसी नेता का कद राजीव से बड़ा नहीं हुआ है। 2009 के चुनावों का इन्तजार मैंने यही सोचकर किया था कि शायद कोई ऐसा नेतृत्व उभकर आये जो आज की चुनौतियों का सामना करते हुऐ देश को तीव्रगति से हर तरह से शक्तिशाली और खुशहाल वना सके। मुझे अगले चुनाव का इन्तजार रहेगा।

आज लोग अपनी छवि बनाने के लिये प्रचार-कम्पनीयों का सहारा लेते है। समय की इतनी कमी है कि दृश्य और श्रव्य माध्यमों ने लगभग एकाधिकार ही स्थापित कर लिया है। जिससे व्यक्ति चाहते हुऐ भी पुस्तक पढ़ नहीं पाता है। पर तथ्यों को संजोकर रखना आवश्यक होता है। लेखक को सच की प्रस्तुति में तटस्थ रहना पड़ता है। उसके लिये न कुछ केवल स्तुत्य है, न निंदनीय।

इसलिये जो कुछ है जैसा बन पड़ा है, आपके समझ है। आशा ही नहीं विश्वास करता हूँ कि पुस्तक आपको रुचिकर लगेगी।

मदन लाल गुप्ता

वसंत पंचमी

सन् 2010

लेखक परिचय


मदन लाल गुप्ता का  जन्म 27 अक्टूबर 1946 को राजस्थान के करौली नामक स्थान पर हुआ था। उनकी शिक्षा करौली, कोटा और जयपुर में सम्पन्न हुई। बी.ए. में हिंदी तथा अंग्रेजी साहित्य के साथ राजनीति विज्ञान और अर्न्तराष्ट्रीय संबंध का अध्ययन किया। फिर 1967 में राजस्थान विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग से एम.ए. (अंग्रेजी साहित्य) किया। एम.ए. में अमरीकी साहित्य विशेष विषय के रुप में पढ़ा। उसके बाद एक वर्ष एलएल.बी. की पढ़ाई की। 1969 से राजस्थान ऐडुकेशनल सर्विस (कालेज) में लेकचरर-इन-इंगलिश पद पर अध्यापन किया। इस बीच आई.ए.एस. 1970 परीक्षा दी। उसके फलस्वरुप केन्द्रीय सचिवालय सेवा के सदस्य के रुप में 1972 में केन्द्र सरकार की सेवा में आ गये।

भारत सरकार के उद्योग, कल्याण और गृह मंत्रालयों में विभिन्न पदों पर जनसेवा करने का संतोष पाया। एक दशक तक भारत सरकार के संयुक्त सचिव के पद पर सेवा करके कुछ वर्ष पूर्व निवृत्त हुये।

सम्प्रति देश-विदेश की यात्रा का अनुभव समेटे, सम-सामयिक विषयों के साथ-साथ साहित्य रचना में संलग्न हैं।


1

राज्य व्यवस्था का विकास


यह एक भ्रामक धारणा है कि मार्क्सवाद पहली विचारधारा रही है जिसका अभीष्ट सरकार का विलुप्तीकरण है। व्यवस्था के हित में सत्ता या सरकार या शासन का किसी न किसी रूप में कायम रहना एकदम से नहीं नकारा जा सकता है। लेकिन स्वस्थ और सही विचारधारा के अंतर्गत, कुछ हद तक, ऐसा संभव है कि समाज का स्वरूप सरकार-विहीन हो।

विशुद्ध भारतीय विचारधारा के अनुसार कुछ व्यक्ति इस बात में विश्वास रख सकते हैं कि सरकार एक निरर्थक बुराई है, कि इसकी न तो आवश्यकता है और न ही उपयोगिता, कि सरकार की अनुपस्थिति में सुखी जीवन निर्वहन संभव है, कि स्वतंत्रता का भोग करना हो तो सरकार से दूर रहना ही बेहतर है। वरना जरा सी स्वतंत्रता के बदले सरकार की दासता महंगी पड़ सकती है। उसके लिए बेवजह टैक्स देने पड़ सकते हैं। न देने पर दण्ड दिया जा सकता है। दण्ड देने के लिए पुलिस और न्यायाधीशों को नियुक्त किया जायेगा। फिर शुरू होगा लम्बा सिलसिला कि क्या सही है, क्या गलत। क्या करना है, क्या नहीं। उन सबके ऊल-जलूल ताने-बाने में फंसकर आदमी जाल में फंसी मछली की तरह तड़प कर रह जायेगा।

पृथ्वी की स्थिति देखें तो पायेंगे कि करीब एक तिहाई जंगल है, एक तिहाई ग्रामीण अंचल है और शेष नगर प्रदेश है। जिन्हें स्वतंत्रता प्यारी है वो सरकार नहीं चाहते। उन्हें ट्राईबल कहा जाता है, किन्तु यह अभिव्यक्ति उचित नहीं है। न ही उचित है उन्हें जनजाति कहना। सत्य यह है कि समाज का यही अंश ऐसा है जो जाति जैसे शब्द तक से अपरिचित है। फिर क्यों हम उन्हें जाति के बंधन में बांधना चाह रहे हैं? क्या हम अपने आपको सभ्य-सुसंस्कृत कहकर उन्हें अपने से नीचे करके देखना चाहते हैं? इसीलिए उन्हें ट्राईबल या जनजाति कहते हैं जबकि उनका सही संबोधन है “आरण्यक”। कितना सुंदर शब्द है ये! किसी प्रकार का जाति बोधक नहीं है। किसी रेस वनाम जनजाति का द्योतक नहीं है। ये सम्बोधन है उनका जो अरण्य में रहते हैं, अरण्य में जीते हैं, अरण्य संस्कृति का भोग करते हैं। इनके लिए दूसरा सम्बोधन प्रयुक्त हुआ है “वनवासी”। वनवासी वे होते हैं जो वनप्रदेश में वास करते हैं | ये आरण्यक नहीं चाहते कि किसी भी प्रकार की सरकारी व्यवस्था इनकी जीवन शैली में खलल डाले, दखल दे। ये अपने हाल पर छोड़ दिये जाने की चाहत रखते हैं। ऐसा नहीं है कि ये समाज के अन्य प्रकारों से एक दम कट कर रहना चाहते हैं।

विपरीत इसके इन्हें एहसास है दूसरे तरह के समाजों का, उनके अस्तित्व का, उनकी जीवन शैलियों का। जिनका ये आदर करते हैं और चाहते हैं कि इनकी व्यवस्था का आदर दूसरे प्रकार के समाज भी करते रहें। यह व्यवस्था है आवश्यकता के अनुसार कम से कम सम्पर्क रखने की। यह बड़ा ही स्वस्थ चिन्तन है। ये आरण्यक दूसरों के प्रदेशों को हथियाने के चक्कर में नहीं रहते। ये कोई युद्ध नहीं करते। आज तक इन्होंने एक भी विश्व युद्ध नहीं छेड़ा है। ये धन का संग्रह नहीं करते। लालच में आकर वनों को नष्ट नहीं करते। जंगली जानवरों को नष्ट नहीं करते। सबके साथ सामंजस्य बिठाकर जीते हुए सह अस्तित्व का बेहद सुंदर नमूना पेश करते हैं। इनके पास जो कुछ शेष बच रहता है दूसरे समाजों तक पहुंचा देते हैं जिनसे ये अपनी आवश्यकता की वस्तुएं भी लेते हैं। इनको और ज्यादा सभ्य बनाने की क्या आवश्यकता है? किसको है? वो नहीं चाहते आपकी सरकार व्यवस्था, शासन तंत्र। वो खुश हैं आरण्यक रहकर। वनवासी का जीवन जी कर। उनकी सारी आवश्यकतायें प्रकृति पूरा कर देती है। पर आदमी है कि कभी उन्हें धर्म का पाठ पढ़ाता है, कभी राजनीति का, तो कभी अर्थनीति का। ये सिखाने वाले वो हैं जिनके अपने समाज में अदालतों में लाखों मुकदमे अनिर्णीत पड़े हैं। हजारों कत्ल सालाना होते हैं। चोरी ज्यादातर करते हैं, झूठ बोलने के नये-नये तरीके ईजाद करते हैं जिनमें सबसे ताजा है विज्ञापन व्यवस्था। तिस पर भी चले हैं वन प्रदेश को सरकार और न्याय व्यवस्था देने!

अरण्य या वन प्रदेश के बाद व्यवस्था का स्वरूप ग्राम व्यवस्था हुआ, जो आज तक कायम है। इसका प्रचलन खेती और पशुपालन के साथ हुआ। कुछ व्यक्तियों को वन प्रदेश का जीवन थोड़ा सा कठिन लगा तो झोंपड़ी डालकर रहने का प्रचलन बढ़ा होगा। यह गुफाओं-कन्दराओं-पेड़ों की खोलों से भिन्न तरीका था। पशु पालन शुरू हुआ होगा। कुछ व्यवस्था का स्वरूप उभरने लगा होगा। वन प्रदेश ही में गाँवों का जन्म हुआ होगा। किन्तु इनके विकास ने इन्हें अरण्य से भिन्न स्वरूप दिया। संभवतः वन प्रदेश और ग्राम प्रदेश एक दूसरे के पूरक बन गये होंगे। यह व्यवस्था ज्यादातर लोगों को स्वीकार्य रही होगी तो यह परस्पर निर्भरता आज तक भी बदस्तूर जारी है। इनकी विशेषतायें और गुण भी बहुत कुछ मिलते-जुलते हैं। यहां तक कि बहुत से शोधार्थी इनको भ्रमवश एक ही जैसा मान बैठते हैं।

ग्राम प्रदेश और वन प्रदेशों की आर्थिक स्थितियां अवश्य ही भिन्न रही हैं। वन प्रदेश प्राकृतिक सम्पदा के भंडार भी रहे हैं और खान भी। किन्तु ग्राम प्रदेश में वाणिज्य का प्रादुर्भाव हुआ है। यहां वन प्रदेश से मंगाई या लाई गई वस्तुओं का क्रय विक्रय होने लगा। सभी चीजों की खेती करना संभव नहीं है। जो वन प्रदेश से मिलता है, वहां से आता है। इसी प्रकार ग्राम प्रदेशों में भी कुछ अलग किस्म का उत्पादन होने लगा। जैसे कि कृषि के औजार, भंडारण का पात्र, वाहन इत्यादि। आधुनिक मुहावरे में ढालें तो यह तकनीकी विकास का शुरूआती दौर रहा है। अतः इन उत्पादों का वन प्रदेश में प्रवेश परिवर्तनकारी सिद्ध हुआ। पहले जिनको किसी प्रकार के औजारों आदि की जरूरत नहीं थी, वो धीरे-धीरे उनके अभ्यस्त बने और फिर आदी हो गये। इनमें एक ऐसा उत्पाद भी है जिसने जबर्दस्त क्रांति पैदा पर दी। वह था वस्त्र। जो आरण्यक निरावस्त्र रहता था, अब वस्त्र धारण करने लगा। जिसे बिना वस्त्र के कोई हीन बोध नहीं होता था, जिसके लिए यह स्वाभाविक था, जहाँ बिना वस्त्र रहते हुए कभी अपराध नहीं हुए, वहाँ वस्त्र पहुंच गये। वस्त्रों का सिला या बिना सिला होना, फैशनेबुल या सादा होना, आगे चल कर उसे ट्राईवल और जनजाति का दर्जा दिलवा देगा।

ग्राम्य प्रदेश में इस वाणिज्य से जन्मा व्यापार। व्यापार लाया धन सम्पत्ति और वैभव। इस सबको इकठठा करने के लिये जरुरत पड़ी नगरों की। नगर और कुछ नहीं केवल पक्के मकान और नागरिकों के रहने के स्थान थे। शुरू में इनका स्वरूप कोई सुनियोजित शहरीकरण नहीं था, वरना एक तो प्रमाण मिलता। इनका धीरे धीरे विकास हुआ। ज्यों ज्यों भवन निर्माण कला विकसित होती चली गई त्यों-त्यों नगर विकास उन्नति की ओर अग्रसर होता रहा। इसे पूर्णता प्राप्त हुई मशहूर नगरों और नगर राज्यों की स्थापना से। अन्ततः मनुष्य अरण्य से चलकर नगर तक पहुंचा तो वन संस्कृति से नगरीय संस्कृति के कीर्तिमान स्थापित किए। भारतीय सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक दर्शन ने इन तीनों स्वरूपों को ज्यों का त्यों ही स्वीकार किया। नगरों को ग्राम प्रदेश या वन प्रदेश पर किसी भी प्रकार के अत्याचार की शास्त्र अनुमति नहीं देते हैं। राजा नगर में ही वास करता था इसलिए उसके कर्तव्यों में से प्रमुख कर्तव्य ग्राम्य और वन प्रदेश की रक्षा करना, वहां के निवासियों की सुरक्षा का प्रबंध करना और वहां के निवासियों के सुख-दुःख का भागीदार बनना निश्चित किया हुआ था। नगर वासी नागरिक कहलाते थे, ग्राम्य वासी ग्रामीण और अरण्यवासी – आरण्यक। शासन व्यवस्था या सरकार का काम इनमें तालमेल बिठाये रखना है न कि एक के सुख वैभव के लिए दूसरे के शोषण का। यह संभव नहीं है कि सारा भूमंडल मात्र नगरीय हो जाये। न अब यह ही संभव है कि नगरी सभ्यताओं का लोप करके पुनः ग्राम्य या अरण्योन्मुखी व्यवस्था में बदल दिया जाये।

नगरीय सभ्यताओं ने मनुष्य जीवन पर जितने अत्याचार किए हैं उतने किसी ने भी नहीं। स्वयं प्रकृति ने भी आपदाओं या महामारीयों में इतने जीवन नहीं लीले होंगे जितने मार काट और युद्धों ने लीले होंगे। नगरों में मनुष्यों के झगड़े खत्म ही नहीं होते। एक समस्या सुलझती नहीं कि अनेक नई समस्यायें खड़ी हो जाती हैं। सभ्य समाज के शब्दकोष में अपराध सूचक जितने भी शब्द हैं वो आरण्यक संस्कृति में हैं ही नहीं – अर्थात वहाँ अपराध किए ही नहीं जाते। कोई भी उदाहरण उठाकर देख लें स्त्री-पुरुष संबंधों विषयक। नगरीय समाज का सारा धर्म स्त्री-पुरुष संबंधों से चलता है। धर्म बताता है कि क्या धर्माचरण है और क्या धर्म विरुद्ध। उसी की जमीन पर खड़ा है कानून का महल। जो आचरण आरण्यकों में एकदम नैतिक, धर्म सम्मत और कानूनन जायज है, वही नगरी व्यवस्था में कृत्रिमता के फलस्वरूप भटकाव का शिकार बन अपराध बन जाता है। तब कौन सी व्यवस्था ज्यादा सही है? ज्यादा सभ्य है? आरण्यक या नागरीय?

ऐसे में अगर अरण्यवासी किसी प्रकार की सरकार नहीं चाहें तो उन पर क्यों सरकार थोपी जाये? अगर उन्हें नगरवासीयों की सभ्यता पसंद नहीं तो उन पर वह व्यवस्था क्यों थोपी जाये? क्यों अपनायें आरण्यक किसी दुष्यंत का आरण्यक आश्रम की पवित्रता भंग करना या किसी रावण का अरण्य संस्कृति के नियमों का उल्लंघन या अतिक्रमण करके किसी स्त्री का अपहरण करना? यही है न नागरी संस्कृति अंततोगत्वा? है कोई एक उदाहरण जब किसी आरण्यक ने ऐसा कोई कृत्य किया हो? यह सिर्फ नगर संस्कृति ही सोच सकती है, सिर्फ सरकार या राजा या शासक ही कर सकता है। इसीलिए आरण्यक सरकार की जरुरत को सिरे से नकारता आया है, चाहे उसका स्वरूप राजतंत्री, प्रजातंत्री या सर्वहारा का अधिकनायकतंत्री ही क्यों न दर्शाया गया हो। आरण्यक को न सरकार चाहिए, न संस्कृति, न सभ्यता। चाहिए तो केवल अपना आरण्यक प्रदेश। निर्द्वन्द्व, निर्बाध, निर्विघ्न!

वन प्रदेश के भ्रमण पर राजा इस प्रकार जानकारी लेता था : तुम्हारे वन तो सुरक्षित हैं? वनवासी सुखी तो हैं? कोई उन्हें सताता तो नहीं है? उनके अरण्य की शांति तो भंग नहीं करता? उनकी जीवन पद्धति में विघ्न तो नहीं डालता? वन प्रदेश में कोई उपद्रव तो नहीं करता?


2

अपनी स्थिति


भारत एक प्राचीन राष्ट्र है जिसमें नगरीय, ग्रामीण और आरण्यक सभी प्रकार की जीवन शैलीयां पनपती आ रही हैं। देश में इनके योगदान से एक समृद्ध संस्कृति विकसित हुई है जिसने भारत को विश्व की मशहूर संस्कृतियों में शामिल कर दिया था। इतने उदार और सुसंस्कृत राष्ट्र के वैभव ने सभी प्रकार के तबकों को आकृष्ट किया था। एक ओर इससे सांस्कृतिक आदान-प्रदान से आपसी विकास के नये-नये अवसर मिलते गये, तो दूसरी ओर कुछ दुष्ट प्रकृति के लोगों ने उस देश की संस्कृति पर हिंसात्मक आक्रमण भी किये। आज विश्व जिस आचरण को आतंकवाद कह रहा है, मध्यकाल में उसी तरह का दुराचरण भारत के साथ हुआ। फलतः एक उदार, सभ्य और सुसंस्कृत राष्ट्र पराधीन भी हो गया। पराधीनता के उस दारुण समय को चुनौती देता भारत एक बार पुनः ऐसी ताकतों का सामना करने को उठ खड़ा हुआ। आंदोलन लंबा तो चला, क्योंकि मोहनदास करमचन्द गाँधी जैसे विचारक, कूटनीतिज्ञ, राजनीतिज्ञ, दूरदर्शी व्यक्तित्व के अनूठे नेतृत्व में भारत ने अहिंसा का मार्ग ही चुना। संभवतः ऐसा कुशल और दक्ष नेता किसी देश में सदीयों में ही जन्मता हो! वल्कि गाँधी जैसा नेता तो मानव समाज की धरोहर होने के कारण युगों-युगों में ही जन्मता हैं। 1947 में भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बनकर पुनः विश्व समुदाय के समक्ष खड़ा हुआ। संविधान ने उसे सार्वभौमिक जनतंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया।

देश का सौभाग्य था कि उसे जवाहरलाल नेहरु के रूप में एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला जिसने देश को प्रगति के पथ पर आगे ले जाने का बीड़ा उठाया। कृषि प्रधान देश में औद्योगीकरण एक अहम आवश्यकता थी। पूंजी, साधनों, कौशल, तकनीक, यंत्र इत्यादि की कमी के कारण शुरू में उस ओर गति धीमी ही रही। प्रारम्भ अच्छे और नेक इरादों से हुआ। नेहरु और उनके कुछ विश्वसनीय लोगों का सहयोग प्रशंसनीय रहा किन्तु उतने से ही लोग तो सब कुछ नहीं थे। भारत जैसे विशाल देश में गणतांत्रिक प्रणाली में राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण थी। उस वजह से केन्द्र की सोच और राज्यों की सोच भिन्न-भिन्न रही। जो काम योजनावद्ध तरीके से करने की ठानी थी वही अवरुद्ध होने लगा। योजनावद्धता की आड़ में उद्योगीकरण पर अनावश्यक बंधन लगाये जाने लगे। बजाय इसके कि उद्यमी को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान करने वाला माना जाता, उसे शक की नजर से भी और हेय दृष्टि से भी देखा जाने लगा। उद्यमी और औद्योगीकरण पर इतने अंकुश लग गये कि नये भारत को विश्व संगठनों के सामने एक उद्योग अवरोधी राष्ट्र माना जाने लगा जहाँ कोई भी विदेशी निवेश करने से कतराता था। वातावरण इस कदर घुटने लगा कि आर्थिक सुधारों की मांग वढ़ने लगी। यह मांग इतनी बढ़ गई कि यूनीडो और विश्व बैंक जैसे संगठन भी सुधारों की मांग करने लगे। आर्थिक सुधार भारत में औद्योगीकरण की एक आवश्यक शर्त बन गये।

शीत युद्ध के समाप्त होने के आसार बन चुके थे। पूंजीनिवेश और औद्योगीकरण दुनिया के विकासशील देशों को गरीबी, भुखभरी और बीमारी से नजात पाने का एकमात्र उपाय दिखने लगा। विश्व परिदृश्य में हो रहे उस परिवर्तन का प्रभाव भारत में पड़ना अपेक्षित तो था, पर पड़ नहीं रहा था। औद्योगीकरण के रास्ते में बाधायें खड़ी करने बाली ताकतों के निहित स्वार्थ ऐसा होने नहीं दे रहे थे। देश की मांग थी। पर राजनीतिक स्तर पर सिंहासन पर िबराजमान ताकतें ऐसी सोच के लोगों को कोसों दूर रख रही थी। तभी एक दुखद घटना घटी : 1984 में श्रीमती इंदिरा गाँधी की नृशंस हत्या कर दी गई थी। राजनीति से दूर रहने वाले उनके ज्येष्ठ पुत्र राजीव गाँधी को उनके स्थान पर भारत का प्रधान मंत्री बनाया गया। युग तो बदला, पर शासन तंत्र को अभी बदलना था। निहित स्वार्थ सांस रोके आँख गड़ाये हुए थे कि वे अपना अगला कदम देख-सोच कर उठायें। और फिर?


3

सच


यह एक भ्रम जाल है कि भारत में आर्थिक उदारीकरण का सूत्रपात 1990 के दशक में हुआ। जबकि सच यह कि 1990 का दशक पीछे नहीं लौट सकता था, आर्थिक तंत्र की जकड़न की तरफ पुनः जा ही नहीं सकता था। उसके पास अगर कोई विकल्प शेष था तो वह था सिर्फ आगे बढ़ना। कुशल राजनीतिज्ञ वही है जो समय की चाल को भांप सके और अपने आप को उसके अनुसार ढाल ले। ऐसा ही राजनीतिज्ञ अपने राष्ट्र की हर छोटी बड़ी उपलब्धि को अपने खाते में डालकर अपनी कीर्ति का ढिंढोरा पिटवाता  है। ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं होती है जो किसी भी राजनीतिज्ञ के ऐसे अविद्यमान गुणों का गुणगान करने को उद्यत ही नही रहते अपितु एक दूसरे से स्पर्धा में भी जुट जाते हैं। इधर राजनीतिज्ञ की कुशलता का प्रमाण यही है कि वो सारी असफलताओं का ठीकरा किसी दूसरे के सिर पर फोड़ दे। जिसमें उसकी भी सारी असफलतायें, अदूरदर्शितायें भी शामिल कर दी जाती हैं। आर्थिक उदारीकरण के श्रेय और आलोचना को लेकर भी कुछ ऐसा ही हुआ है।

उदारीकरण का जायजा लेने से पहले लाईसेंस परमिट राज का थोड़ा सा दर्शन कर लेना जरुरी है। किसी भी प्रकार के उद्योग की स्थापना से पहले केन्द्र सरकार से एक औद्योगिक अनुमति पत्र या लाईसेंस प्राप्त करना आवश्यक था। औद्योगिक (विकास एवं नियामन) अधिनियम 1952 के अन्तर्गत वे सब प्रावधान विहित थे जिनके रहते हुए किसी भी उद्यमी या उद्योग इकाई को स्थापना करने या उत्पादन करने से पहले एक लाईसेंस प्राप्त करना आवश्यक था और उदारीकृत व्यवस्थाओं को छोड़कर आज भी है। इस अधिनियम में एक अनुसूची लगी हुई है जिसमें ज्यादातर उद्योगों को सूचीवद्ध किया गया है। यह सूची एक प्रकार से मौटे तौर पर औद्योगिक उत्पादों की सूची है, विस्तृत नहीं। इनके अन्तर्गत कोई गतिविधि आती है या नहीं, उसके लिए लाईसेंस लेना है या नहीं, इसका निर्णय केन्द्र सरकार करती थी।

आगे बढ़ने से पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ‘‘केन्द्र सरकार’’ का मतलब कुछ भी, कोई भी, सब कुछ हो सकता था। इसके लिए केन्द्र सरकार का संगठनात्मक ढांचा समझना पड़ता था, जो किसी उद्यमी या कम्पनी के लिए उतना आसान नहीं था। खासकर ऐसे समय में जब न तो इंटरनेट था, न मंत्रालयों की वेबसाईट बनी थी और न इंडिया पोर्टल था। लिहाजा उद्योग/उद्यमियों को यह सूचना देने के लिए लियाजन या सम्पर्क साधने वालों की एक बड़ी फौज केन्द्र सरकार के मंत्रालयों में तैनात हो गई थी जो अपने सम्पर्क की हैसियत से सभी भवनों में चक्कर लगाती रहती थी। इधर केन्द्र सरकार के हर उस व्यक्ति से जो लाईसेंस के आवेदन पर कुछ भी लिखने या बोलने का अधिकार रखता था, कुछ आपत्ति किया जाना एक तरह का रिवाज था। नतीजा दसीयों साल तक आवेदन अनिर्णीत पड़े रहते थे। अक्सर खो जाते थे। आर्थिक और औद्योगिक विकास अवरुद्ध हो गया था।

एक और जरुरी पहलू। एक आवेदन एक दर्जन से भी ज्यादा विभागों को उनके मत जानने के लिए भेजा जाता था। पुनः जिस दफ्तर में आवेदन गया होता था वहां भी उसे एक लम्बी श्रंखला या चेन से गुजरना पड़ता था। फिर सबके मत जानकर मामला एक समिति के समक्ष जाता था। वहाँ से सभी का अनुमोदन लेने के बाद आवश्यक हुआ तो मंत्रिमंडल के विचारार्थ भेजा जाता था। इस प्रक्रिया में पेचीदगी अक्सर आती थी क्योंकि विदेशी पूंजी अथवा एकाधिकार कानून के तहत पंजीकृत कंपनियों के लिए यह प्रक्रिया कुछ ज्यादा ही कठिन होती थी। कभी कभी तो ऐसा भी होता था कि जिन लोगों ने किसी औद्योगिक उत्पाद को देखा या छुआ भी नहीं था वो इस बात पर टीका टिप्पणी करते थे कि किस आवेदक को लाईसेंस दिया जाना चाहिए और किस को नहीं। एक तरह से बहुत अच्छे अच्छे आवेदन कुछ उसी तरह घिसटते रहते थे जिस तरह जायदाद के मुकदमें अदालतों में चलते रहते हैं। हालात का अंदाजा उस छोटे से मुकदमें से लगाया जा सकता है जो एक अचार पापड़ बेचने वाले व्यक्ति को लाईसेंस दिलवाने का झांसा देकर ठगने का था। इसके लपेटे में धर्म से लेकर राजनीति से संबंधित रहनुमा भी आ गये थे। यह हुआ करती थी लाईसेंस की वैल्यू उस जमाने में, जिसे आप प्री-लिब्रलाईज़ेशन काल कह सकते हैं। यह भी अंदाज लगाईयेगा कि कितनी ऊंची हैसियत होती थी हर उस आमो-खास की जो किसी तरह लाईसेंस जारी होने की प्रक्रिया से जुड़ा होता था। आज आप हँस सकते हैं पर सच यह है कि लाईसेंस का लिफाफे से उसी प्रकार निकल जाना जिस प्रकार कंस के कारागृह से बालक कृष्ण का निकल जाना तय था। यह एक फायदे की हरकत हुआ करती थी, जिसमें लाईसेंस आवेदक तक पहुंचे या न पहुंचे, रिवार्ड स्कीम पर निर्भर करता था। ठीक व्यवस्था में वह हवाई यात्रा कर सकता था अन्यथा दिल्ली में किसी नाले में बिना नाव के नौका विहार का आनन्द ले सकता था।

उदारीकरण में रुचि रखने वालों को इतना सा ऐतिहासिक यथार्थ जान लेना जरुरी है। क्योंकि उदारीकरण का अर्थ होता है इस मजबूत और विस्तृत व्यवस्था को नष्ट करना। इस व्यवस्था से हजारों लोगों का पेट पल रहा था, शान शौकत बढ़ रही थी, रुतबा हुआ करता था, औहदा और कद जाना जाता था, रसूकात बढ़ते थे। दबदबा हुआ करता था, सरकार पर या शासन तंत्र पर मजबूत पकड़ हुआ करती थी। इतने लोगों के पेट पर एक साथ लात मारना आसान नहीं था, खतरों से खेलना था। इतने स्वार्थ एक साथ नष्ट नही किए जा सकते थे। फिर लाईसेंस कोटा, परमिट राज सब कुछ जनता के हित में तो चल ही रहा था! यह हमारे समाजवादी दर्शन को कार्यरूप देती आर्थिक /औद्योगिक नीति का कार्यान्वयन ही तो था! जबकि उदारीकरण इस नीति का ठीक उल्टा था। हमारी सारी लाईसेंस व्यवस्था इस बात पर अधिक ज़ोर देती दिखती थी कि कैसे औद्योगीकरण रोका जाये या धीमा किया जाये और किस तरह उद्यमियों के रास्तें में रोड़े अटकाये जायें। पूंजी की कमी, विशेषकर विदेशी मुद्रा की कमी ने हमारे योजना विशेषज्ञों को पूंजी का नियामन करने की ओर प्रेरित किया हुआ था। लेकिन राष्ट्र की आवश्यकताओं को लम्बे अर्से तक राजनैतिक विचारधारा और उससे प्रभावित आर्थिक विचारधारा के हाथों बन्धक बनाकर रखना मुश्किल हो रहा था। इस कसमसाहट को अभिव्यक्ति दे रहा था आर्थिक पत्र-पत्रिकाओं का चिन्तन-विश्लेषण। किन्तु इस मकड़जाल में से कोई भी बाहर निकलने का रास्ता नहीं सुझा पा रहा था।

दरअसल हमारा राष्ट्रीय नेतृत्व उन हाथों में था जो सोचने में सक्षम बहुत थे किन्तु मकड़जाल की सीमाओं में बंधे थे। जबकि आवश्यकता थी किसी ऐसे नेता की जो छाती ठोककर इस मकड़जाल से बाहर निकलने की उद्घोषणा कर सके। ऐसा नेतृत्व न दायें हाथ के पास था न बायें हाथ के पास। न बीच की डगर पीटने वालों के पास। कारण कि ये सब स्वतंत्रता संग्राम की रोमांचक स्मृतियों में ही डूबते-उतरते रहते थे। उसके बाद की सोच ही उनका मार्ग दर्शन कर रही थी। जबकि देश ही नहीं विदेशों में भी स्थितियां बड़ी तेजी से बदल रही थी। देश में अपने आपको प्रगतिशील ताकतें कहने वाले और दूसरों को प्रतिक्रियाशील बताने वाले – सभी ने लोगों को निराश कर दिया था। लोगों का विश्वास राजनीतिक नेताओं और उनके दलों पर से उठ गया था। जनता विभ्रम की स्थिति में थी। चुनावों में नये-नये प्रयोग करने लगी थी, चन्द गुनहगारों को जनता अब यह अधिकार नहीं देने वाली थी कि वो देश में इमरजेंसी थोप दें और उसका ठीकरा इंदिरा गांधी के सिर पर मढ़ दें। जनता जाग चुकी थी। सब को जांचने परखने लगी थी। इसीलिए एक बार फिर से इंदिरा गांधी को सत्ता में ले आयी थी। इस जनक्रांति ने खतरनाक ताकतों के मंसूबों पर पानी ही फेर दिया था। यह तो नेपथ्य में बैठे लोग नहीं चाहते थे। पहले ही जवाहरलाल नेहरु के बाद इंदिरा गांधी ने सारी कैलकुलेशन निरर्थक कर दी थी। लोगों ने तो सोचा था कि पुरुष वारिस (यानि लड़का) न होने के कारण नेहरु के बाद सत्ता स्वतः ही उनके हाथों में आ जायेगी। यानी कोई संघर्ष भी नहीं करना पड़ेगा। पर हो गया कुछ उल्टा ही। भारतीय सोच स्त्री को वारिस नहीं स्वीकारती। मैं साठ के दशक की बात कर रहा हूं। तभी तो उन दिनों का एक प्रिय विषय पुस्तकों, पत्रिकाओं, दैनिक समाचार पत्रों में हुआ करता था कि नेहरु के बाद कौन? फिर जब इंदिरा आ ही गई तो जरा जायजा लीजिये उनका स्वागत किस तरह किया गया : गूंगी गुड़िया, चलो सुबह के अखबारों में एक ताजा चेहरा तो देखने को मिलेगा। आगे चलकर इंदिरा में ताजा चेहरा देखने और ताजा दिमाग न देखने वाले उनमें ”देवी”, “दुर्गा”, ”आयरन लेडी” और न जाने क्या क्या देखेंगे। इंदिरा के सत्ता पर मजबूती से काबिज होने के बाद नेपथ्य की इन ताकतों को अपना रुख बदलना तो पडा, मगर नीयत नहीं बदली। नतीजा यह हुआ कि 1980 में इंदिरा का दूसरा राजनैतिक जन्म इन्हें कतई रास नहीं आया। खास कर इसलिए भी कि उसके वारिस दो नौजवान लड़के थे। इसलिए अब कुछ न कुछ तो करना ही था। किसी दुष्ट को जल्दी ही सफलता मिली और इंदिरा पर दूसरा गहरा आघात किया – उसका प्यारा छोटा बेटा हत्यारों की हविश का अकाल ही शिकार बन गया। क्या साजिश थी और उसे किसने अंजाम दिया कोई नहीं जानता।

एक उम्मीद थी कि इस दुःख से इंदिरा टूट जायेगी। बड़ा लड़का राजनीति में रुचि ही नहीं रखता। उसकी पत्नी राजनीति के सख्त खिलाफ थी। बल्कि बातें तो यहां तक कहीं जाती थी कि “सोनिया ने कह दिया है कि अगर राजीव राजनीति में कूदे तो मैं इटली चली जाऊंगी”। इस सबसे एक बार लोगों को अपने मंसूबे पूरे होने की उम्मीद हुई। पर उन्हें फिर निराश होना पडा, क्योंकि इंदिरा जुझारू व्यक्तित्व की महिला थी, जो न गूंगी थी, न गुड़िया थी और न केवल चेहरा थी। उस व्यक्तित्व को आर्शीवाद ही नहीं, सानिध्य मिला था ऐसे मनीषीयों का जो प्रातः वंदनीय है : मोतीलाल नेहरु, जवाहरलाल नेहरु, महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, महामना मदन मोहन मालवीय, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि और भी अनेक। जनता के विश्वास पर खरी उतरने के लिए इंदिरा गांधी ने अपने प्रिय बेटे राजीव को राजनैतिक जिम्मेदारी सम्हालने के लिए प्रेरित किया। राजीव अपने एक छोटे से सुखी परिवार में अति प्रिय पत्नी और प्यारे छोटे-छोटे बच्चों प्रियंका और राहुल के साथ हँसी-खुशी जीवन यापन कर रहे थे। परिवार के भरण-पोषण हेतु वो विमान के पायलट की नौकरी करते थे। राजनीति के दांव-पेंच, उठा-पटक, ऊबड-खाबड़ तौर-तरीके उन्हें कतई पसन्द नहीं थे। जो आदमी बचपन से राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के चरित देखता आया हो, उसे राजनीति से वितृष्णा हो जाना स्वाभाविक ही है। फिर भी आज्ञाकारी पुत्र ने माँ के आदेश का पालन करते हुए राजनीति में प्रवेश कर दिया। यह विशुद्ध भारतीय वैचारिकता है कि व्यक्ति परिवार के लिए अपने, ग्राम्य के लिए परिवार के और राष्ट्र के लिए ग्राम्य के हितों की बलि दे दे।

स्थितियां तभी से बदलती जा रही थीं। शीत युद्ध का अन्त हो रहा था। विश्व स्तर पर धड़ेबाजी का स्वरूप बदल रहा था। दोस्त दुश्मन और दुश्मन दोस्त बनने लगे थे। देश में भी इंदिरा के इस नये पैंतरे ने जानी दुश्मनों को बचपन के दोस्त बना दिया था। कब से डाईनेस्टिक रुल खत्म करने की मुहिम चल रही थी, पर सफलता हाथ नहीं लग रही थी। इधर उम्र ढलने लगी थी। अगर अब कुछ नहीं हुआ तो फिर कुछ नहीं होगा। दिल्ली में शातिर दिमागों की कमी तो है नहीं। पूरे देश से सप्लाई आती है।  अपने आपको खुदा से बढ़कर समझने वालों ने सोच विचार कर नतीजा निकाला की राजीव को निशाना बनाना ठीक नहीं है क्योंकि “बछड़े का मुंह बन्द किए” ज्यादा लम्बा समय नहीं हुआ है। इसलिए राजीव को पहुंचाई गई क्षति शक की सूई अवश्य ही उनकी ओर मोड़ देगी। लिहाजा आवश्यक था कि गाय का ही मुंह बन्द कर दिया जाये। सो वैसा ही किया गया – इंदिरा गांधी को उन्हीं के घर पर गोलियों से छलनी कर दिया गया। पर आश्चर्य – उनके इर्द-गिर्द मंडराने वाले किसी भी भाई-बहन को एक खरोंच तक नहीं आई, जबकि वो लोग इंदिरा को चारों तरफ से ऐसे घेरे रहते थे कि मजाल है इंदिरा के बदन को हवा भी छू जाये। उसके लिए भी हवा को उनसे पहले अनुमति लेनी होती थी। अपाईन्टमेन्ट लेना होता था।

इस आकस्मिक घटनाक्रम ने भारत को वह नेतृत्व दे दिया जिसकी उसे तात्कालिक आवश्यकता थी। नेतृत्व परिवर्तन किसी न किसी घटनाक्रम के ही कारण होते हैं, फिर वो घटनाक्रम चाहे दुखद ही क्यों न हो। जैसा कि इस अवसर पर था। किन्तु इस अप्रत्याशित परिवर्तन ने सारी योजनाओं को धराशायी कर दिया। धुरन्धर उस्ताद लोग इसके लिए तैयार नहीं थे। लेकिन इसे रोकने में सक्षम भी नहीं थे। अलबत्ता कोशिश पुरजोर हुई थी और प्रयास होते ही रहे, जो आगे चलकर ट्रैजिक नतीजे पेश करने वाले थे। एक तरह से बुरी नजर वाले की काली नजर की साढ़े-साती।

इसलिये राजीव का स्वागत उपहास के गुलदस्तों से किया गया। एक सम्मानीय राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका में उन्हें “मिस्टर क्लीन” कहकर छापा था। किसी और ने उन्हें यंगमैन इन ए हरी (यानी जल्दी में एक नौजवान) के खिताब से नवाजा, तो कुछ ज्यादा ही समझदारों ने उन्हें “बावा लोग” कहकर कुछ वैसा ही विचार व्यक्त किया जो ठीक बीस बरस पहले उनकी मां को “गूंगी गुड़िया” कहकर किया गया था।

इन सभी संबोधनों की अगर राजनैतिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक व्याख्या की जाये तो हम  1947 से 1984 तक के भारतीय राष्ट्रीय राजनैतिक, संवैधानिक, प्रजातांत्रिक, आर्थिक, प्रशासनिक और भ्रष्टाचार से जुड़े संपूर्ण इतिहास को लिपिबद्ध कर सकते हैं। यहां संकेत के लिए मिस्टर क्लीन संबोधन को ही लिया जा रहा है। भ्रष्टाचार एक अकेला ऐसा शब्द है जिसने लाखों के वारे-न्यारे कर दिये थे। जिन्हें 1947 तक खाने के लिए चने नसीब नहीं थे वे केवल राजनीति करके पिस्ते से कम कोई चीज नहीं खाते थे। भ्रष्टाचार के पंचाक्षर का उच्चारण करके कितने ही के राजनैतिक कैरियर बन गये। लोग विधायक, सांसद ही नहीं मंत्री तक बन गये। ये दूसरी बात है कि उनकी छ्त्र-छाया में भ्रष्टाचार को पनपने का जैसा मौका मिला वैसा केवल कलियुग को राजा परीक्षित के मुकुट में जड़ जमाने पर मिला था। मूंदड़ा काण्ड से लेकर बड़े-बड़े कमीशनों की रिपोर्ट, केंद्रीय सतर्कता आयोग की स्थापना, स्पेशल पुलिस का सी.वी.आई. के रूप में अवतरण, भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम का लागू होना – सब कुछ भ्रष्टाचार के प्रभाव, प्रभुत्व, विस्तार की कहानी कहता है, जिसे राजनीति प्रकोप कहकर भुनाती चली आ रही है। ऐसे में कोई सचमुच का मिस्टर क्लीन, जो एक अनुभवहीन नौजवान हो, काफी खतरा साबित हो सकता था। ऐसे में भीतरघात का अस्त्र अचूक साबित होना था। बोफोर्स नामक जिन्न अभी बोतल के बाहर है। उसे उसके आकाओं ने सही समय पर बाहर निकाला था, मिस्टर क्लीन की असलियत जाहिर करने के लिए। पर असलियत यह थी कि, उसे अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया गया था। जो दिल्ली के वातावरण से वाकिफ हैं, वो अच्छी तरह जानते हैं कि किसी भी भले मानस के मुंह पर कालिख मलने के लिए यहाँ विशेषज्ञ भारी मात्रा में उपलब्ध हैं। वरना कोई बताये कि क्या एक दिन में बोफोर्स जैसा घोटाला घट सकता है? क्या सीधे प्रधानमंत्री किसी भी प्रकार के खरीदने या बेचने का आर्डर देते थे, देते हैं या देंगे? क्या तत्कालीन रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री इन सौदों से कतई अनभिज्ञ थे? तो क्या कर रहा था उनका रक्षा मंत्रालय का आंतरिक वित्त सलाहकार? क्या उसने वित्त सचिव को तथ्यों की समय-समय पर जानकारी दी थी? क्या वित्त सचिव ने वित्त मंत्री को सूचना दी थी? क्या वित्त मंत्री के हाथ ऐसा भेद लग गया था जिससे राजीव से आसानी से मुक्ति पाई जा सके? या फिर इस सारे घोटाले को बड़े शातिर तरीके से अंजाम देकर राजीव को फंसाया गया, जो अपने वित्त मंत्री पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करते थे? क्या राजीव को बहलाया, फुसलाया, बहकाया गया कि सब ठीक-ठाक हो रहा है? क्या वित्त मंत्री ने समय पर अपना विरोध लिख कर दर्ज कराया था? क्या ओवररूल किए जाने पर वित्त मंत्री ने अपना इस्तीफा दिया था? या फिर नदी में भँवर तक जानबूझ कर राजीव की  नॉव ले जाकर उसे डुबोने का षडयन्त्र रच लिया गया था?  इन प्रश्नों को मिस्टर क्लीन से जोड़कर देखेंगे तो काफी दिलचस्प विवेचनाएं सामने आयेंगी।

ज्ञातव्य हो कि भ्रष्टाचार नियंत्रण के उद्देश्य से नेहरू जी एक खतरनाक खेल साठ के दशक में कामराज प्लान लाकर खेल चुके थे जिसके कारण बहुत सी महत्वाकांक्षाओं के दीए जलते-जलते बुझा दिए गए थे। जो कामराज प्लान की भेंट चढ़े, वो फिर कभी नहीं पनपे। जबकि वो सबके सब दिग्गज कांग्रेस सत्रप थे। अपने अपने प्रदेशों के मालिक थे। उसके बाद इंदिरा जी ने प्रिवी पर्स समाप्त करके सामन्तशाही सोच को झकझोर दिया था। ऐसे तो राजे-महाराजों ने सचमुच त्याग और बलिदान किया था कि उन्होंने हैदराबाद की तरह बखेड़ा खड़ा नहीं किया, पर देश की प्रजातांत्रिक विचारधारा उससे मेल नहीं खा रही थी। इंदिरा जी का यह प्रहार कांग्रेस में जड़ जमा चुके सामंतवाद पर ज्यादा था जिसके कारण दो बैलों की जोड़ी टूट गई, हल छूट गया और खादी पर तरह-तरह का रंग चढ़ने लगा था। सत्रपों को उनके कद में रखने के लिए यंग टर्क्स तक का कद छोटा कर दिया गया। 1971 में इंदिरा जी ने अपनी लीडरशिप मजबूत कर ली थी। पर उन्हें कमजोर करने के लिए पुरजोर कोशिशें रंग लाई तब जब इमेरजेन्सी लगाई गई। अपनी प्रिय नेता प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी नेहरु से लोगों को ऐसी उम्मीद नहीं थी। इस एक कुचाल ने उन्हें क्षण भर में जनता के तिरस्कार और घृणा का पात्र बना दिया। जनता ने अपना रोष प्रकट किया उन्हें सत्ता से हटाकर। फिर जब जन आक्रोश थमा और इंदिरा जी ने जन भावनाओं को समझा परखा तब वो पुनः उनका प्यार और विश्वास पाने में सफल हुई। इस बार देश की 80 करोड़ जनता का स्थान लिया चन्द षडयन्त्रकारियों ने और उन्हें रास्ते से अलग कर दिया।

पर ये मिस्टर क्लीन तो सारी उम्मीदों पर पानी फेरने वाले थे। इनके तो एक पुत्र भी था। यानी 40 साल की उम्र में प्रधान मंत्री बन कर 20-25 साल तो कम से कम खुद राज करेंगे और उसके बाद बेटा। इतने में तो महत्वाकांक्षी ही नहीं उनकी अगली पीढ़ी भी अन्धकारपूर्ण भविष्य देखने लगी। पर एक ही उपाय से सारे दुश्मन नहीं मारे जाते। अलग-अलग तरीके राजनीति अपनाती ही है। मिस्टर क्लीन का यह खिताब राजीव के लिए आगे चलकर भारी पड़ने वाला था, क्योंकि इसके पीछे की नीयत को नहीं समझा गया था। दिल्ली की राजनीति राजीव के मंच (सीन) पर अवतरित होने तक इतनी तो कुटिल (साफिस्टीकेट) हो चुकी थी कि कहा कुछ जा रहा था और इरादा कुछ और होता था। कामराज योजना से पीडित राजनीतिज्ञों में से कोई दुबारा बेवकूफ नहीं बनना चाहता था मिस्टर क्लीन के सफाई अभियान या क्लीनिंग ऑपरेशन से। तो काजर कोठरी से जैसे कितना ही चतुर होने पर बिना कालौच लिपटाये हुए निकलना असंभव है वैसे ही राजनीति की कजरारी काली कोठरी से बच निकलना भी संभव नही है। मीडिया ऐसी खबर लपकता है और जनता उसका स्वाद लेती है। इसलिए मिस्टर क्लीन की उक्ति अचूक प्रहार करने की शक्ति रखती थी।

राजीव ने जब राजनीति में प्रवेश किया तो राजनीति पूरी तरह दूषित हो चुकी थी। ऐसे में राजीव का भारतीय राष्ट्रीय राजनीति में शुद्ध आचार-विचार लेकर प्रवेश करना तूफान खड़ा करने जैसा है। यह बवाल तो खड़ा करता ही, जलजले का सबब होता। भारतीय राजनीति इस दौर में एक तरह की खंडित वृत्ति की शिकार बन चुकी थी। यहां विचारों में तो ऐसी शुद्धता थी कि देश-दुनिया में कहीं उसका सानी नहीं था। ख्यालात बेहद उम्दा थे। प्लान जन हितकारी थे। कानून हो, चाहे पॉलिसी स्टेटमेन्ट्स, किसी में कोई कमी थी ही नहीं। संविधान की दुहाई बात-बात में दी जाती थी। खासकर समानता, स्वतंत्रता और न्याय की। रोटी-कपड़ा-मकान के साथ-साथ गरीबी हटाने का वादा पुरजोर तरीके से किया जाता था। दुनिया में अकेले चलने का हौसला रखते हुए हम विश्व की किसी ताकत या खेमे के पिछलग्गु नहीं बने। अपने बच्चों की विदेशों में कमाई गई दौलत पर हम खुश थे और उसके बलबूते ऐश फरमाते थे। अपने यहां न तो हम कुछ हाथों में उत्पादन के स्रोतों को केंद्रित हो दे जाना चाहते थे, न धन-दौलत। हम जमीन के स्वामित्व को छोटे छोटे टुकड़ों में बांट कर अपनी पीठ थपथपा रहे थे। हर आर्थिक औद्योगिक गतिविधि पर पैनी और कड़ी नजर रखे हुए थे। न उद्योगों को उनकी क्षमता बढ़ाने दे रहे थे। मशीनों के आयात, कच्चे माल के आयात, ड्राईंग तथा डिजाईनों के आयात में जितनी पाबंदियां संभव थीं लगाई जा रही थीं। एक तरह से अच्छे विचार (यानी योजनायें और नीतियां) होने के बावजूद भी हमारा आचरण विकास के विरुद्ध था, उद्योगों के हित में नहीं था। माया के प्रति भारतीय वैराग्य अपने ही किस्म की घृणा का स्वरूप ले चुका था। यह उग्ररूप धारण करने लगा था। उत्पादन इकाईयों पर ताले जड़े जाने लगे थे। हड़ताल, चक्काजाम, पैन डाऊन, वर्क-टू-रुल, घेराव, पथराव, उठा ले जाना, सुपारी, हफ़्ता वसूली, प्रोटेक्शन मनी हमारी विशेष उपलब्धियां थीं। फैक्टरी बन्द पड़ी हो, छंटनी संभव नहीं थी। ऊपर से बोनस का भुगतान करना जरुरी था। मजदूरों के मुंह से निवाला छीन कर उनके बाल-बच्चों को भुखमारी में धकेल देना यहां का राजनैतिक आचार-व्यवहार बन चुका था। उत्पादन की इकाईयां बन्द होंगी तो रोजगार के साधन कहां से पैदा होंगे? पर भारतीय सामन्ती वृत्तियाँ किसान-मजदूरों को बहलाकर उत्पादन ठप्प करने में लगी हुई थी। इससे उनकी मजदूर किसानों पर पकड़ मजबूत होती थी, जिसका सीधा लाभ दलीय राजनीति को होता था और मौज होती थी उस नेता की जो ऐसा करवाता था। रेल रोको आन्दोलन चलाते-चलाते नेता जी मंत्री के विशेष कोच में सपरिवार, बन्धु-बांधव-ईष्ट-मित्रों सहित सफर करने लगे। पुनः जब जरुरत पड़ी, रेल रोको आंदोलन करने लगे। इस दोगली राजनीति से भारत का आम आदमी उकता चुका था, उसका विश्वास नेताओं और राजनैतिक पार्टियों में से पूरी तरह उठ गया था। ऐसे माहौल में राजीव प्रवेश करते हैं शुद्ध आचार-विचार के साथ। लोग पहले से ही डायनैस्टिक रुल से खार खाये बैठे थे। अब इन नौजवान मिस्टर क्लीन ने अपने शुद्ध आचार-विचार से एन्ट्री लेकर (प्रवेश पाकर) जले पर नमक ही छिड़क दिया। दिल्ली की भाषा में : ये थोड़े होता है कोई।

यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि राजीव प्रशिक्षण से एक सिविल एयरलाईन पायलट थे। यानी एक ऐसे पेशे में थे, जहाँ कोई गलती करने की जरा सी गुंजाईश नहीं होती है। गलती का नतीजा होता है पायलट की खुद की मौत और सवारीयों की मौत। यह एक प्रेसीशन एन्जेनीयरिंग से जुड़ा पेशा है जहाँ हर कामगार को एक दम प्रेसाईज होना पड़ता है, प्रेसीशन के प्रति संवेदनशील रहना पड़ता है। सूंई की नोक के बराबर गलती भी बर्दाश्त नहीं होती है। जरा सी चूक हुई नहीं कि उड़ान भरते या उतरते समय दुर्घटना घट सकती है, जो जानलेवा हो सकती है, जिसके कारण पायलट लाईसेंस रद्द हो सकता है जिससे आदमी फिर उड़ान ही न भर सके। पायलट को मशीन को ऐसे जान लेना जरुरी होता है जैसा कि अपनी हथेली को। उसके जिम्में न केवल करोड़ों रुपये का जहाज कर दिया जाता है अपितु सैंकड़ों लोगों की मूल्यवान जानें भी। इसलिए उसका दक्ष, कुशल, प्रशिक्षित, चुस्त, दुरस्त, मुस्तैद होना जरुरी है। जरूरी है हवाई उडान संबंधी अद्यतन जानकारी से लैस होना, जिसका सीधा-सीधा मतलब है इस प्रेसीशन व्यवसाय से संबंधित तमाम तकनीकी जानकारी लगातार हासिल करते रहना। इसका एक यह भी पहलू है कि पायलट भौगोलिक स्थितियों और मौसम की जानकारी रखता हो और यात्रा पर निकलने से पहले सब जानकारी अपने साथ रख ले। हवाई यात्री हों या पायलट, सभी जल्दी में तो होते ही हैं, तभी तो हवाई सफर करते है, वरना साधारण रेल यात्रा भी कर सकते हैं। हवाई यात्रा भारत के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में 2-3 घंटे में पूरी की जा सकती है, जबकि रेल यात्रा से उतनी दूरी 3-4 दिन में पूरी होगी। अब अगर व्यक्ति की बात छोड़ दें और राष्ट्र की बात करें तो किसी भी विकासोन्मुखी राष्ट्र के सफर की गति हवाई जहाज की सी होनी जरूरी है। राष्ट्र अगर हवाई जहाज की गति से उड़ना चाहे और नेतृत्व रेलगाड़ी की गति से संतुष्ट रह जायेगा तो आर्थिक उन्नति या औद्योगिक प्रगति दोनों ही धीमी गति से ही हो सकती है। लेकिन नेतृत्व अगर गति के महत्व को समझ कर गति पकड़ना चाहे तो उचित ही है। उसे “यंगमैन इन ए हरी” कहकर उपहास या विद्रूप का पात्र नहीं बनाया जाना चाहिए।  ऐसे नेतृत्व के पैरों में बेड़ियां डालने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए। पर राजीव की गति को रोकने की हर चेष्टा की गई। उनकी गति से कदम मिला कर न चल सकने वाले पुराने नेताओं को उनकी गति खलने लगी।

राजीव शायद इस माहौल से वाकिफ थे। इसलिए उन्होंने न तो विशुद्ध गांधीवादी सुधारवादी रवैया अपनाया न जवाहरलाल जी का समाजवादी जारगन, न इंदिरा गांधी का टकराववादी रुख ही अपनाया। उन्होंने अपने लिए एक नितान्त अनूठा रास्ता तय किया। इस रास्ते को आगे चल कर “इक्कीसवीं शताब्दी” में प्रवेश की तैयारी के नाम से जाना जायेगा। राजनैतिक दलों की वैचारिक दलदल और नेताओं की आपसी खिचखिच से राजनीति को प्रजातांत्रिक स्वरूप प्रदान करने के लिए राजीव ने अपने व्यावसायिक प्रशिक्षण और अनुभव का पूरा लाभ उठाया। उनका विदेशों की आर्थिक और औद्योगिक उन्नति को प्रत्यक्ष से देखने का अनुभव उनके बहुत काम आया। एवीएशन इंडस्ट्री है ही ऐसा व्यवसाय कि उद्यमी को अगले दस-पंद्रह साल आगे का सोचना पड़ता है, उसके लिए पहले से ही तैयारी करनी पड़ती है। यही है भारतीय आर्थिक और औद्योगिक विकास के इतिहास का टर्निग प्वाइंट। यही था युगान्तकारी परिवर्तन का क्षण। यही कथनी और करनी के युग की समाप्ति का काल। पूर्व में कथनी-करनी के अन्तर की राजनीति विशुद्ध आचार-विचार वालों को ठिकाने लगा चुकी थी। लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, इंदिरा गांधी, सब इस परम्परा की भेंट चढ़ाये जा चुके थे। निशाने पर राजीव भी थे।

एक बड़ा फर्क दोनों प्रकार के नेताओं में था। राजीव के पूर्व के सभी नेता अपने विचारों के अनुरूप शुद्ध आचरण करते थे। पर राजनैतिक विचारधारा की संकीर्ण वीथियों में घूमते रहते थे। उन्हें विदेशों में होने वाले विकास का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं था। उनकी सोच यहां तक सीमित रहती थी कि विदेशी मुद्रा नियमों को थोड़ा सा ढीला कर दें, बैंक ब्याज दरों में थोड़ा बदलाव कर लें, आयात-निर्यात नीति को थोड़ा सा एडजस्ट कर लें, औद्यौगिक नीति को थोड़ा बहुत सुधार कर लें या बदल लें। पोस्ट कार्ड की कीमत को लेकर वित्त मंत्री अभी भी चिन्ताग्रस्त नजर आते थे। नमक की रेल से ढुलाई रेल मंत्री को भाड़ा बढ़ाने से रोकती थी। टेलीफोन तथा गैस के कनेक्शन उन्हीं को नसीब होते थे जिनकी पहुंच होती हो। स्कूटर के अलाटमेंट मंत्री-सचिव स्तर से किए जाते थे, सरकारी आवास का आवंटन तो बड़ी बात है। डालडा का डिब्बा “लक्की” लोगों के हाथ लगता था। रेल रिजर्वेशन हो या केन्द्रीय विद्यालयों में एडमीशन, सब कुछ रुआब और दबदबे के बल पर होता था। अनन्त बैठकों में भी यह तय नहीं हो पाता था कि एक उद्योग की कैपेसिटी 10,000 टन सीमेन्ट या इस्पात बनाने से बढ़ाकर 12,500 टन प्रतिवर्ष की जाये या नहीं। फैक्स मशीन, रंगीन टेलीवीजन, फ्रिज, एअर कंडीशनर, क्रियोजैनिक इंजिन, सी एफ एस एल, ऑप्टिक फाईबर को लक्ज़री आईटम माना जाता था। इसलिए वित्त मंत्री उन पर जमकर टैक्स तो लगाते ही थे, इन चीजों को देश में बनाने के लिए लाईसेंस आसानी से नहीं मिलते थे। बिना डी.जी.टी.डी., कम्पनी कार्य विभाग, वित्त मंत्रालय, योजना आयोग, लघु उद्योग विकास संगठन, राज्य सरकार, पर्यावरण मंत्रालय, उत्पाद से संबंधित प्रशासनिक मंत्रालय और उद्योग मंत्रालय की स्वीकृति मिले, न कैपेसिटी बढ़ सकती थी और न ही कोई नया आईटम बनाया जा सकता था। और भी कई विशेष विभूतियों का आशीर्वाद अपेक्षित होता था, जैसे कि सीमेंट कन्ट्रोलर, जूट कन्ट्रोलर, ड्रग कन्ट्रोलर आदि। राजीव अपने पूर्ववर्ती नेतृत्व से इस तरह भिन्न थे कि वो बीसवीं सदी में इक्कीसवीं सदी का उभरता हुआ स्वरूप देख पा रहे थे और भारत को उसके लिए तैयार कर रहे थे। उनका न केवल आचार शुद्ध था किन्तु विचार भी शुद्ध थे। यही वैचारिक भिन्नता उन्हें अपने पूर्ववर्तीयों से एकदम अलग पेश करती थी।

यह राजीव की सोच ही थी जिसने इस देश में उदारीकरण का सूत्रपात किया। ये राजीव की सोच, कृतित्व और उपलब्धियों का परिणाम है कि इंडिया इज रिअली शाईनिंग। जिन्होंने भारत के चमकने का मजाक उड़ाया उन्होंने अनजाने में राजीव का मखौल उड़ाया है। हम फक्र से कहते हैं कि भारत अवश्य चमक रहा है। आज हम राष्ट्रीयकरण के रास्ते से विनिवेशीकरण के रास्ते पर अग्रसर हैं। किसमें थी ऐसी हिम्मत 1984 में? बोलना तो दूर, ऐसा सोचने वाले का राजनैतिक भविष्य ही अन्धकारमय हो जाना था। पर शुद्ध आचरण और शुद्ध विचार राजीव की विशेषता रही है। उनके विरुद्ध विद्रूप का जो माहौल तैयार किया गया था उससे ऐसा लगता था कि कथनी और करनी का अन्तर ही सही साबित होने चला है। पर राजीव ने इसे झुठलाकर सभी को अचम्भे में डाल दिया।

राजीव के प्रधान मंत्री काल में उन्हें एम.आर.टी.पी. अधिनियम के तहत पंजीकृत की जाने वाली औद्योगिक इकाईयों की पूंजी के आधार पर दी गई परिभाषा में परिवर्तन का एक प्रस्ताव भेजा गया था। विद्यमान लागत या असेट वैल्यू को बढ़ाने का प्रस्ताव किया गया था। अक्सर ऐसे प्रस्ताव स्वीकृत नहीं हुआ करते थे। बड़ी कम्पनीयों पर शिकंजा ढीला कौन करना चाहेगा? पर राजीव कुछ और ही सोच रहे थे। जब अनुमोदन मिला तो प्रस्तावित राशि से दुगुने का। एक दम चौंका दिया। नये प्रधानमंत्री की नई सोच ने। ये तो रैडीकल निर्णय था। ऐसा तो भारतीय समाजवादी आर्थिक सोच में एकदम हैरेटिक  था, ब्लासफैमी  थी, नेहरुवादी विचारधारा के विरुद्ध था। इस नई लागत सीमा से उद्योग जगत स्वयं भी अचम्भित था। पर निर्णय हो गया। पहली बार बड़ी कम्पनीयों की परिभाषा बदली गई। वरना औद्योगिक विकास को अवरुद्ध करने वाले ये कायदे कानून बड़े कदम नहीं उठाने दे रहे थे। हर छोटी छोटी गतिविधि लाईसेंस की मोहताज थी और लाईसेंस आवेदक की दशा ऐसा ही होती थी जैसी कि किसी गुनहगार की होती है।

उसकी बाकायदा पेशी होती थी या तो कम्पनी कार्य मंत्रालय में या एम.आर.टी.पी. कमीशन में। इस बढ़ी हुई लागत सीमा ने उद्यमियों को उत्साहित किया। यह वह काल था जब तकनीकी उद्यमियों ने देश के औद्योगीकरण में हिस्सा लेना शुरू किया। आज के सभी मशहूर नाम उदारीकरण के इसी वातावरण में पनपे हैं जिन्होंने उद्योग लगाने और चलाने के तौर तरीके ही बदल दिए। खेत को खाद, बीज, पानी चाहिए। उद्योग को पूंजी, मशीन, कच्चा माल, कुशल कामगार और बाजार चाहिए। लाईसेंस-कोटा-परमिट राज में यह सब संभव नहीं था। उस समय तो स्कूटर का टायर भी किसी से कहने पर मिलता था, जबकि जरुरत थी पूरे स्कूटर का आसानी से मिलना। बड़े उद्योगों को इकानोमी आफ स्केल के लिए बड़ी कैपेसिटी लगानी आवश्यक थी और उसके लिए पूंजी भी ज्यादा लगानी थी। लागत की इस नई सीमा ने उत्साह के साथ भविष्य की संभावनाओं का स्पष्ट संकेत दिया।

अपने आप ही में यह महत्वपूर्ण शुरूआत थी। जो लोग उदारीकरण और रिफार्म का श्रेय नब्बे के दशक के नेतृत्व को देते हैं वो जानबूझकर तथ्यों को तोड़ मरोड़ रहे हैं।

राजीव गांधी की ओर से यह तो मात्र सांकेतिक शुरूआत भर थी। काम तो अभी शुरू होना था। सो हुआ। और हुआ भी तो धमाके के साथ। 1985 में औद्योगिक (डी एंड आर) एक्ट के पहले शेड्यूल में सम्मिलित उद्योगों में से एक तिहाई से ज्यादा को डिलाईसेंस कर दिया गया। यानी उन उद्योगों के लगाने के लिए किसी लाईसेंस की जरूरत नहीं थी। फिर भी आर्थिक और औद्योगिक उन्नति का डेटा रखने के लिए यह अपेक्षित किया गया कि उद्यमी एक प्रार्थना पत्र भर कर देगा तो अच्छा रहेगा और उसके लिए उसे एक रजिस्ट्रेशन नम्बर भी दिया जायेगा, जिससे भविष्य में कोई परेशानी न हो। यह डेटा लागत, एम्प्लोयमेंट, उत्पाद, पर्यावरण जैसे विषयों के बारे में था। इसने तो भूचाल ही ला दिया। यह था देश का पहला बड़ा महत्वपूर्ण उदारीकरण। नब्बे का दशक अभी बहुत दूर था। इससे लॉयजन का काम करने वालों की नौकरी खतरे में पड़ने वाली थी। लोगों की इम्पोर्टेंस कम होने वाली थी। इस डिलाईसेंसिंग के नोटीफिकेशन के जारी होने के तीन हफ्ते तक यह तय नहीं किया जा सका कि इस युग-प्रबर्तक काम को कौन करेगा। उद्योग मंत्रालय इसकी जिम्मेदारी तकनीकी विकास महानिदेशालय (डी.जी.टी.डी.) को देना चाहता था। जिनको उद्योग मंत्रालय का थोड़ा बहुत पता है उन्हें मालूम होगा कि कोई औद्योगिक लाईसेंस, कैपीटल गुड्स (यानी मशीनरी) आयात, फॉरेन कोलेबोरेशन, इंजीनियरी डिजायन या ड्राइंग का आयात बिना इस महानिदेशालय के अनुमोदन के नहीं हो सकता था। भारत सरकार के सभी मंत्रालय इनसे तकनीकी सलाह लेकर ही आगे बढ़ सकते थे। इसलिए उद्योग मंत्रालय ने डिलाईसेंस सैक्टर के रजिस्ट्रेशन का काम भी इन्हें ही सौंपना चाहा, क्योंकि मंत्रालय लाईसेंस का काम देख रहा था। पर महानिदेशालय ने शर्त रखी कि उन्हें 72 नये पद स्वीकृत किए जायें जिनमें संयुक्त सचिव स्तर के (डी डी जी) पद से लेकर चतुर्थ श्रेणी तक के पद शामिल थे। तर्क दिया गया कि यह कुल लाईसेंसिंग के काम का 40 प्रति शत काम था जिसके लिए यह न्यूनतम पद सृजित किया जाना आवश्यक बताया गया था। उस समय वित्त मंत्रालय ने पदों के बनाने और भरने पर रोक लगा रखी थी। इस कारण पदों के सृजन की सोचना भी व्यर्थ था। यानी पूरे-पूरे आसार थे कि राजीव गांधी का यह युग प्रवर्तक कदम व्यर्थ कर दिया जाता। यह क्रांतिकारी कदम कुछ लोगों को छोड़कर ज्यादातर को रास नहीं आया था। इधर उद्यमियों का उत्साह देखते ही बनता था। आवेदनों के ढेर पर ढेर लगते जा रहे थे। यह समयबद्ध तरीके से काम करने की औद्योगिक अनुमति सचिवालय (एस.आई.ए.) की कार्यशैली पर असर डाल रहा था। काम की शुरूआत करना जरूरी था। एस आई ए औद्योगिक लाईसेंसों को 45, 90 और 120 दिन में निपटाने के लक्ष्य के अनुसार काम कर रहा था। अतः इन डिलाईसेंस सैक्टर के आवेदनों को अपने पास ज्यादा दिन पैंडिग रख नहीं सकता था। तकनीकी विकास महानिदेशालय के मत को देखते हुए एस.आई.ए. के उप सचिव से पूछा गया कि क्या वो इस काम की जिम्मेदारी उठा सकते हैं। उत्तर दिया गया “हॉ”। पूछा गया “आपको कितना स्टाफ चाहिये। उत्तर दिया गया “एक भी नहीं; पर निर्णय तुरंत चाहिए वरना आवेदनों के ढेर को निपटाना संभव नहीं होगा”| चौंकने वाली कोई बात नहीं थी, पर लोग चौंके अवश्य। उप सचिव नवयुवक था। आचार-विचार की शुद्धि में विश्वास करता था। उसी उत्साह में सरकारी काम समझकर जिम्मेदारी उठाने को तैयार हो गया। इसके परिणाम से अनभिज्ञ था, अनुभवहीन था। आगे चल कर ऐसे जोशो-खरोश का खामियाजा भुगतेगा। पर निर्णय उसी दिन करना पडा। जब एक जिम्मेदार अधिकारी काम करने को तैयार था, तो देरी करना संभव नहीं था।

काम को जमाया गया। अपनी छोटी सी टीम को प्रेरित किया गया। सौभाग्य से तब तक सभी स्तर पर कर्मचारियों, अधिकारियों का नैतिक स्तर पूरी तरह नहीं गिर गया था। लोग काम करके भी खुश थे। लोग तनख्वाह के लिए काम करके प्रसन्नता का अनुभव करते थे। स्टाफ को 2-4 घंटे का ओवरटाइम मिल गया तो खुश हो जाते थे। इसलिए काम की व्यवस्था जल्दी ही स्थापित हो गई। महीने भर में स्थिति यहां तक ला दी गई कि किसी आवेदक को उसका रजिस्ट्रेशन नम्बर एक हफ्ते में ही मिल जाता था। इसके लिए आवेदन पत्र का नीचे का परफोरटेड हिस्सा डिवाईज किया गया। रजिस्ट्रेशन का नम्बर एक साथ दो जगह पड़ता था। सारा डेटा लेने के बाद और यह चैक करने के बाद कि आवेदन सचमुच ही डीलाईसेंस सैक्टर के उत्पाद के लिए है, निचला हिस्सा काट कर आवेदक को तुरंत भेज दिया जाता था। सारा काम हाथ से करना पड़ता था। अभी भारत में कम्प्यूटर युग का प्रवर्तन होना था। रजिस्ट्रेशन की गति देखकर आवेदक थोड़े चौंकते थे क्योंकि जब परिपाटी के अनुसार वो या उनका लॉयजन अधिकारी आवेदन की स्थिति पता करने आता था तो उसे लिखित में उत्तर मिलता था कि उसके आवेदन पर किस नम्बर और तारीख का रजिस्ट्रेशन जारी हो चुका है। एक अजीब उत्साह लोगों में दिखाई पड़ता था। चार महीने की अल्पावधि में 1400 करोड़ रूपये की लागत के आवेदनों का रजिस्ट्रेशन किया जा चुका था। सरकार अपनी सफलता को प्रेस वक्तव्यों के जरीये जनता के सामने प्रचारित कर रही थी। इन्हें विभिन्न पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित कर रहे थे। 15 सितम्बर, 1985 के इकोनौमिक टाईम्स ने लिखा: “उदारीकृत डीलाईसेंसिंग नीति 1,400 करोड़ रूपये के निवेश प्रस्ताव मंजूर। सरकार की डीलाईसेंसिंग की उदारीकृत नीति अन्ततः लागू हो गई है जिससे 1,400 करोड़ रूपये के निवेश प्रस्तावों को महीनों की छोटी सी अवधि में ही स्वीकृति प्राप्त हो गई है।

सूत्रों के मुताबिक सरकार ने अब तक 500 आवेदनों को अप्रूव करके उन्हें रजिस्ट्रेशन प्रमाण पत्र जारी कर दिए हैं।

इस उदारीकृत योजना के तहत मंजूर किए गए रजिस्ट्रेशन के ये प्रस्ताव उन 25 उद्योगों से संबंधित थे जिन्हे औद्योगिक लाईसेंस से मुक्त कर दिया गया है। और जो उन कम्पनियों से प्राप्त हुए थे जो एम.आर.टी.पी. या एफ.ई.आर. अधिनियमों के दायरे में नहीं आती है।

बड़े उद्योग घरानों (यानी एम.आर.टी.पी.) और फेरा (यानी विदेशी कम्पनियों) के लिए सरकार ने पहले ही उदारीकृत नीति लागू कर दी है जिसके तहत उनके विस्तार या औद्योगिक लाईसेंस आवेदनों को एम.आर.टी.पी. कानून की धारा 21 और 22 से निजात दे दी गई थी जिससे कि कोई दूसरा पक्ष आपत्ति करके उनके आवेदन या प्रस्ताव के रास्ते में बाधा खड़ा नहीं कर सके”। (धारा 21 और 22 और 29 ही थे जो कम्पनी कार्य मंत्रालय के अधिकारियों का कद दूसरे मंत्रालयों के अधिकारियों से ऊँचा किए हुए थे। इनके रहते हुए देश का औद्योगिक विकास संभव नहीं था। एक व्यक्ति ही केवल ऐसा रहा है जिसने इन सारी बाधाओं के रहते हुए तेज गति से उद्योग स्थापित कर शौहरत हासिल की और देश के सबसे बड़े उद्योगपति की हैसियत पाई। वह भी आचार-विचार की बेहतरी का एक उदाहरण था।

“एम.आर.टी.पी. और फेरा कम्पनियों को उदारीकरण केवल 27 आईटमों के लिए उपलब्ध हुआ जिसमें आटोमोबाईल, इलेक्ट्रानिक कोम्पोनेंट और दवाई सैक्टर सम्मिलित थे।

फिर भी, डिलाईसेंसिंग नीति की स्पष्ट सफलता से अब उत्साहित होकर तथा चुनिन्दा औद्योगिक सैक्टरों में निवेश को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से तथा बड़े घरानों के एकाधिकार को तोड़ने के लिए सरकार कुछ अन्य उद्योगों को लाईसेंस से मुक्त रखने पर विचार कर रही है।

सूत्रों का कहना है कि सरकार द्वारा कोई 200 उद्योगों को डिलाईसेंसिंग के अंतर्गत लाया जा सकता है। इस सूची में केवल यह अन्तर होगा कि एम.आर.टी.पी और फेरा कम्पनियों को उन कम्पनियों से स्पर्धा करनी होगी जो तुलनात्मक रूप से उनसे छोटी इकाईयां हैं किन्तु जिन्होंने थोड़े ही समय में गजब की उन्नति करके दिखाई है।

यह पिछली 25 डिलाईसेंस्ड उद्योगों की सूची से भिन्न होगी जिसमें बड़े उद्योग घरानों को भाग लेने की इजाजत नहीं थी।

उन्होंने बताया कि ऐसी सूची बनाने की प्रक्रिया अभी जारी है जिसमें एम.आर.टी.पी. और फेरा कम्पनियाँ दूसरी कम्पनियों के साथ भाग ले सकेंगी और इस पर शीघ्र निर्णय होने की संभावना है।

संभव है कि 27 उद्योगों की वह सूची जिसके अनुसार एम.आर.टी.पी. और फेरा कम्पनियों को एम.आर.टी.पी. अधिनियम से छूट मिली है, के आधार पर ही यह नई सूची बनाई जाये।

उन्होंने बताया कि वर्तमान सोच के हिसाब से 27 उद्योगों की इस सूची में से एक दर्जन आईटेम हटाये जा सकते हैं जिनमें शामिल हो सकते हैं इंटरनल कम्बसटन एंजिन, मोटराईज्ड दो, तीन तथा चार पहिया वाले वाहन, मुद्रण मशीनरी, तेल फील्ड सेवायें, इनौर्गेनिक फर्टिलाईजर्स जो आई (डी.आर.) एक्ट की प्रथम अनुसूची के क्रमांक 18-फर्टिलाईजर, ड्रग्स तथा ड्रग्स इंटरमीडीयरीज जिसमें 12 फार्म्युलेशन्स भी सम्मिलित हैं, न्यूजप्रिंट और पोर्टलैंड सीमेंट।

इनके अलावा कुछेक आईटेम और हैं जहां डिलाईसेंसिंग की इजाजत न दी जा सके। ये अनुसूची-IV तथा V में शामिल है जिनमें कुछ उद्योग आवश्यक रूप से दो कारणों से लाईसेंस प्रक्रिया के अधीन हैं। पहला यह कि ये उद्योग विशेष रेगुलेशन्स के तहत आते हैं और दूसरा यह कि इनमें देश में पहले ही ज्यादा कैपेसिटी लगाई जा रही है।

इसके अतिरिक्त 83 औद्योगिक सैक्टरों को नई ब्रॉडवेंडिंग योजना के तहत लाने के परिणाम स्वरूप अब कम्पनियां दूसरे उत्पादों के लिए डाईवर्सिफाई कर सकेगी जो उस उत्पाद के जानरिक नाम के अन्तर्गत पड़ता है और जिसका उत्पाद के लिए उन्हें अब अलग से नया लाईसेंस नहीं लेना पड़ेगा। ये सभी मुद्दे दूसरा डीलाईसेंसिंग दौर शुरू करने से पहले जांचे जायेंगे’’।

उपरोक्त हिन्दी अनुवाद है जिसका मूल अंग्रेजी में 15 सितम्बर, 1985 के इकोनोमिक टाईम्स में उपलब्ध है। आज 1985 के 1,400 करोड़ कितने बनेंगे इतना तो अन्दाज लगा सकते हैं। इसके आलोक में उदारीकरण या सुधारों के सूत्रपात का श्रेय नब्बे के दशक और उसके कर्णधारों को देना राजीव गांधी के योगदान को उपेक्षित करना है। इस बड़े स्तर पर और इतने विस्तृत सुधार राजीव जैसा नौजवान, आधुनिक विचारों का, सजग भारतीय ही कर सकता था, जिसका बीसवीं सदी से नजदीकी वास्ता रहा है और जो इक्कीसवीं सदी के आने वाले परिवर्तनों से बाखबर था। नब्बे का दशक तो अब इस उदारीकरण को नकार कर आर्थिक विकास को फिर से पिछली सदी में नहीं धकेल सकता था। यह न जनता को, न उद्योगों को, न उद्यमियों को, न विश्व आर्थिक व्यवस्था के कर्णधारों को ही स्वीकार होता। नब्बे के दशक को इन गतिमान सुधारों के साथ अपने आप को जोड़ना ही एकमात्र विकल्प था। उसने वैसा ही किया।

राजीव की इस नई सोच के कारण हड़ताल और औद्योगिक उत्पादन में रुकावट आदि थम से गये। इनका पूरा फायदा नब्बे के दशक ने उठाया जिसे किसी बड़ी हड़ताल का सामना नहीं करना पडा। राजीव के इन प्रयासों का सभी ने पूरा-पूरा समर्थन किया। उनके द्वारा उठाये गये अन्य बहुत से कदमों के साथ साथ उदारीकरण के इन नीति निर्णयों और कार्यक्रमों ने एक नई चेतना फूंक दी थी। जो लोग लाईसेंस परमिट के दलालो के प्रभाव में रह कर निर्णय लेते थे, जो कैबिनेट कमेटी ऑन  इकानामिक अफेयर्स में बैठकर बरसों लाईसेंस परमिट राज का दोनों हाथों से लाभ ले रहे थे, उनसे उदारीकरण और वह भी डिलाईसेंसिंग जैसा क्रांतिकारी कदम उठाये जाने की उम्मीद करना नासमझी की बात है। अलबत्ता इतना जरूर है कि समय और परिस्थितियों को भांपने में राजनीतिज्ञ कुशल होते हैं।

राजीव के निर्णयों और नीतियों की सफलता और उनकी चहुदिशि सराहना से उन्हें यह ताड़ने में ज्यादा देर नहीं लगानी पड़ी कि जमाने की मांग क्या है। किन्तु फर्स्ट गियर से एकदम चौथे गीयर में जाना संभव नहीं है। लाईसेंस परमिट देने दिलवाने में मानसिक वृत्तियाँ विशेष प्रकार से काम करने की आदी हो चुकी थी। इसलिए इस उदारीकरण के दौर को चलाये रखने के लिए एक कुशल चालक की आवश्यकता थी जिसकी इस क्षेत्र में विशेषज्ञता हो, जो मशहूर हो, जो सम्मानीय हो और जो कोई चुनौती या खतरा पैदा न करे। नब्बे के दशक को डा. मनमोहन सिंह में ऐसा ही कुशल चालक मिलने जा रहा था। भारत में एक अजीव किस्म की राजनैतिक स्पर्धा चलती रहती है। आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था अभी स्थिर नहीं हो पाई है। महिलाओं के लिए आरक्षण करना चाह रहे हैं। कुछ लोगों ने आरक्षितों में ही आगे आरक्षण कर दिया ‘‘अति पिछड़े’’ कहकर। इसी प्रकार घोर प्रतिक्रियावादी सामन्ती ताकतों ने सामाजिक न्याय का बीड़ा उठा लिया। उदारीकरण के मामले में भी राजीव वहाँँ पहुंच गये थे जहाँ यही स्पर्धाभरी स्पर्धा होनी ही थी। इसी के चलते राजीव के काम को नब्बे के दशक की उपलब्धि बताया जाता रहा है।

राजीव की विशेषता उनका आचार-विचार रहा है। उसी के चलते उन्होंने चार मिशन स्थापित किए। प्रशासनिक प्रक्रिया को सुधारना राजीव के क्या किसी के भी बस का काम नहीं है। यह व्यवस्था अंग्रेजों ने बनाई थी। विशेष रूप से भारतीयों को ध्यान में रखकर। अंग्रेजों का भारतीयों को शक की नजर से देखना एकदम जायज था। उनकी आलोचना क्यों की जाये? पर उसी व्यवस्था को 1947 के बाद बनाये रखना कहाँ तक उचित है? मजाल है कोई प्रशासनिक या वित्तीय निर्णय बिना भयभीत हुए लिया जा सके। कोई ऐसा निर्णय नहीं है जिस पर आडिट आब्जेक्शन से लेकर विजीलेंस केस नहीं बनाया जा सके। ठीक वैसे ही जैसे कोई ऐसी कार नहीं है जिसे ग्राहक शोरूम से उठाकर लाये और बाहर निकलते ही जिसका मोटर विहाईक्लस एक्ट के तहत चालान न किया जा सके। इस प्रक्रिया का भयंकर रूप बोफोर्स मामला है जो राजीव के मत्थे चींचड़े की माफिक चिपका हुआ है। इस व्यवस्था में आरोपी को छोड़ किसी और पर उँगली नहीं उठाई जा सकती, भले ही आरोपी निर्दोष हो और आरोप लगाने वाला खुद ही दोषी हो। इस व्यवस्था में जनहित की योजनाओं को बिना देर किए लागू करना संभव नहीं है। जब तक सारी क्लीयरेंसेज ली जाती हैं तब तक वित्त वर्ष बीत जाता है और योजना अक्रियान्वित रह जाती है। जनता की नजर में वह कथनी और करनी के अंतर का एक और उदाहरण बन जाती है। जब यह योजना पेयजल की हो तो उसके शीध्र कार्यान्वयन की जन अपेक्षा जायज ही होती है। राजीव जानते थे कि प्रशासनिक व्यवस्था जन कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधक है। व्यवस्था को बदलना तो संभव नहीं था, पर कुछ योजनाओं को इन प्रक्रियाओं से मुक्त रखकर, एक्सपैरीमेंट किया जा सकता था। राजीव ने ये रिस्क लिया। यह ऐसा ही था जैसा खराब मौसम में हवाई जहाज उतारना। पर जहाज का ईंधन खत्म होने से पहले ऐसा करना जरूरी हो ही जाता है।

नतीजा सबके सामने है। देश में आज टेलीफोन की उपलब्धता का पूरा श्रेय केवल राजीव गांधी को ही जाता है। उनके द्वारा शुरू किए गए सारे टैक्नॉलाजी मिशन सफल रहे। देश में ही सुपर कम्प्यूटर तक का निर्माण कर लिया गया – परम 10,000। रंगीन टेलीविजन की शुरूआत वो एशियन गेम्स के अवसर पर कर ही चुके थे। टेलीफोन, पेयजल, खाद्य तेल इत्यादि के मामले में मिशन मोड में जो काम हुआ है वह अन्य योजनाओं को लागू करने के लिए अनुकरणीय उदाहरण बन गया। उससे बढ़कर उन प्रयासों  ने प्रशासनिक और वित्तीय प्रक्रियाओं की निरर्थकता को भी सिद्ध कर दिया है। इन दोनों क्षेत्रों में सुधार होने अभी बाकी हैं। प्रशासनिक सुधार आयोग बना दिया गया है, पर वित्तीय क्षेत्र में व्यापाक सुधार ओवर-डिलेयड हो गये हैं जिन्हे बिना देरी लागू किए जाना चाहिए। किसी भी काम को करवाने के लिए नियत टैंडर, कुटेशन प्रक्रिया, आंतरिक वित्त या वित्त विभाग की व्यर्थ की दखलन्दाजी और सतर्कता मामले का डर योजनाओं को लागू किए जाने के पहले ही नष्ट कर देता हैं। राजीव को रास्ते से नहीं हटाया गया होता तो वो इस ओर जरुर ध्यान देते।

वैसे इन सुधारों की आवश्यकता से वो वाकिफ थे। तभी तो उनके कई निर्णयों के दूरगामी परिणाम हुए। पहला तो यह कि उन्होंने पाँच दिन का कार्य सप्ताह शुरू कर दिया। इस एक निर्णय से सरकारी खर्च का सैंकड़ों करोड़ रूपया बचा जो बिजली, पानी सहित पैट्रोल, चाय, लंच, डिनर आदि पर होता। दूसरे कर्मचारियों में संतोष बढ़ा, उन्हें घर गृहस्थी के लिए आलू-प्याज-दाल-आटा लाने का समय मिल गया, डाक्टर से दवा लेने का समय मिल गया, बच्चों को पढ़ाने-घुमाने का समय मिल गया, घर के सदस्यों के साथ हँसने-बोलने का समय मिल गया। करोड़ों रूपये का पैट्रोल बच गया जो कार्यालय पहुंचाने वाली बस, रेल, कार आदि पी जाती। सबसे बड़ी बात : इससे ज्यादा करने को काम सभी कर्मचारियों के पास होता ही नहीं है। सच तो यह है कि अभी इस सप्ताह को थोड़ा  और छोटा किया जा सकता है। हां, जो एक दिन कम किया गया उसके एवज में काम के घंटे कुछ बढ़ा दिये गये, जो कर्मचारियों को सहर्ष मंजूर था।

राजीव कर्मचारियों के काम और उनकी आवश्यकताओं से भी वाकिफ थे। आखिर वो खुद नौकरी जो करते थे। उन्हें मालूम था कि तनख्वाह कम है और रिटायरमेंट पर आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय हो जाती है। इसके लिए उन्होंने पहले तो ग्रेच्युटी की सीमा बढ़ाई। उन्होने इसे 3,50,000 रूपये कर दिया था, जो बीस साल तक घटाई-वढ़ाई भी नहीं गई। 2008 में इसे दस लाख किया गया। जब कि इस पर सीमा लगाना वित्तीय अन्याय है। ये है हमारी प्रशासनिक सोच।

एक और महत्वपूर्ण आदेश यह दिया गया कि रिटायरमेंट महीने के बीच में न होकर आखिरी दिन होगा, भले ही जन्मतिथि बीच महीने में पड़ती हो। यह था लौंग अवेटेड सिम्पलीफिकेशन। राजीव के पहले भी यह लिया जा सकता था और राजीव के बाद भी इसमें कुछ किया जा सकता है। जैसे कि पेंशन का बड़ा दिलचस्प फार्मूला है। अगर आप साठ बरस के होने के ठीक एक दिन पहले वालेंटरी रिटायर कर जायें तो आप को 20 हजार से 1 लाख रूपये का फायदा होता है। जो साठ साल पूरे करने पर नहीं होता क्योंकि आप उनसठ साल में वालेंटरी और साठ साल में रिटायर होते हैं। अंदाज लगाया जा सकता है कि इस फिजूल के कागज काले करने के काम को राजीव गांधी सदा के लिए समाप्त कर देते।

रिटायर होने वाले अफसर भी और कर्मचारी भी समय पर न तो पेंशन पाते थे, न ही उनके दूसरे लाभ उन्हें समय पर मिलते थे। पेंशन कार्यालयों के चक्कर लगा लगाकर बेचारे रिटायर हो चुकने के एहसास से बुझे हुए, चुके हुए नजर आते थे। राजीव ने इस कालोनियल प्रक्रिया को बदलते हुए आदेश दिए कि हर रिटायर होने वाले कर्मचारी की पेंशन और दूसरी देनदारी रिटायरमेंट के दिन दे दी जायेंगी। अगर किसी कारण पेंशन के आदेश नहीं निकल पायें तो कर्मचारी को 100 प्रति शत प्रावीजनल पेंशन दे दी जायेगी। परिणाम सामने है। एक अशोभनीय भ्रष्ट आचरण का खात्मा हुआ।

नितान्त कालोनियल प्रशासन तंत्र में ये प्रजातांत्रिक खुशबू का छिड़काव था। यहां आदमी अगर बीमार भी हो तब भी उससे पहले छुट्टी मंजूर कराने की अपेक्षा की जाती है। मंजूर न होने पर अनुशासनात्मक और प्रशासनिक दोनों प्रकार की कार्यवाही की जा सकती हैं। अपने ही प्रोवीडेंट फन्ड से पैसा उधार लेने के लिए बाकायदा आवेदन करना पड़ता है जिस पर सक्षम अधिकारी अनुमोदन देता है। उसे एडवांस कहा जाता है जिसे कर्मचारी अपने फंड को माहवारी किश्तों में वापिस करता है। यहां अधिकारियों का बीमा कुल 1,20,000 रूपये (एक लाख बीस हजार रूपये) का है, जिसमें कोई कर्मचारी एक मध्यम वर्ग के फ्लैट के पंजीकरण की अग्रिम राशि का पूरा भुगतान भी नहीं कर सकता है। जबकि प्रोवीडेंट फन्ड में दिए गए मासिक अंशदान से किसी भी अधिकारी को पचास लाख रूपये तक की इन्स्योरेंस कवरेज मिल सकती है।

इक्कीसवी सदी में भारत सरकार के कर्मचारी इतने लाचार हैं कि उन्हें साईकिल, टेबुल पंखा, त्यौहार, क्रिया-कर्म करने के लिए छोटे-छोटे ऋण लेने की सुविधा है। इन नियमों में बदलाव हो ही जाना चाहिए। पांचवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने पर कालोनियल सोच के उस हर व्यक्ति को तकलीफ हुई जो सरकारी कर्मचारियों को बेचारेपन से उभरते नहीं देख सकता है। उसमें वो तत्व भी शामिल हैं जिनकी पत्नी भी कमाती है या जिनके आमदनी के दूसरे अच्छे स्रोत हैं। अन्यथा पाचवें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बावजूद भी असल में आम कर्मचारी की क्रय क्षमता घटी ही है। अगर ये सिफारिशें लागू नहीं होती तो मजबूरन चक्का जाम की सुसंस्कृति फिर से हावी हो जानी थी। छठे वेतन आयोग से सभी कर्मचारी खुश नहीं है। फिर भी यह सही दिशा में चला तो।

राजीव के विचारों का प्रस्फुटन होने लग रहा था। शिक्षा मंत्रालय का नाम बदल कर मानव संसाधन विकास मंत्रालय कर दिया गया था। यह नई सोच, नई दिशा का परिचायक था। शिक्षा प्रयोजनहीन तो हो नहीं सकती। उसका उद्देश्य तो मानवीय संसाधनों का विकास करना है जिससे वो अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार काम कर सकें।


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सफलता का मूल्य चुकाना


यह सब परिवर्तन भी हो ही रहा था। राजीव की अपनी छोटी सी किन्तु सुखी, गृहस्थी थी, जिसमें उनकी प्रिय पत्नी के अलावा नन्हे-नन्हे प्यारे से बच्चे भी थे। एक लड़की,दूसरा लड़का। भाई की मौत और माँ की हत्या के सदमे से राजीव धीरे धीरे उभर रहे थे। जनता के कल्याण की योजनाओं में वो मशगूल रहने लगे थे।

संकट उनके सामने भी आते रहे। चाहे वो शाहबानों मामला हो या श्रीलंका। श्रीलंका में जब उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया जा रहा था तथी एक अदना सैनिक ने उनपर बन्दूक से भरपूर वार किया, जिसे बचाने में राजीव कामयाब रहे। पांसा फेंका जा चुका था। राजीव की जान खतरे में थी। पर वे इससे बेखबर ही थे। श्रीलंका में भारतीय सेना और वायुसेना भेजने का निर्णय अकेले राजीव गांधी का नहीं था बल्कि पूरे मंत्रिमंडल का था। लेकिन ऐसा आभास दिया गया जैसे कि यह उनका व्यक्तिगत निर्णय हो। इसी प्रकार इंदिरा जी को स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने के लिए जिम्मेदार बना दिया गया था। क्या इस मामले में तत्कालीन गृह मंत्री की कोई भूमिका नहीं थी? क्या गृह सचिव, मंत्रीमंडल सचिव, प्रधान मंत्री के सचिव की कोई भूमिका नहीं थी? कहा कभी किसी ने कि अकेली इंदिरा नहीं जिम्मेदार हम सब थे उस कार्य के लिए? इसी तरह श्रीलंका के मामले में अकेले राजीव ने ही निर्णय नहीं लिया था। यह और बात है कि किसी दूसरे ने जिम्मेदारी लेकर नैतिकता का परिचय नहीं दिया है। इसीलिए यह आभास होता है कि राजीव को घेरने की तैयारी पूरी तरह से चालू थी। इंदिरा जी को गूंगी गुड़िया ना बना सकने वाले तत्व राजीव को अपने चंगुल में न बाँध रख सकने के कारण कुपित थे। वैसे भी उन्हें अपने से छोटी उम्र के नौजवान के प्रधान मंत्री पद पर बने रहते हुए काम करना अच्छा नहीं लगता था। एक तरह से राजीव के पास एक भी ऐसा विश्वसनीय मंत्री नहीं था जो उन्हें राष्ट्रहित में, जनहित में सही सलाह मशविरा दे सके। ऊपर से राष्ट्रपति उन्हें अपदस्थ करने की गंभीर धमकी दे ही चुके थे। ऐसे में जिन एक दो व्यक्तियों पर उन्होंने भरोसा किया उन्हीं ने उनके साथ विश्वासघात कर ब्रुटस का सा बर्ताव किया। राजीव के लिए यह एकदम अप्रत्याशित हमला था। वो इससे लड़खड़ा गये। इतना व्यथित हुए कि संसद में सफाई देने लगे। आरोप लगाने वाले सफाई क्यों सुनते। वो तो उनका उपहास करने लगे। आज बीस बरस बाद अगर राजीव देख पाते तो समझते की भारतीय राजनीति का असली चेहरा कैसा है जहाँ अपने दाग धब्बे नजर नहीं आते पर दूसरों के चेहरे पर दाग ही दाग देखे जाते हैं। राजीव तो शिष्ट भाषा का प्रयोग करते थे तभी तो उन्होंने ‘‘लिम्पैट’’ शब्द का प्रयोग किया था। पर अब राजनीति का अपराधीकरण चर्चा का विषय है। भ्रष्टतम लोग भ्रष्टाचार पर भाषण दे रहे हैं। कानून का शासन हाथ बांधे स्वयं न्याय की याचना कर रहा है।

राजीव को रास्ते से हटाना तो था ही। सफल हुए कुपित मित्र, सेवक, चाटुकार। इस तरह निपटाया कि कभी पता ही नहीं चलेगा कि असल में हुआ क्या। आश्चर्य इस बात का है कि जो मित्र लोग उन्हें श्रीपेरूम्बूदूर ले गये थे उनमें से किसी को खरोंच तक नहीं आई। राजीव को घेरे रहने वाले उनके साथ फोटो खिचवा कर अखबारों में छपवाने वाले कितनी दूर सुरक्षित बने रहे कोई नहीं जानता। उन्हें था खतरे का एहसास। उनके मन में श्रीलंका में भारतीय सेना द्वारा की गई कार्यवाही के प्रति गहरी नाराजगी थी। वे राजीव से सचमुच कुपित थे। इसलिए कर दिया राजीव को उनके हवाले जो उसको लीलने के लिए तजवीज किये गये थे। राजीव उसी तरह ह्त्या के शिकार हुए जिस तरह उनकी माँ इंदिरा गांधी। एक लॉयलिस्ट नहीं आया उनके और गोलियों के बीच में। पर ऐसी मूर्खता भावुक लोग ही करते हैं। समझदार और राजनीतिज्ञ आसन या सिंहासन पर नजर गढ़ाये रहते हैं। कम कष्टप्रद नहीं ये देखना कि जिस कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में कभी महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरु, जवाहरलाल नेहरु, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय जैसे आदरणीय लोग आसन ग्रहण करते थे वहाँ आजकल वे लोग आसन्न हैं जिन्हें किसी भी हालत में वहाँ नहीं होना चाहिए।


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िबरवान के पात


राजीव गांधी या इंदिरा गांधी के प्रति अभी यह आग ठंडी नहीं हुई है। लोग टकटकी लगाये बैठे हैं राजीव पुत्र राहुल पर। अभी इस उम्मीद में हैं कि कोई गलत कदम उठाया जायेगा और उनका काम आसान हो जायेगा। राजीव से राहुल की उम्र कुछ ही वर्ष कम होगी जब दोनों ने सक्रिय राजनीति में भाग लिया है। फर्क है कि राजीव राजनीति में उतरने से पहले गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर चुके थे और राहुल को अभी घर बसाना है। इसी पर टिकी हैं सारी राजनीतिक महत्वाकांक्षिीयों की निगाह। उन्हें मालूम है कि राहुल किसी विदेशी लड़की से शादी करना चाहते हैं। संभवतः इसके लिए उन्हें इजाजत नहीं मिल रही है। इसी सिलसिले में लगाई जा रही है अनेक प्रकार की अटकलें। इस मामले में लिया गया राहुल का कोई भी कदम भारतीय राजनीति का अगला पैंतरा तय करेगा। लोगों को उम्मीद है कि राहुल जो भी कदम उठायेगा वह गलत ही होगा जिससे उनका अभीष्ट साधन हो सकेगा।

खतरा प्रियंका से भी कम नहीं है क्योंकि उनके चेहरे से स्वर्गीय इंदिरा गांधी की याद ताजा हो उठती है। पर अन्दाजा यह लगाया जा रहा है कि वो राजनीति से दूर अपने घर गृहस्थी में खुश हैं। अलबत्ता उनके पति को अवश्य टटोला जा रहा है कि उनकी राजनैतिक तमन्ना क्या है।

राहुल को काफी सतर्क रहना होगा। पहला उन्हें अपना निजी जन-आधार बनाना होगा। कुछ उसी तरह जिस तरह इंदिरा जी ने बनाया था। दिल्ली में चाटुकारों के दल ढोल तमासे बजाकर उन्हें मुगालते में डाल सकते हैं। ये ताकतें जनता और नेताओं के बीच मजबूत दीवार बन कर खड़ी हो जाती हैं। ये नहीं चाहते कि नेता का जनता से सीधा सम्पर्क हो या जनता नेता से सीधे मिल सके। ये ढोल जरूर पीटते हैं पर बताये हुए रास्ते पर चलना ही नहीं चाहते। राजीव की अनुपस्थिति में कितनों ने मिशन मोड़ में जन कल्याण की कोई योजना चलाई है? ऐसे में अपनी शिक्षा-दीक्षा, सूझ-बूझ से राहुल को स्वयं ही अपना मार्ग तय करना होगा। ये भारतीय राजनीति है, इसमें इन्हें कोई उपलब्धि नहीं हो सकेगी। अलबत्ता उनका सर्वस्व स्वाहा जरुर हो जायेगा। कारण कि उन्हें ईमानदार छवि का नेता प्रचारित कर स्वार्थी तत्व खुद सारे कर्म-कुकर्म-छल-द्वेष-कपट-लोभ-लालसा-सत्ता का भोग करेंगे और अगर कभी राहुल ने सत्ता का सुख चखना चाहा तो कोई बोफोर्स समकक्ष अन्य स्केंडल उनके मत्थे मढ़ के उन्हें उनकी असलीयत बतला देंगे वरना कोई एक्शन श्रीलंका करवा कर कोई भी अनहोनी करवा देंगे।

आगे वढ़ने से पहले किसी भी व्यक्ति को इतना तो तय कर ही लेना चाहिए कि वह राजनीति में बने रहना चाहता है या नहीं। एक बार तय कर लेने पर नीति शास्त्रों का अध्ययन करना आवश्यक है। इसमें सबसे प्रमुख है वाणी का संयम। जहाँ तक हो सके केवल मीठी वाणी ही बोली जाये। कम से कम कठोर बचन बिल्कुल नहीं बोले जायें। जब मुँह खोला जायेगा तो मृदु वचन ही बोले जायें। अगर अकेले वाणी के अस्त्र को साध लिया जायेगा तो राजनीतिज्ञों के बाकी सारे शस्त्र बेकार साबित होंगे। महात्मा गांधी इस बात के जीवंत उदाहरण हैं। उनके वचन आज ज्यादा लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं। विश्व पटल पर आज के इस उत्तर-आधुनिकतावादी काल में अकेले महात्मा गांधी ही हैं जिन्हें आदरपूर्वक सुना, पढ़ा और समझा जा रहा है।

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फल फूल


राजीव अपने इन्हीं गुणों के कारण जन-जन प्रिय थे। राजीव को चुनाव में जितनी बड़ी सफलता मिली थी उतनी पहले किसी को नहीं मिली थी। देश के लोग इस तरह का युवा और सुप्रशिक्षित नेतृत्व चाहते हैं जो प्रगति के पथ पर ले चले। आज भारत को जो ऊँचा स्थान विश्व समुदाय में प्राप्त है उसका श्रेय केवल राजीव गांधी को जाता है। उन्होंने आर्थिक प्रगति, जो कई प्रकार की बाधायें खड़ी करके रोक दी गई थी, को बल दिया। उनके कारण देश ऐसी स्थिति में आ गया कि छोटे छोटे बच्चे भी मोबाईल फोन लिए घूमते हैं। लोगों की सोच बदली है। वो बड़ा सोचने लगे हैं, क्षुद्रता से उभर गये हैं।

यह राजीव की सोच, पहल और सफलता का ही परिणाम है कि श्री अटल बिहारी वाजपेयी उसी तरह का एजेन्डा लेकर काम कर गये और नाम कर गये। दलगत प्रतिक्रिया छोड़ दें तो पायेंगे की उदारीकरण और सुधार के एजेन्डा को वाजपेयी जी ने आगे ही बढ़ाया है। किसी भी नेता की स्वस्थ सोच का प्रमाण यही होता है कि उसे उसके उत्तराधिकारी बिना उलटे-पुलटे अपनाते रहें। आज उस पर बंदिशें आयद करने की कोशिशें कुछ ताकतें कर रही हैं। अस्तित्व के लिए पैंतरेबाजी और नारेबाजी ज्यादा लम्बा नहीं चलेगी। उत्पादन, वितरण और आय पर से सभी प्रकार के बंधन हटाने पड़ेगे। नई पीढ़ी का पेट नारों से नहीं भरा जा सकेगा।

ज़रा सोचिये कि राजीव गांधी ने अगर यह उदारीकरण न किया होता तो आज हम कैसी दुःखद स्थिति में होते। खासकर तब जबकि चीन में उदारीकृत अर्थव्यवस्था ने विश्व के सभी देशों को अचम्भित कर दिया है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भी कम अच्छी नहीं है। ऐसे में स्मगलिंग तो होती ही रहती है, साथ ही खुलमखुल्ला डम्पिंग भी होगी। आज कम से कम देश में सभी उपभोक्ता वस्तुएं मिल जाती हैं। उनके लिए कोई क्रेज नहीं है। रोजगार के लिए लाखों साधन उपलब्ध हुए हैं। अब युवा वर्ग विदेशों में नौकरी करने के लिए जाने के बजाय देश में रहकर काम करना चाहता है।

अभी राजीव के सुधार और उदारवादी एजेन्डे के कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अमल होना बाकी है जिनमें वित्तीय क्षेत्र में सुधार, प्रशासनिक क्षेत्र में सुधार, न्याय क्षेत्र में सुधार प्रमुख हैं। जो नेता इस ओर कदम बढ़ायेगा वह राजीव की तरह ही प्रिय हो जायेगा।


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राजनीति की चाल


राजीव को पद से हटाने की साजिश अन्ततोगत्वा सफल हो ही गई। चुनावों में षडयन्त्र का चक्कर चल ही गया। ये केवल प्रतिक्रियावादी ताकतों की जीत थी जो ज्यादा दिन तक कायम नहीं रहनी थी। फिर भी पहली बार सत्ता उन लोगों के हाथ लग गई जो एक प्रकार से ‘‘डायनेस्टी’’

से ही पोषित होते चले आ रहे थे। इनके आचार और विचार दोनों अशुद्ध और दूषित होने के कारण इनके चेहरे से नकाब जल्दी ही हटने वाला था। इनकी असलियत बेपर्दा होनी थी। कारण कि इन तत्वों का न तो कोई राजनैतिक दर्शन ही था, न विचारधारा और सोच। सामंती प्रवृत्तियों के इन लोगों की कथनी और करनी में अन्तर उतना ही था जितना जमीन और आसमान में। अपना हित इन्हें जनता का हित प्रतीत होता था। अन्याय में इन्हें सामाजिक न्याय दिखाई देता था। सफेद झक्क खादी के वस्त्र धारण कर ये लोग अपने आप को बेदाग महसूस करते थे। पर हमेशा साम्प्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने के गुपचुप प्रयास करते थे। उसमें ये चौधरी बन कर शांति और भाईचारे का वातावरण बनाने का ढोंग करते थे।

इनका एक सूत्री कार्यक्रम था – सत्ता हथियाना। इन्हें मालूम था कि जनता उन्हें कभी भी चुनाव में जितवा कर सत्ता नहीं सम्हलायेगी। इसलिए उन्होंने हथकंडों की राजनीति अपनाई। आपसी द्वेष पैदा कर लोगों और समुदायों के बीच द्वेष भावना जगाई। षडयन्त्र और धूर्तता, कपट और भेद नीति का खुलकर गलत फायदा उठाया। राजकोष का पैसा कुछ इस अंदाज में अचकन की जेब से निकाल कर जनता की ओर फेंका मानों कि अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति का कुछ हिस्सा इनके भड़काये दंगों से पीड़ित लोगों को दे रहे हों। राजकोष का दुरूपयोग अपने और जमात के हित साधने पर खर्च किया। प्रेस और मीडिया को संतुष्ट रखने और संतृप्त रखने के लिए राजकोष का खुलकर उपयोग किया।

असल में इन ताकतों का पर्दाफाश सत्ता हाथ लगने के पहले ही हो गया था। एक किसान और सही मायनों में जनता से जुड़ा हुआ अनुभवी नेता 1989 के चुनाव के बाद सत्ता पक्ष का नेता चुना जाना तय था। उसके नाम की घोषणा हो ही गई थी। पर षडयन्त्रकारियों का दिमाग कुछ और ही सोच रहा था। इस जन निर्णय और जन प्रतिनिधियों के निर्णय को अंतिम क्षणों में बदलने में दुष्ट षडयंत्रकारी सफल हुए, जिसका मूल्य राष्ट्र को चुकाना पड़ेगा। भारतीय समाज में जातिवाद का जहर इस कदर घोल दिया गया कि जिसका उपचार शायद ही 100-200 सालों में हो तो हो। समाज को इन ताकतों ने तोड़ कर रख दिया है। जिस बिखराव का शिकार 1947 तक का भारत था, जिसे सप्रयास गांधी दर्शन, नेहरु नेतृत्व, पटेल के सफल प्रयासों ने एकता के मजबूत सूत्र में बाँध कर बतौर एक राष्ट्र की पहचान दी। 576 छोटे बड़े रजवाड़ोंका विलय भारतीय राष्ट्र में कर दिया। उनकी अलग देश या राज्य की अवधारणा समाप्त कर दी। उन्हें भी आम आदमी के बराबर कर दिया। भारत संघ में प्रान्तीय यूनिटों का नये सिरे से गठन कर दिया। राजनैतिक और संवैधानिक विकास से नाइत्तफाक़ी रखने वाले तत्व न जाने कब से घात लगाये बैठे थे कि इन सबको उलट दिया जाये। पहली बार इन तत्वों को सफलता मिली थी। इन्होंने बिना देर किए मौके का पूरा-पूरा फायदा उठाया। सामाजिक न्याय के स्वयंभू इन मसीहाओं को समाज ने ही सामाजिक न्याय प्रदान कर दिया।

यह समय और इसके बाद का समय राजीव और उनके परिवार के लिए बहुत भारी पड़ना था। उनकों तंग करने के नये-नये तरीके सोचे जा रहे थे। चाल दो लक्ष्य साधने की थी। पहली यह कि बोफोर्स कांड के नाम पर राजीव को ब्लैकमेल करके इन्हें राजनीति से बेदखल कर दिया जाये। इसके लिए उनको सनद भी अता की जा सकती थी। उन्हें रिवार्ड दिया जा सकता था। दूसरा कांग्रेस पार्टी को हाईजैक कर लिया जाये।

इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए राजीव पर बेहद दबाव रखा गया। देशी नहीं विदेशी कम्पनियों की निष्ठा पर भरोसा करना ही इस बात को उजागर करता है कि लोगों के इरादे क्या थे। विदेशी कम्पनियां पैसे के लिए काम करती है। इन्हें जहां भी धंधा करने का अवसर मिलता है वो करती हैं और काम की मनचाही फीस वसूलती हैं। उस्ताद लोग इस बात से वाकिफ थे। उनका इरादा मनगढ़न्त रिपोर्ट लेने का था। पर देश का शासन चलाना कोई बच्चों का खेल तो है नहीं, त्याग और सेवा का, निष्ठा और लगन का, देशभक्ति और समाज सेवा का काम है। जो इन ताकतों से संभव नहीं था। इसलिए सत्ता हथियाते समय लगे तो थे पूरे जोश खरोश में, किन्तु दिन-ब-दिन शासन-तंत्र पर से पकड़ ढीली होती जा रही थी। एक-एक दिन भारी पड़ रहा था। सपने बिखरते नजर आ रहे थे। इसलिए उस ओर से कुछ ज्यादा हासिल होने वाला नहीं था। शुरूआती बंदर भभकियों के बाद राजीव के ब्लैकमेल की यह प्रक्रिया कुछ धीमी कर दी गई। मगर वह सरकार अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना सकी।

दूसरा प्रयास था कांग्रेस पार्टी को ही डकार जाने का। डायनेस्टी के विरूद्ध बगावत स्वयं कांग्रेसियों ने ही की थी, विपक्षी दलों ने नहीं। यह परिवारवाद उन्हीं कांग्रेसियों को खलता था जो कुनबापरस्त थे। जिनका विस्तृत परिवार उनके राजनैतिक औहदे की छत्रछाया में खूब फल-फूल रहा था। जो अपने लड़के-लड़की-बहू आदि सभी नाते-रिश्तेदारों को सत्ता में होने का पूरा पूरा फायदा पहुंचा रहे थे। जबकि इसके विरूद्ध मोती लाल नेहरु के वंशजों ने समय और जरूरतों के कारण राजनीति में प्रवेश किया जिससे कि प्रजातांत्रिक भारत फिर सामंतवाद की ओर न लौट जाये। उस वंश ने त्याग किया जबकि अन्य कांग्रेसियों ने सिर्फ भोग किया। कितने उदाहरण हैं जहाँ किसी कांग्रेसी ने आनन्द भवन जैसी अपनी निजी सम्पत्ति उस समय राष्ट्र को अर्पित कर दी जब रूपया कमाने के बहुत ज्यादा साधन ही उपलब्ध नहीं थे? इसके विपरीत कितने कांग्रेसी हैं जिन्होंने 1947 के बाद सत्ता का दुरूपयोग करके अपने लिए एक नहीं कई कई आनन्द भवन खड़े कर लिये – कुछ अपने नाम तो कुछ बेनामी? एक ने त्याग किया, दूसरों ने संग्रह।

कांग्रेस एक आन्दोलन या मूवमेन्ट रहा है। इसकी वैचारिक नींव बहुत मजबूत है। इसे महात्मा गांधी जैसे पारखियों ने परखा था। तरह तरह की परिस्थितियों में विचारधारा मजबूत होकर उभरी है। इसी कारण इसका पूरे देश में जनता से सीधा सम्पर्क है। खास बात यह है कि जनता शासन तंत्र को कांग्रेस विचारधारा के अनुरूप चलाये जाने का समर्थन करती है। पिछले 50-60 सालों में कई प्रकार के लोगों ने कई प्रकार की विचारधाराओं को आजमाया, वैचारिक गठबंधनों को आजमाया, पर एक भी अपने आप को जनता के मन-मस्तिष्क पर स्थापित करने में सफल नहीं हुआ। इसी कारण चतुर लोगों ने कई प्रयास किए कि किसी तरह साम, दाम, दण्ड, भेद से या तो कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुन लिए जायें या फिर पार्टी को अपने में मिला लिया जाये जिससे कांग्रेस के समर्थक उनके समर्थक बन जायें। व्यक्ति बिक सकता है पर विचारधारा नहीं। विचारधारा नष्ट हो सकती है अगर वह समाजोपयोगी न रहे। जैसा कि साम्यवादी विचारधारा के साथ हुआ है। इस राजनैतिक विचारधारा ने विश्व में समुदायों की आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया और झूठे प्रोपेगेन्डा के बल पर एक लम्बे समय तक सत्ता पर काबिज रहे, इसलिए त्राहि-त्राहि कर रही जनता ने साम्यवादी शासन व्यवस्था के खात्मे और प्रजातांत्रिक व्यवस्था का खुलकर समर्थन किया। कांग्रेस के हाथ गांधीवादी दर्शन लगा, जिसमें जवाहरलाल, श्रीमती इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने योगदान करके उसे और भी ज्यादा स्वीकार्य बना दिया था। बिना इन विचारों को अपने मस्तिष्क में स्थान दिए और उन पर आचरण किए कोई कैसे कांग्रेस संगठन का नेतृत्व कर सकता था? इसलिए हाईजैकिंग का यह प्रयास भी विफल ही हुआ।

राजीव गांधी के लिए यह काल काफी कठिन था। ऐसे समय में आत्म मंथन तो सभी करते हैं। पर सत्ताधारियों का दुश्मनी का रबैया काफी कष्टकारी था। बच्चे अभी छोटे थे। जिन्हें साथ लेकर चले थे वो एक-एक कर अपने लिए अलग-अलग रास्ते चुनने लगे थे। अब कांग्रेस सेवादल वाली भावना तो रह नहीं गई थी। सत्ता से अलग रहकर कांग्रेसी उतना ही जी सकता है जितना पानी से अलग रहकर मछ्ली। अतः नये नये राजनैतिक समीकरण बनने लगे थे। नई नई पार्टीयों का गठन होने लगा था, जो परिवार के पास पुनः सत्ता लौटने पर सबसे तेज दौड़कर लौट आने वाले थे। पर इस दौरान राजीव अकेले थे। उन्हें अपने समर्थकों में अपने कम ही दीखते थे जिनसे राय ली जा सके। ऐसे में उनका बखूबी साथ दिया उनकी पत्नी श्रीमति सोनिया गांधी ने। जिसने उनके साथ राजनैतिक संवाद स्थापित किया। अपनी पत्नी की राजनैतिक समझदारी, सूझ-बूझ से राजीव कुछ अचम्भित हुए। पर आश्वस्त भी हुए। बच्चे छोटे हों पर पत्नी समझदार हो तो आदमी संघर्ष कर सकता है चाहे उसमें जान को खतरा ही क्यों न हो। सोनिया में राजीव को एक सुधन्वा मंत्री मिल गया। सोनिया का प्रशिक्षण इंदिरा गांधी का अपने पुत्र को शायद सबसे ज्यादा मूल्यवान उपहार था। राजीव ने संगठन के काम में फिर से रूचि लेनी शुरू कर दी। तृणमूल स्तर पर समर्थकों में एक नये उत्साह का संचार होने लगा। षडयन्त्रकारी ध्वस्त हो चुके थे। स्थितियां तेजी से बदल रही थीं। जिम्मेदारी फिर से राजीव के कंधों पर पड़ने वाली थी। घबराये हुए षडयन्त्रकारी इसके लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं थे। उन्होंने इन्साईडर्स में से चाणक्य की तलाश शुरू कर दी। असल में कहते हैं लोग चाणक्य, पर यह आचार्य के प्रति अनादर व्यक्त करना है। चाणक्य ने जो कुछ किया वह राष्ट्रहित में किया। कभी अपना निजी स्वार्थ नहीं साधा। ये षडयन्त्रकारी तो मैकाईवेली के अनुयायी हैं। मैकाईवेली के बताये रास्ते पर चल कर इन्होंने सत्ता हथिया ली थी। उसी रास्ते में ये अपनी सफलता की आस रखते हैं। मैकाईवेली महोदय के राजनैतिक दर्शन का कुछ सिंहावलोकन करना हमारे लिए जरूरी होगा।

निकौल मैकाईवेली इटली में जन्में एक विश्व प्रसिद्ध राजनैतिक विचारक हुए हैं जिनका जीवन काल 1469-1527 ईस्वी था। इनके सबसे मशहूर ग्रन्थ के अंग्रेजी अनुवाद का शीर्ष है ‘‘दी प्रिंस’’। हम अपने लिए इस ग्रंथ को ‘‘राजा’’ कहना चाहेंगे क्योंकि यह राजा, उसके सत्ता हथियाने, उस पर काबिज रहने के बारे में जितनी विवेचना करता है उसी के कारण यह ग्रंथ इतना प्रसिद्ध हुआ है। इसमें उस समय के योरोपीय देशों के राजनैतिक घटनाक्रम के अनुसार बड़े ही कारगर एवम अचूक गुर प्रतिपादित किए हैं जिनका पालन करने वाला राजा सत्ताच्युत हो ही नहीं सकता था। उसके प्रतिद्वन्दी, विरोधी, चाटुकार, विश्वासघाती, दुश्मन कोई भी उसके सामने टिका नहीं रह सकता था। इन सिद्धान्तों की ऐसी धाक जमी है कि शब्दकोशों में मैकाईवेलियन या मैकाईवेली जैसा अथवा उसके बताये रास्ते पर चलने वाला, एक नया शब्द ही जुड़ गया है। आगे बढ़ने से पहले इस मैकाईवेलियन शब्द की विभिन्न व्याख्याओं को देख लेना आवश्यक होगा :

(क) राजनैतिक सत्ता पर काबिज रहने और उसका प्रयोग करने के लिए नैतिक मूल्यों की बात गौण विषय बन कर रह जाता है।

(ख) एक  अन्य प्रकार से यों भी कहा जाता है कि मैकाईवेलियन ऐसा राजनैतिक सिद्धान्त होता है जिसके अनुसार राजनैतिक सत्ता पाने और बनाये रखने के लिए धूर्तता, चालाकी, कांईयापन और सीधे-सीधे धोखाधड़ी न्यायोचित है।

इन दोनों व्याख्याओं से जो अर्थ ध्वनित हो रहा है उसका यही मतलब है कि आप सत्ता हथियाने के लिए चालाक और बेईमान तरीके अपनायें, चाहे लोगों को धोखा देकर ही सही।

अब लोकशाही के युग में बेईमानी, चालाकी, धूर्तता, धोखाधड़ी जैसे शब्दों के अर्थ बदल ही गये हैं। जब राजसत्ता लोकमत पर निर्भर करती हो तो यह और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है कि इन शब्दों के रूढ़ि अर्थ तक ही सीमित नहीं रहा जाये। मतदाताओं के मतों के बगैर कोई भी महत्वाकांक्षी व्यक्ति लोकतंत्र में सत्ता पर काबिज हो ही नहीं सकता है, उस पर बने रहना तो दूर की बात है। वोट या मत के लिए जनता को पसंद आने वाले नारे और मनभावन वायदे करने ही पड़ते हैं। अपने प्रतिद्वन्दी पर आक्षेप लगाने ही पड़ते हैं। आप इसमें ‘‘झूठ’’

या ‘‘धोखाधड़ी’’ देखते हैं तो इसमें आपका दोष है, मौकाईवेली ऐसा कुछ नहीं मानते। उनके अनुसार सत्ता हथियाने के लिए ये सब पापड़ बेलने ही पड़ते हैं। और दुनिया में एक भी लोकतंत्र ऐसा नहीं है जहाँ ऐसा आचार न किया जाता हो, भले ही इसे कानून के नजरिये से सभी देश गलत करार देते हों। सो देते हों देते रहें, सत्ता के लिए वोट और व्यापार में कम्पनी चलाने के लिए बोर्ड ऑफ डायरेक्टरों को शेयर होल्डरों का सपोर्ट या अनुमोदन तो चाहिए ही।

सत्य और अहिंसा के गांधीवादी सिद्धांतों की खुराक पाकर बड़ा हुआ हर भारतीय अपने नेतृत्व से सद-आचरण की अपेक्षा करता है। सो हर कोई नेता बात सत्य और अहिंसा की करता हो, चाहे गांधी के नाम पर वोट मांगता हो, उसका सत्तासीन होते ही व्यवहार एकदम उलट लगने लगता है। अख़बार, मीडिया, विधानसभा, संसद में उसकी अच्छी-खासी मज्जमत होती है। भ्रष्टाचार से लेकर हत्या करने या करवाने तक के आरोप लगते है, आरोप एक जैसे होते हैं, उनमें बदलाव नहीं आता, केवल उनका कहनेवाला और सुनने वाला बदल जाता है। जनता को मिलते हैं कोरे आश्वासन। तब लोग कथनी और करनी का भेद नहीं समझ पाते हैं। कारण है कि दुहाई भले ही गांधी के राजनैतिक दर्शन की दी जाती है, काम में मैकाईवेली के राजनैतिक सिद्धांत ही लाये जाते हैं। जनहित में, विशेष कर तरुण वर्ग के हित में, मैकाईवेली के सिद्धांतों का खुलासा करना जरूरी है। क्योंकि सारे सत्ताकांक्षी राजनैतिक दल युवजन को अपने प्रभाव क्षेत्र में लपकने के लिए हर तरह के प्रयास करते हैं, पर मैकाईवेली के सिद्धांतों का खुलासा नहीं करते हैं। अतः मैकाईवेली की कुछ उक्तियां जान लेना लाभप्रद होगा, जिनमें कुछ इस तरह है :

(i)                   वह व्यक्ति नष्ट हो जाता है जो किसी दूसरे के ताकतवर बनने का कारण या जरिया होता है।

(ii)                 एक राजा के पास अपनी प्रतिज्ञा भंग करने के लिए वैध कारणों की कमी नहीं होती है।

(iii)                प्रकृित कुछ ही लोगों को बहादुर बनाती है पर उद्योग और प्रशिक्षण बहुतों को बहादुर बना देते हैं।

(iv)                युद्ध में अनुशासन क्रोध से ज्यादा कारगर होता है।

(v)                 एक बेटा अपने पिता को सदा के लिए खो देने का गम धैर्यपूर्वक बरदाश्त कर सकता है पर अपने उत्तराधिकार खोने का नहीं।

(vi)                राजनीति का नैतिकता से कोई संबंध नहीं है।

(vii)              एक राजा को सारी कठोरता एक ही बार में कर देनी चाहिए जिससे कि कष्ट कम लगे। फिर हल्के हल्के बूंद बूंद उपकार करना चाहिये ताकि लोग उसका ज्यादा लुत्फ उठा सकें। इससे लोगों पर राजा का प्रभाव लम्बे समय तक रहता है। जैसे युद्ध, आपातकाल लागू करना आदि जिन्हें हटाकर मूल नागरिक और मानव अधिकार बहाल करना जैसा कि फौजी शासन के तहत किया जाता है।

(viii)             महत्वाकांक्षा एक ऐसा जनून है जो कभी पूरा नहीं होता।

(ix)                ज्यादातर लोग दिखावे से प्रभावित और संतुंष्ट हो जाते हैं और उसी को सच मान लेते हैं। ऐसे लोग ढोंगियों से ज्यादा प्रभावित होते हैं वनिस्पत सच्चे व्यक्तियों के।

(x)                 दुनिया में केवल सशत्र देवी-देवता-पीर-पैगम्बर ही विजयी रहे हैं, शस्त्र-विहीन पैगम्बर तो नष्ट कर दिये गये।

(xi)                अगर किसी को चोट पहुंचानी हो तो इस तरह प्रचंड हो कि उस व्यक्ति द्वारा प्रतिशोधात्मक कार्यवाही का भय ही न रहे।

(xii)              बेहतर है कि लोग राजा से डरें भले ही उससे प्रीति न करें, अगर दोनों संभव न हों तो।

(xiii)             जिसने पहले नींव नहीं डाली वह हो सकता है बाद में योग्यतानुसार ऐसा कर ले, किन्तु ऐसा वह वास्तुकार को परेशान और भवन को क्षति पहुंचाकर ही कर सकता है।

(xiv)             आदमी केवल देख कर ही निर्णय कर लेता है वनिस्पत छू कर, जबकि ऑख केवल देख सकती है और हाथ महसूस भी कर सकते हैं। आप कैसे दिखते हैं यह सभी देख सकते हैं पर आप कैसे हैं यह शायद ही कोई।

(xv)              चापलूसी से अपनी सुरक्षा का एक ही उपाय है कि आप लोगों को यह विश्वास दिला दें कि उनके सच बोलने से आप रूष्ट नहीं होंगे। लेकिन अगर हर कोई सच ही बोलने लग जायेगा तो आप उनके सम्मान के पात्र नहीं रह पायेंगे।

(xvi)             जब न तो लोगों की सम्पत्ति और न ही उनका सम्मान ही आहत हो तो ज्यादातर लोग सन्तुष्ट जीवनयापन  करते हैं।

(xvii)          अधिक पाने की उत्कट इच्छा स्वाभाविक है। जो इसमें सफल हो जाते हैं उनकी तारीफ की जाती है। जो केवल चाहते हैं पर करते कुछ नहीं हैं उनकी आलोचना की जाती है।

(xviii)          क्या किया जाना चाहिए और क्या किया जाता है, के बीच सामंजस्य बिठाकर ही कोई आत्म रक्षा कर सकता है अन्यथा आत्मदाह ही करता है।

(xix)            लोग दूसरों के बताये रास्ते पर चल कर और उनकी नकल करके ही आगे बढ़ते हैं भले ही उनके समतुल्य काम न कर सकें। इसलिये समझदार व्यक्ति को ऐसे ही आदर्श पुरूषों के चरण-चिह्नों पर चलना चाहिए जिससे कि अपनी कमजोरियों के कारण उसकी निजी असफलता में भी एक बड़प्पन की झलक दिखाई पड़े।

(xx)             तीन तरह की अक्लीयतें होती हैं। एक वह जो खुद चीजों को अपने आप समझ ले। दूसरी वो जो दूसरों की समझदारी का फायदा उठा ले। तीसरी वो जो न खुद समझ सके न औरों से सीख सके। पहले उत्तम पुरुष, दूसरे मध्यम पुरुष और तीसरे निम्न पुरुषों की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

(xxi)            जो व्यक्ति हर प्रकार से सदाचरण करना चाहता है वह उन लोगों से घिरा होने पर एकदम चौपट हो जाता है जो नेक नहीं होते हैं।

(xxii)          कोई भी नया काम करने से ज्यादा खतरनाक काम नहीं है क्योंकि उसके परिणाम अनिश्चित होते हैं। ऐसे में पहले से सफलतापूर्वक काम कर रहे लोगों को वह दुश्मन प्रतीत होता है जबकि उसका साथ देने वाले संशय के कारण ज्यादा उत्साहित ही नहीं होते हैं। लोगों की अविश्वसनीयता किसी भी नये काम में शिथिलता पैदा करती है।

(xxiii)         किसी भी राज्य की पुख्ता नींव उसका स्वस्थ विधि-विधान और अपार शस्त्र भंडार होते हैं। जहाँ राज्य शस्त्र संपन्न नहीं होता वहाँ विधि-विधान कमजोर होता है। इसी तरह जहाँ विधि-विधान कमजोर होता है राज्य शस्त्रों से परिपूर्ण नहीं होता।

(xxiv)          ऐसा राजा जो केवल पड़ोसी राजाओं के शब्दों पर विश्वास कर बैठता है वह अपनी सुरक्षा के साथ समझौता कर लेता है। दुर्दिन में इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

(xxv)           एक राजा को शेर की तरह भेड़ियों को भयभीत करने वाला होने के साथ-साथ लोमड़ी की तरह शिकारी के जाल को पहचान लेने वाला होना चाहिए।

(xxvi)          सभी इस बात की प्रशंसा करते हैं कि राजा को अपने वचन का पालन करने वाला होना चाहिए और ईमानदारी से रहना चाहिए न कि धूर्तता से। फिर भी अनुभव बताता है कि ऐसे राजा विपरीत व्यवहार करने वालों की बातों पर विश्वास करके अपना राज्य गंवा चुके हैं।

(xxvii)        प्रतियोगिता दो ही तरीकों से संभव है। पहला कानून के बल पर तो दूसरा ताकत के बल पर। पहला आदमी के लिए, दूसरा जानवरों के लिए। पर चूंकि पहला बहुधा काफी नहीं होता इसलिए दूसरे का सहारा लेना ही पड़ता है।

(xxviii)       एक राजा को ऐसे व्यवहार करना चाहिए कि उसकी प्रजा उसकी सतत आवश्यकता महसूस करती रहे।

(xxix)          हमने अपने जीवन में कोई बड़ा काम होते नहीं देखा सिवाय तबके जबकि उसे उन लोगों ने न किया हो जिन्हें बहुत घटिया माना गया हो।

(xxx)           एक व्यक्ति का इससे ज्यादा सम्मान नहीं हो सकता कि उसने नये विधान स्थापित किये। अच्छा होने के कारण ये उसका मान बढ़ाते हैं।

(xxxi)          भाग्य पर कम से कम निर्भर रहने वाला व्यक्ति सबसे ज्यादा शक्तिशाली होता है।

(xxxii)        लोक उद्यमों से बढ़कर कोई अन्य चीज राजा का मान नहीं बढ़ाती।

(xxxiii)       राजा को प्रजा की घृणा और तिरस्कार का पात्र नहीं बनना चाहिए। उसे दुलमुल, तुच्छ, टुच्चा, घटिया, संशयग्रस्त नहीं दिखना चाहिए। बल्कि उसमें दृढ़ निश्चयी, महान, साहसी, गंभीर और धीर व्यक्ति की छवि दिखाई पड़नी चाहिए।

(xxxiv)       भगवान हमारे लिए सब कुछ करने को तैयार नहीं है क्योंकि यह हमसे हमारी स्वतंत्र इच्छा नहीं छीनना चाहता और न ही हमारी कीर्ति से हमें वंचित करना चाहता है जो हमारे हिस्से की है।

एक यथार्थवादी राजनीतिज्ञ और राजनैतिक विचारक निकौल मैकईवेली के विचार योरोप में आगे चलकर काम में लाये जायेंगे। योरोपीय सभ्यता, संस्कृति के सम्पर्क में आने वाले लोग ऐसी अनेक उक्तियों को चुनेंगे और फिर उन पर अमल करेंगे। भारतीय दर्शन, शास्त्र, पुराण, इतिहासों में इस प्रकार के विचारों का दिग्दर्शन अवश्य होता है किन्तु प्रवर्तन नहीं। हमारे यहां राजनीति का धर्म सम्मत और न्यायपूर्ण होना ही प्रतिपादित किया गया है। इसी कारण व्यष्टिपरक नहीं समष्टिपरक नीतियों को ही स्वीकारा, सराहा और स्थापित किया है। इसी कड़ी में जुडता है गांधीवाद।

कथनी-करनी में जो फर्क दृष्टिगोचर होता है गांधीवाद का उवाच और मैकाईवेलीवाद का व्यवहार करने के कारण है।


8

उभरती स्थितियाँ


इस ग्रन्थ की रचना के दौरान भारत में राजनैतिक परिदृश्य बहुत तेजी से बदला जिसका जिक्र जरूरी है। एक तेज घटनाक्रम में राजीव की पत्नी श्रीमती सोनिया गांधी को अपनी लोक सभा की सदस्यता छोड़नी पड़ी थी। साथ ही उन्होंने वर्तमान सरकार की नेशनल एडवाईजरी काऊंसिल के अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया। चाल इतनी सफाई से चली गई थी कि खुद सोनियां गांधी भी नहीं समझ पाई कि सिर पर चोट कैसे लगी। असल में डाईनेस्टी को सत्ता नहीं वल्कि सत्ता के प्यासों को डाईनेस्टी की जरूरत है। श्रीमती सोनिया गांधी या नेहरु परिवार का कोई भी व्यक्ति महत्वाकांक्षाओं को फलीभूत होने में सहायक हो सकता है। पर वो तभी तक सुरक्षित है जब तक कि अपनी महत्वाकांक्षाओं को सीमित रखें। श्रीमती सोनियां गांधी पहली बार प्रधान मंत्री बनते-बनते रह गईं। फिर जब कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष बन गई तो समीकरण बदलने लगे थे। पर उनके पॉव में बेड़ी डालने के लिए औतोवियो क्वात्रोची के खाते खोलने और उनके प्रत्यार्पण संबंधी निर्णय काफी सोच समझ कर चली गई चालें थी। ग्यारह सांसदों की सदस्यता समाप्त करवा कर प्रतिशोध को भड़काने वालों ने उन्हें तोष करवाया होगा, पर इस राजनीति की गूढता और पेचीदगीयां ज़ाहिर नहीं की होंगी। घृणा फैलाकर अपने हित साधने वाले बड़ी संख्या में राजनीति के व्यवसाय में हैं। श्रीमती जया बच्चन की राज्य सभा सदस्यता समाप्त करवाकर चाल चलने वालों ने सोनियां गांधी के लिए गढ्ढे खोद दिये थे, जिनमें उनका गिरना तय था। सोनियां गांधी समय रहते संभल न गई होती तो ज्यादा नुक्सान होता। इस्तीफा देकर उन्होंने अपनी ही आस्तीन के सांप का ज़हर उतार कर रख दिया। अब मूल्यों, नैतिकता, आदर्श और विचारधारा का ढिंढोरा पीटने वाले इस्तीफा देने से कतरा रहे हैं। लाभ के पद की व्याख्या अपने अपने तरीके से कर रहे हैं। सोनिया के लिए (या नेहरु परिवार के किसी सदस्य के लिए) व्याख्या ये करते हैं, पर अपने लिए ये अदालत को भी यह हक नहीं देना चाहतें हैं, बल्कि कानून बनाकर अपने आप को सुरक्षित कर लेना चाहते हैं।

इससे कांग्रेस एक बार फिर हाथ से फिसलते-फिसलते बच गई है। कितनी बार हो चुका है इसके अपहरण का प्रयास। कितनों ने अलग होकर नई पार्टियां बना ली हैं? सभी ने ‘‘कांग्रेस’’ शब्द अपने दल के नाम के साथ लगा कर रखा। जब कांग्रेस को मजबूत होते देखते हैं तो फिर से उसमें शामिल भी हो गये और अपने दल का कांग्रेस में विलय भी कर दिया। पर एक सच्चाई कभी नहीं बदल सकेगी : हलधर बैलों की जोड़ी कांग्रेस का प्रतीक फिर से नहीं बन सकेगी।


9

स्पष्टवादी राजीव


राजीव एक नवयुवक था जो सचमुच बहुत जल्दी में था। वह जल्दी-जल्दी बहुत कुछ कर लेना चाहता था। ऐसे लोगों को या तो कुछ पूर्वाभास होता है कि उनके पास समय कम है या ईश्वर उनसे कम समय में ज्यादा काम करवा लेता है क्योंकि उसे उनकी उम्र के बारे में पता होता है। लेकिन जल्दी जल्दी इतने सारे सुधार बहुत से लोगों के हितों को चोट पहुंचा रहे थे। लोग पुरानी परिपाटी पर चलते हुए देश और प्रदेशों में शासन का संचालन कर रहे थे। उनके लिए नई सोच, नये विचार, नये कार्यक्रम और कार्यशैली स्वागत योग्य हो ही नहीं सकते थे। वो भी जानते थे कि केन्द्र सरकार की योजनाओं का लाभ जनता तक केवल पन्द्रह प्रतिशत से ज्यादा नहीं पहुंच पाता था। पर शेष पच्चासी प्रतिशत कोई एक व्यक्ति तो नहीं डकारता था। उसके लिए अतिरिक्त नियम-कानून थे, जिनका उल्लंघन दण्डनीय होता था। एक-एक पैसे का हिसाब मुंह-जुबानी याद रहता था। फिर क्या जरूरत थी राजीव को सार्वजनिक तौर पर यह कबूल करने की कि 85% धन का क्षरण हो जाता है और केवल 15% लक्षित समूहों या व्यक्तियों तक पहुंचता है? कौन नहीं जानता था कि रक्षा सौदों में दलाली होती रही है? फिर क्यों बिचौलिये प्रतिबंधित किये गये? बिना तिकड़म भिड़ाये कोई बिचौलिया नियुक्त हो सकता है क्या? सरकारी कार्यालयों में एक टैक्सी तो किराये पर रखी नहीं जा सकती, बिचौलिये कैसे प्रवेश पा सकते है, रक्षा मंत्रालय में बिना आकाओं के वरदहस्त के? क्या पुराने लोगों को जल्दी काम निपटाना नहीं आता? सारा काम जल्दी जल्दी निपटा दिया जायेगा तो लोग निकम्में नहीं हो जायेंगे? फिर ये उदारीकरण तो सारा धन्धा ही चौपट कर देगा। ऊपर से श्रीमान तीन – चौथाई बहुमत लेकर संसद में पहुंच गये। इनका वारिस भी है और बेटी इंदिरा जी पर गई है। स्थिति विकट लगने लगी। लोग जल्दी कुछ उपाय करने के लिए आकुल व्याकुल होने लगे। मंत्रणाये हुईं। योजनायें बनीं। और बेचारे राजीव की सरकार के लिए संकट पर संकट लाये गये। चुनावी स्थिति बिगड़ी। और अन्ततोगत्वा एक मनहूस सुबह उनकी नृशंस हत्या कर दी गई………. !


10

राजीव हत्या के बाद


राजीव की हत्या का खूब फायदा उठाया कांग्रेस ने। सरकार भी बनाई। लेकिन सोनियां गांधी को धमकाने और आक्रांत करने के प्रयास किये जाते रहे। अपने आपको और आपस में एक दूसरे को चाणक्य कहने मानने वालों ने अपनी बुद्धि को इतना बलवान मान लिया कि उन्होंने अपनी सत्ता को दीर्घजीवी ही मान लिया था और वह भी बिना नेहरु परिवार के किसी सदस्य के। चूक उनसे यहीं हो गई। मुगालता कि इससे बड़ी मिसाल नहीं है। बिना नेहरु परिवार के सदस्य के अपने-आप को कांग्रेसी कहने वाले आपस में मिल बैठकर एक प्रधान मंत्री का चयन भी नहीं कर सकते हैं! उनके अहम ऐसा नहीं करने देंगे। उनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। इसीलिए उन्हें नेहरू परिवार के एक सदस्य की जरूरत हमेशा बनी रहती है। उसके सहारे, उसके इर्द-गिर्द रहकर वो अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में सफल होते हैं। नेहरु परिवार के सदस्य से उन्हें शक्ति मिलती है, उनकी जड़े मजबूत होती हैं, वो पनपते हैं, पल्लवित-पुष्पित-फलित होते हैं। इसलिए हर बार किसी न किसी डायनेस्टी के सदस्य के इर्द-गिर्द इकट्ठे होते रहते हैं। कई तो ऐसे भी हैं जो सोनियां गांधी, राहुल गांधी जिन्दाबाद के नारे जोरों से अवश्य लगाते हैं पर पूछने पर यह भी नहीं बता पाते हैं कि राहुल किसके पोते हैं, किसके नाती हैं।

ये भक्तगण सोनिया को या राहुल को इतने ऊंचे स्थान पर चढ़ा देना चाहते हैं जहां से केवल कूदा ही जा सकता है, उतरना संभव नहीं है। मसलन इनको महात्मा गांधी या जवाहरलाल नेहरु के समकक्ष या उनसे बड़ा करके पेश करना अथवा देवी-देवताओं-राष्ट्रीय नायकों (लक्ष्मी बाई) के समकक्ष या रूप में पेश करना। जो कोई ऐसा करता है वह उस व्यक्ति का अहित करता है क्योंकि अभी तक ऐसा कोई नहीं जन्मा है जो इतनी ऊंचाईयों पर पहुंच गया हो। बेकार के ढोल पीटने से आम आदमी के मन में वितृष्णा पैदा होती है। जब तक कि मन्तव्य ही सोनिया या राहुल के प्रति जन मानस में घृणा पैदा करना न हो ऐसा करना उचित नहीं है। पर अगर गुप्त मंसूबों को फलीभूत करने के लिए ये हथकंडे अपनाये जा रहे हों तो यह षडयंत्र नीति के अनुरूप ही है।

श्रीमती सोनिया गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बने रहना उनके और उनके परिवार के हित में है। क्षत-विक्षत होकर भी कांग्रेस अभी भी भारत की आम जनता की, पहली पसंद है। कारण उसके पास गांधी और नेहरु की विरासत है। इस विरासत को लाल बहादुर शास्त्री, श्रीमती इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, राजीव गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी ने संजोकर रखा है। राष्ट्रीय स्तर पर अधिकतर नीतियां गांधीवादी दर्शन से प्रेरित है। गांधीवादी दर्शन में आस्था और श्रद्धा कांग्रेस के विरोधी खेमों में होना देश के लिए शुभ संकेत है। इसलिये कांग्रेस के मूल्यों को व्यवहार में लाकर स्वस्थ और स्वच्छ शासन उपलब्ध कराना संभव है। अनाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार भारत जैसे देश में बहुत दिन तक नहीं चलता। यहाँ केवल न्याय का शासन ही संभव है। जो लोग मैकाईवेली सिद्धांतों का अनुसरण कर कुछ समय के लिए सफल हो भी गये उनका शासन अल्पावधि का ही रहा। ऐसे तत्व आँधी की तरह आते भले ही हैं किंतु तूफान की तरह चले भी जाते हैं। ये बदनीयत लोग अपने नेकनीयत नेता को धोखे से उखाड़ तो फेंकते हैं क्योंकि वो इनके शब्दों पर भरोसा करने की भूल कर बैठता है, इनकी सूरत देखता है, सीरत नहीं और मात खा जाता है। पर एक बार इनकी असलीयत खुली नहीं कि इनका काम यूं ही तमाम हो जाता है।

नेहरू परिवार चाहे या न चाहे, लोग चाहें या न चाहें, राजीव की पत्नी और बच्चों में से किसी न किसी को राजनीति में बने रहना ही होगा। यही कम्पलशन है। ऐसे में उनके पास दो विकल्प रहेंगे : पहला यह कि जनता से सीधा सम्पर्क साधा जाये, जैसा नेहरू जी या इंदिरा जी का था। दूसरा ये कि पार्टी में जमे हुए बिचौलियों के माध्यम से राजनीति करते रहें। दूसरे में बदनामी के साथ-साथ नुकसान की अधिक आशंका है। जिस तरह राजीव पर बोफोर्स का कीचड़ फेंका गया, उसी तरह क्वात्रोची के खाते खोलने का कीचड़ सोनिया पर फेंका गया है। क्या नतीजा निकलता है ये देखने की बात है। नुकसान राजीव की सरकार गई और सोनिया की लोकसभा सदस्यता। नेशनल एडवाईजरी काऊंसिल बनाया जाना और सोनिया  को उसका अध्यक्ष बनाकर केबिनेट मंत्री का स्तर दिया जाना भविष्य में आंका जायेगा। हो सकता है सोनिया को इसका मूल्य चुकाना पड़े। फिलहाल उनका उस पद से त्यागपत्र देना समझदारी का कदम रहा है। पुनः उसी पद पर लौटना इतिहास के मूल्यांकन का बिषय रहेगा। इसलिए अब उन्हें जनता से सीधा संबंध स्थापित करना होगा। यह संबंध वोट, नोट, कम्बल, शराब आदि का नहीं, बल्कि जवाहरलाल नेहरू के स्तर का होगा तभी काम बनेगा। अभी जिसे त्याग कहा जा रहा है वह त्याग नहीं कुशल राजनीतिक पैंतरा है। किंतु सचमुच का त्याग करके जनता से जुड़ना आज भी संभव है। नेहरू उस परिवार से थे जिन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति राष्ट्र को समर्पित कर दी। कोई धन इकट्ठा करके या सम्पत्ति बटोर कर जनता से संबंध कायम करने की सोचता है तो मूर्खता करता है। यहाँ तो साधु-फकीरों को आदर देने की परम्परा है। एक का त्याग अगर अनेक के सुख का साधन बन सके तो अच्छा ही है।

जनता से सीधा संबंध कांग्रेस की नीतियों का ईमानदारी से पालन करके किया जा सकता है। कथनी और करनी का फर्क मिटाकर ऐसा करना संभव है। शुद्ध आचरण गांधी के बताये रास्ते पर चलकर करना ही होगा। हिंसा और भ्रष्टाचार भारतीय समाज के दैनिक आचरण में से मिटाना ही होगा। हिंसक और भ्रष्ट व्यक्ति को स्वतः इतनी शर्म आनी चाहिए कि वह सिर झुकाकर ही चल सके। ऐसे समाज का निर्माण संभव है। अगर कांग्रेस पार्टी को पुनर्जीवित और पुष्ट करना है तो समझौतावादी आचरण छोड़कर शुद्धता का व्यवहार अपनाया जाना चाहिए। सोनियां गांधी ऐसा कर सकती है। ऐसा करने में उनका व्यक्तिगत नुकसान नहीं, बल्कि उत्कर्ष ही होगा। साथ ही उनका परिवार अधिक सुरक्षित रहेगा। राजीव का इक्कीसवीं सदी का भारत बनाना ही होगा। अभी यह सिलसिला टूट गया है, प्रवाह अवरूद्ध हो गया है, गति शिथिल हो चुकी है, काम की जगह शब्दजाल बुने जा रहे हैं। इसलिये काम करके, जनता से सीधा सम्पर्क  साध कर और शुद्ध आचरण का उदाहरण पेश कर पुनः कांग्रेस की विजय सुनिश्चित करनी होगी, जिससे विकास की गति वैसी हो सके जैसी राजीव ने सोची थी।

अगर भविष्य में होने वाले खतरों का आकलन भी कर लिया जायेगा तो समीचीन होगा। गांधी की अहिंसा को भुलाकर देश अति हिंसक हो गया। राजनीतिक हिंसा, सामाजिक टकराव, आर्थिक भ्रष्टाचार आदि ने मिलकर आम आदमी का विश्वास न्याय, कानून, शासन, राजनीति, नेताओं सभी पर से उठा दिया है। यहाँ तक कि अंतिम आस न्यायालयों पर से भी उसका विश्वास कमजोर पड़ता जा रहा है। ऐसे में अहिंसा की व्यवहार्यता में पुनः जनता का विश्वास स्थापित करना पड़ेगा, जो तभी संभव है जब सारे नेता और उनके दल हिंसा छोड़कर अहिंसा का आचरण करें।

एक अन्य खतरा है हमारा पैंडुलम की तरह एक अति से दूसरी अति की ओर झूलना। एक बार राष्ट्रीयकरण करते हैं तो दूसरी बार निजीकरण करते हैं। इसमें अदूरदर्शिता स्पष्ट झलकती है। थोड़े से लोगों के स्वार्थ के लिए इस तरह से कानून और नीतियों से खिलवाड़ करना उचित नहीं है। वैश्वीकरण को ढाल बनाकर इस तरह के काम नहीं किए जाने चाहिए। निजीकरण करते समय राष्ट्रहित ही सर्वोपरि होना चाहिए।

एक अन्य खतरा है सब कामों की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र या गैर सरकारी क्षेत्र को सौंपने में। यह मानना कि निजी क्षेत्र ज्यादा सक्षम, कुशल या ईमानदार है सरासर भ्रामक है। सरकारी काम केवल लाभ कमाने के लिए किया जायेगा तो राजकोष में इतना धन एकत्रित हो जायेगा कि रखने के लिए जगह कम पड़ जायेगी। सरकारी क्षेत्र को उतनी ही स्वतंत्रता से काम करने की इजाजत मिल जाये तो सारा निजी क्षेत्र सरकारी नौकरी करने लगेगा और निजी क्षेत्र में काम करने को कोई राज़ी भी नहीं होगा। जो सम्पत्ति और ढांचा मेहनत और राजस्व से तैयार किया है उसे लाभ कमाने के लिए निजी क्षेत्र को सौंपना भविष्य में समाज में कलह और देश में अशांति का कारण बनने वाला है।

शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं से जनता को वंचित कर देने पर उपद्रव बढ़ेंगे। अभी हालात कम चिंताजनक नहीं है। इनको मुनाफा कमाने का साधन बनाना देश हित में नहीं होगा। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर बढ़ाकर हम सुरक्षा व्यवस्था पर खर्च के बोझ को कम करेंगे जो अन्यथा कई गुना बढ़ जायेगा। न्याय व्यवस्था चरमरा रही है। तुरंत, बिना व्यय के न्याय मूल मानव अधिकार है। उसके लिए पैरवी और फीस की संकल्पना पैसा कमाने का धंधा है जिससे अनैतिकता बढ़ती है। अनैतिकता से चरित्र हनन होता है, जो हिंसा का कारण बनता है। हिंसा से सुरक्षा खतरे में पड़ती है।

रोजगार के साधन और अवसर उपलब्ध कराने होंगे। शब्द उछालने भर से काम नहीं चलेगा। लोगों का धैर्य टूट रहा है। अगर शीघ्र ही इसकी व्यवस्था नहीं हुई तो अराजकता का माहौल बनेगा। नक्सलवाद कहाँ से शुरू हुआ और कहाँ जा पहुंचा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक कोई क्षेत्र नहीं बचा है। कहाँ बेरोजगारी की समस्या ने जन-जीवन असुरक्षित नहीं बनाया हुआ है? इनसे निपटने के उपाय ढूढने होंगे।

बाहरी ताकतों से खतरे बने ही रहेंगे। हमारी गरीबी और सम्पन्नता दोनों ही से उनके मुंह में पानी आता है। अगर हमारे पड़ोसी देश साथ दें तो विकास पर खर्च बढ़ाकर संसाधनों का उपयोग बढ़ाया जा सकता है। विश्व में बनते-बिगड़ते समीकरण हमें प्रभावित करेंगे ही।

आज वैश्विक दुराचार ने जहां एक ओर एड्स जैसी भयंकर बीमारियां फैलाई हैं वहीं दूसरी ओर आतंकवाद को बढ़ावा दिया है। आतंकवाद अपने आप में एक व्यापार बन चुका है। इसकी शुरूआत हथियार और विध्वंसक निर्माताओं के लिए नये-नये मार्केट खोजने के लिए हुई थी। अब यह सभी के लिए लाभ का सौदा बन चुका है। नैनोटेक्नोलॉजी के युग में यह और भी पनपेगा। इन खतरों से हमारा अस्तित्व और खुशहाली प्रभावित हो सकते हैं। इनके निशाने पर प्रमुख नेता और विशिष्ट व्यक्ति हो सकते हैं। इन्हें राजनीति में नीति याद न रहे पर यह अवश्य याद रहेगा कि राजनीति में सब कुछ चलता है।

सच कहें तो देश को भी और नागरिकों को भी खतरा सिर्फ मैकाईवेली बिग्रेड से ही है जो आज राजनीति कर रही है और जिसके कारण गांधीवाद के साधक पीछे हटते चले गये और ये लोग हर स्थान पर कब्जा करते चले गये। हमें गांधीवाद की पुनः स्थापना करनी होगी। उस परम्परा, विचारधारा और सेवाभाव से उन्नति करनी होगी। खतरों से हम सदा से ही खेलते आये हैं। पर इस शताब्दी में और आने वाली शताब्दियों में उन्नत भारत के लिए हमें शुद्ध आचरण पर जोर देना होगा जो सिर्फ गांधीवाद से ही संभव है। हमारा भविष्य उज्ज्वल है। हम अपने घर में ही दीपक नहीं उजासते हैं बल्कि अपने पड़ोसी के घर-आँगन में भी रौशनी करते हैं। गांधीवाद विश्व को भी ऐसा प्रकाश देकर भारत की वसुधैव कुटुम्ब की भावना की प्राप्ति करायेगा।


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कांग्रेस की मजबूरी


कांग्रेस पार्टी में जब भी नेतृत्व का सवाल उठेगा, आपसी गुटबाजी उसे विफल कर देगी और फिर से सभी गुटों के सूत्रधारों को नेहरू परिवार के अंश को ही सामने खड़ा करना होगा, चाहे वह व्यक्ति कम उम्र, कम-तजुर्बेकार ही क्यों न हो। नेहरू के बाद कौन? किसी न किसी रूप में मुंह बाये सामने खड़ा मिल ही जायेगा।

सोनिया को फांसने के लिए एक एक कर बिछाये गये जाल :–

1)     प्रधान मंत्री बनाने के ख्वाब दिखाना;ताकि लोग आंदोलन करें और उनका विदेशी मूल का होना मुद्दा बन सके|

2)     2004 में महज मंत्रिमंडल के निर्णय के तहत राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन किया जाना। इसके लिए न तो संसद ने कोई अधिनियम पारित किया, न ही राष्ट्रपति ने कोई अधिसूचना ही जारी की। उसका खर्च प्रधानमंत्री कार्यालय से होना था और उसके खर्च का भारत के महालेखाकार द्वारा जांच भी नहीं किया जा सकता। सोनिया को कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा दिया गया, जिससे उन्हें सरकारी दस्तावेज देखने की शक्तियां मिल सकें। उनको भारत सरकार के एक सचिव, संयुक्त सचिव के अलावा दसीयों सेवानिवृत्त सचिव स्तरीय अधिकारियों की सेवायें उपलब्ध कराई गईं। यानी उन्हें यह दर्शाया गया कि प्रधान मंत्री न बन सकीं तो न सही मगर आप हैं प्रधानमंत्री से भी बड़ी। सरकार के सारे कार्यकलाप आपके सूक्ष्म परीक्षण के दायरे में ही लिये जा सकेंगे और आप जो निर्णय लेंगी सरकार उन्हें लागू करेगी।

3)     औतेवियो क्वात्रोची के खातों को खोल देना,ताकि उन पर बोफोर्स दलाली की तोहमत जनमानस में लगाई जा सके। राजीव पर अब हमला करना बेमानी है। क्वात्रोची भी ईटालियन है। भारतीय जनता तुरंत दोनों में सांठ-गांठ जोड़ लेगी। विपक्ष, विशेष कर भारतीय जनता पार्टी, इस मामले को उछालेगी और कांग्रेसी जितना सोनिया के पक्ष में बोलेंगे, जनता का शक उतना ही मजबूत होता जायेगा। उससे सोनिया पूरी तरह बदनाम हो जायेगी – उसकी छवि जनमानस में एकदम धूमिल हो जायेगी।

परिणाम वही हुआ जो चाहा गया। जनमानस और मीडिया पर यह प्रभाव पडा़ कि सोनिया सत्ता की भूखी है और अब वह सुपर प्राईम मिनिस्टर बन गई है।

इंदिरा गांधी से इमरजेंसी लागू करवाने वाले तत्व इस बात का महत्व जानते थे, क्योंकि उन्हें मालूम था कि इमरजेंसी के समय एक बात जो सार्वजनिक चर्चा का विषय बनी वह थी गैर-संवैधानिक सत्ता के केन्द्र| एन.ए.सी. या राष्ट्रीय सलाहकर परिषद बनाकर इस निर्गुण स्वरूप को अब सगुण रूप दिया गया। भारतीय संविधान को ध्वस्त  करने का इससे बड़ा दूसरा उदाहरण नहीं है। इस बात पर टिप्पणियाँ भविष्य ही करेगा कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद पूर्णत असैंबैधानिक संगठन है और उसकी सारी कार्यवाहीयां भी गैर-सवैधानिक हैं। मगर सारे मंत्रालय/विभाग किसी न किसी तरह परिषद से या तो सलाह करते रहे हैं या उसको रिपोर्ट भेजते रहे हैं। ये परिषद सरकार के भीतर सरकार  का नमूना है।

4)  आिफस आफ िपरािफट यानी लाभ का पद का मामला, जिसमें सोनिया फंसते-फंसते निकल गईं हैं, मगर यह नहीं कहा जा सकता कि फंसी नहीं हैं। जो जया बच्चन के साथ हुआ वही सोनिया के साथ कभी भी किया जा सकता है, परिस्थितियां अनुकूल होने पर आवश्यकतानुसार शिकंजा कसा जा सकता है। परिषद का गठन गैर-संवैधानिक है यह बताना कानून मंत्रालय का काम था। मगर इरादे नापाक हों तो सही सलाह कौन देगा? सौभाग्य से सोनिया समय रहते इस जाल को भी काट कर निकल जाने में सफल हो गई।

5)  अभी अन्य कई प्रयोग किये जायेंगे। मगर एक अचूक अस्त्र जो इनके शस्त्रागार में सुरक्षित रखा है वो है चरित्र हनन| इसका प्रयोग इंदिरा गांधी के खिलाफ जमकर किया गया। जो कुछ कहा गया वह दूषित प्रवृत्ति का परिचायक था। अब लक्ष्य शायद सोनिया न रहे, क्योंकि उन्हें सफलतापूर्वक प्रधानमंत्री पद से सदा के लिए अलग कर दिया गया है। अब निशाने पर राहुल के होने की आशंका है।

सत्ता के गलियारों में चाटुकार और षडयंत्रकारी सदा से सभी समाजों में रहते आये हैं। भारत में भी रहे हैं। पर जब से भारत स्वतंत्र हुआ तब से व्यक्तिगत कौशल के ये खेल समूह, दल और संस्थागत होते चले गये हैं। आज ये बेहद कुशल बन चुके हैं। इसका कारण भारतीयों की स्वतंत्रता की अभिकल्पना है जो दरअसल स्वच्छंदता के दायरे में आती है। यहाँ कभी कोई कोड नहीं रहा जिसमें लोगों की आस्था रहती। अंग्रेजों ने पहली बार हमारे लिए इंडियन पीनल कोड और कोड आफ सिविल प्रोसीजर बनाकर दिया। चूंकि उसे हमारे दुश्मन अंग्रेजों ने बनाया था इसलिए उसकी उपेक्षा और तिरस्कार करना जायज समझते हैं। रही सही कसर कोर्ट-कचहरी-पुलिस-वकील-जज पूरी कर देते हैं। हमारे यहाँ सही मायनों में जो संस्कृति है उसे ‘‘आया राम गया राम’’ संस्कृति कहकर व्यक्त किया गया है। इस संस्कृति का प्रभाव दिल्ली में सबसे ज्यादा देखने को मिलता है क्योंकि दिल्ली न केवल भारत की राजधानी है अपितु सत्ता का केन्द्र भी है। सभी दलों की हाईकमांड यहीं से आपरेट करती है। यहांँ के चाटुकार-षडयंत्री-आपरेटर जिम्मेदार पदों पर आसीन लोगों को यही पाठ पढ़ाते हैं कि वो कुछ भी करने में सक्षम हैं। कुछ भी कर सकते हैं, वो सर्वसत्तावान हैं। कभी कोई कानून या नियम उनके सामने रखता है तो ये आपरेटर उन्हें सीधा-सीधा गलत, निगेटिव या कानूनबाज करार दिलवाकर हाशिये पर फिकवा देते हैं। राजनीति में व्यस्त व्यक्ति को अपने कम दूसरों के काम ज्यादा कराने पड़ते हैं। काम कानूनन होना संभव नहीं है। कानून को वाला-ए-ताक रखना इन आपरेटरों की योग्यता है। जिसका गलत काम हो जायेगा वो जिन्दाबाद के नारे भी लगायेगा, फूलों के हार भी पहनायेगा, ढोल भी पीटेगा और आत्महत्या की धमकी देता हुआ अपनी कनपटी पर रिवाल्वर भी अड़ा देगा। जब इस तरह काम हो जाने की सफलता का सुख सत्तासीन या पदासीन व्यक्ति अनुभव करने लगेगा तब उसे क्या नियम संगत है और क्या नियम विरूद्ध है का भेद भूलने लगेगा। जल्दी ही उसकी बुद्धि दुर्बुद्धि में परिवर्तित हो जायेगी। उसे असंवैधानिक काम संवैधानिक और गैर-कानूनी काम कानूनी लगने लगेंगे। सत्ता के विरूद्ध बोलने की हिम्मत किसी में नहीं होगी। ऐसे में कानून का शासन एक कोई गाथा-मिथक फिक्शन बन कर रह जायेगा। यथार्थ का अनुसरण लोग करने लगेंगे। तब आ पहुंचेगी वह स्थिति जहाँ ये आपरेटर सत्तासीन या पदासीन व्यक्ति को ब्लैकमेल करने की स्थिति में पहुंच चुके होंगे। तब सत्ता और पद या तो इनके इशारों पर नाचने लगेगा वरना ये उसे किसी भी जाल में लपेट कर सत्ताच्युत/पदच्युत कर देंगे।

समझदार लोग इनके कारनामों से वाकिक होते हैं। सतर्क रहकर इनकी सेवाओं का लाभ तो उठाते हैं, किन्तु इनके बिछाये जाल में नहीं फंसते हैं। इसके लिए उन्हें संयम, नियम, राजधर्म का पालन करना पड़ता है, जो बहुत आसान काम नहीं होता है। यह एक तरह की साधना होती है। यहाँ त्याग ही त्याग करना पड़ता है, भोग नहीं। भोग की ओर तो चाटुकार और शठ धकेलने का प्रयास करते ही हैं!

भारत में केवल वही व्यक्ति शासन की बागडोर सम्हाल सकता है जो न्यायप्रिय हो। जिसका शासन दण्ड नहीं नैतिक नेतृत्व के प्रभाव में चलता हो। जो संग्रह नहीं निग्रह करता हो। यहाँ शासन करने की चाह पालना व्यक्ति के लिए एक निजी ट्रेजेडी साबित होगी। यहाँ कोई सर्वशक्तिमान नहीं हो सकता। शासक केवल न्याय के अनुरूप शासन का नियामन कर सकता है। इसलिए कोई व्यक्ति भूल न करे कि वह किसी असंवैधानिक तरीके से इस देश पर शासन कर सकता है। बाबजूद इसके जब कोई ऐसा आचरण करता है तो यही कहा जा सकता है कि अगर कोई मरने पर तुला हो तो उसे रोकना संभव नहीं है।

भारतीय संविधान ने किसी को भी सारी सत्ता नहीं सौंपी है। भूलवश कभी-कभी यह कह दिया जाता है कि संसद सर्वोपरि है। ऐसे विचार रखने वाले लोग संविधान में निहित शक्ति संतुलन के सिद्धांत की अनदेखी कर देते हैं। पर ऐसी भूल करना किसी भी राष्ट्रीय स्तर के नेता के लिए महंगा पड़ सकता है। अतः सत्ता के इस तरह के मद से बचना ही इसका एकमात्र उपाय है। जिसको इस बात का अहसास होगा वह राष्ट्रीय सलाहकार परिषद जैसे किसी कार्यालय के गठन की इजाजत नहीं देगा और न ही उसके संचालन की जिम्मेदारी लेगा। जनता की नजरों में ऐसा संगठन भारतीय संविधान को ठेंगा दिखाकर उसे चिढ़ाना है, उसका मजाक उड़ाना है, भारत को एक बहुत ही कमजोर देश साबित करना है।

भुलाया नहीं जा सकता कि पूर्व में चाटुकारों के नारे – ‘‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया’’ ने इंदिरा जी का बड़ा नुकसान किया था। हालांकि चाटुकारों ने मलाई जरूर उड़ाई। इस तरह के नारे कान में पड़ते ही आम नागरिक के मन में घृणा और विद्वेष का भाव पैदा कर देते हैं। इसे अंग्रेजी में फ्रेटरनल एम्ब्रेस कह दिया गया है, महाभारत युग में भीम आलिंगन कहा गया था। फिर से इसी अस्त्र का प्रयोग सोनिया को लक्ष्य कर किया जा रहा है जब उन्हें मदर टेरेसा, दुर्गा, झांसी की रानी बतलाया जा रहा हो या उन्हें इंदिरा और राजीव के बराबर खड़ा कर दिया जाता हो। देश के प्रधान मंत्री की तस्वीर अखबारों में सोनिया की तस्वीर से छोटी कैसे हो सकती है? किसी मुख्य मंत्री की तस्वीर सोनिया की तस्वीर की साईज से कम किन्तु प्रधान मंत्री की तस्वीर की साईज से बड़ी कैसे हो सकती है? जब तक कि संवैधानिक व्यवस्था को ग्रहण न लग जायेगा ऐसा करना संभव नहीं है। भविष्य में यही छोटी-छोटी चीजें इक्कठी करके सोनिया के विरूद्ध काम में लाई जायेंगी।

सोनिया और कांग्रेस दो अलग-अलग चीजें हैं। कांग्रेस सोनिया के कद से बहुत ऊँचा स्थान रखती है। कोई भी प्रयास सोनिया को कांग्रेस से बड़ा कर दिखाने का, दरअसल उनका हित साधन नहीं करेगा बल्कि अहित ही करेगा। घोर अहित, अगर कहा जायेगा तो। सोनिया के हित में होगा कि वो इस दूरी को कम करने का भरसक प्रयास करे, मगर कांग्रेस के पक्ष में न कि उसका उलट। सोनिया ज्यादा से ज्यादा कांग्रेस की सेवा कर सकती है। वह सेवा उन्हें अमर कर देगी। वह सेवा जनता के मन में उनके लिए अपार प्रेम भर देगी। भारत एक गौरवशाली देश है। इसकी सेवा में निकला व्यक्ति कोई दूसरा विकल्प अपना ही नहीं सकता। यहाँ तो गार्हस्थ्य के बाद बानप्रस्थ सन्यास ही सदगति का भागी है। आश्रितजन भले ही कोई दूसरा पाठ पढ़ाये या पढ़ाने की कोशिश करे। नेतृत्व का यही लक्षण है कि वह सभी पहलुओं पर सोच-विचारकर निर्णय स्वयं करे। निर्णय जब दूसरे करते हैं और क्रियान्वयन नेता करने लगता है तो विनाशकाल आया ही समझना चाहिए।

दिल्ली में चाटुकारों के (जिन्हें डयोढ़ीवान कहना अधिक सामयिक होगा) इतने अलग-अलग आपरेटिंग सिस्टम है कि उनका वर्णन किसी अलग पुस्तक के रूप में ही किया जा सकेगा। यहाँ इतना ही काफी है कि जन्मपत्री, शुभ मुहुर्त, सर्वधर्म आयोजन, साम्प्रदायिकता से लेकर हर प्रदेश के अपने-अपने विशिष्ट आपरेटिंग सिस्टम कार्यरत हैं। भारत की विविधता को समझना आसान नहीं है। बिना उसे समझे दिल्ली में इन्हें समझना अनुभव किए बगैर संभव नहीं है।


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सोनिया की प्रासंगिकता


सोनिया को सत्ता चाहिए या सत्ता लोलुपों को सोनिया चाहिए? यह प्रश्न महत्वपूर्ण है।

सोनिया गांधी की राजनैतिक महत्वाकांक्षा राजीव की हत्या के पहले कभी प्रकट नहीं हुई थी। संजय गांधी के पूरी तरह राजनैतिक अखाड़े में कूद जाने तक या उसके बाद भी। जानकार लोगों ने तो यहाँ तक बताया था कि उन्हें राजनीति पसंद ही नहीं है। बल्कि वो राजीव को भी राजनीति से दूर रखना चाहती हैं और उन्होंने यहांँ तक कह दिया था कि अगर राजीव राजनीति में कूदे तो वो इटली आपने मायके वापस लौट जायेंगी। इस कथन की तस्दीक इस बात से होती है कि सोनिया गांधी ने कभी कोई राजनीतिक बयान नहीं दिया था, न ही राजनीति से जुड़ा कोई कार्यक्रम चलाया। अगर राजनीति का चस्का होता तो यह इच्छा राजीव के प्रधान मंत्री बनने के बाद उत्कट और अधिक प्रबल होकर अवश्य प्रकट होती। यहांँ तो लोग मौका ही नहीं चूकते हैं फिर सोनिया को ऐसे अनोखे संयम की नेकनामी से नवाजना कुछ ज्यादा ही है। होना तो यह चाहिए था कि राजीव की जिंदगी में ही उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष पद हथिया लेना चाहिए था। अगर राजीव उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाते तो कोई रोकता? बल्कि कांग्रेस के सारे देव, गन्धर्व इसका अभिनन्दन भी करते और राजीव का धन्यवाद करते कि उन्होंने सोनिया को लाकर देश बचा लिया है।

जिस तरह की दुखद घटनायें इंदिरा परिवार में एक के बाद एक घटी हैं उनसे क्या कोई परिवार का सदस्य असंपृक्त रह सकता था? खासकर जब हत्यारों ने एक सुखी गृहस्थी का सुहाग उजाड़ दिया? क्या यह अति नहीं थी? क्या समय नहीं आ पहुंचा था जब कुछ करना जरुरी हो गया था? विशेषकर जब बच्चे बहुत छोटे थे। राजीव की अन्त्येष्टी पर जो दुःख बालक राहुल और इंदिरा तुल्य, सप्रयास साधा हुआ आक्रोश, बिटिया प्रियंका के चेहरे पर झलक रहा था, उसे देखकर कोई भी व्यक्ति, कितना ही राजनीति के प्रति उदासीन रहा हो, विचिलत हो जायेगा। घटना चक्र ही ऐसा था कि सोनिया को राजनीति में कूदना ही पडा। अपना व्यक्तिगत दुःख और क्षति तो उन्होंने कभी व्यक्त तक नहीं की। पी गई अपनी पीड़ा, अपना दुःख यह वीरांगना!

सोनिया को कांग्रेस की जरूरत कम थी, मगर थी। कांग्रेस को उनकी ज्यादा जरुरत थी। वरना इंदिरा के खिलाफ आत्मा की आवाज प्रकट करने वाले कांग्रेसजन सोनिया जैसी कच्ची खिलाड़ी को कभी भी कांग्रेस पर आरूढ़ न होने देते। उनका संकट यही है कि वो, न पहले और न आज, बिना नेहरू परिवार के सदस्य के आपस में एकजुट होकर एक मंच पर आ ही नहीं सकते। सर्वसम्मति तो छोडिये, बहुमत से भी वो अपना नेता नहीं चुन सकते। इसीलिए बारम्बार सर्वसम्मति से (क्योंकि हर व्यक्ति की यह एक राय होती है) नेता चुनने का अधिकार नेहरू परिवार के इस सदस्य को दे देते हैं। फिर शुरू करते हैं परदे के पीछे का अपना खेल। डोर खीचने का काम। कठपुतली नचाने का प्रयास। रंगमंची अभिनय। टेबुल के नीचे का हाथों का कमाल।

अब शिकार करवाया जाता है नेहरू परिवार के सदस्य के माध्यम से और दावत उड़ाते हैं वो सारे चतुर सुजान जो शिकार के इर्द-गिर्द पहुंचने में सफल हो जाते हैं। इसके लिए चुनाव भी रास्ता होते हैं और बहुत से दूसरे रास्ते भी हैं।

पाँच साल तक सत्ता कांग्रेस के पास रही। उनमें कोई सोनिया के प्रति सहानुभूति रखने वाला नहीं था। सोनिया का पत्ता साफ करना उनके लिए आसान था। ये बेचारी एक महिला थी। परिवार में कोई बड़ा पुरुष सदस्य भी नहीं था। ऊपर से किशोर बच्चों की भी देखभाल करनी थी। फिर क्या हुआ कि न तो सत्ताधारी कांग्रेसी खेमा और न ही विपक्ष सोनिया का वजूद खत्म कर सका? सोनिया ने किसी से दया की भीख तो नहीं मांगी थी। किसी से अभयदान भी नहीं मांगा था। वह घबराकर भाग कर देश छोड़कर कहीं और तो नहीं चली गई।

इसी में झलकता है इस महिला का व्यक्तित्व। यह व्यक्तित्व खून से भले ही योरोप का हो, आचरण और संस्कार से नितान्त भारतीय हो गया है। इसमें समस्याओं और संकटों से जूझने की क्षमता है। यह व्यक्तित्व हर विपक्षीय परिस्थितियों में संघर्ष कर सकने वाला है। राजीव की मौत के बाद निराश होकर इस स्त्री ने जीवन का न तो मोह खोया, न ही आत्महत्या जैसा कुछ सोचा – किया और न ही भारतीय संस्कारों के विरुद्ध पुनर्विवाह (जो योरोप में नितान्त स्वाभाविक है) जैसा कुछ सोचा। बल्कि अपने बच्चोंं की रक्षा उसी तरह की जिस तरह एक शेरनी अपने बच्चों की रक्षा करती है। संघर्षरत यह महिला आज अपने लिए एक ऐसा स्थान बना चुकी है जहाँ राजनीति के दिग्गज खिलाड़ियों को भी उसके अस्तित्व में चुनौती दिखाई पड़ती है।

सोनिया ने जिस तरह भारतीय रहन सहन, वेशभूषा, भाषा को अपनाया है वह अचम्भित करने वाला है। चाहे उनके माथे की बिंदी हो या तिलक, साड़ी हो या हिंदी सब कुछ ऐसा लगता है जैसे कि जीवन के शुरू से करती आ रही है। सोनिया साड़ी जिस सलीके से पहनती है उसे देखकर हमारी नितान्त भारतीय नारियाँ कुछ सीख सकती हैं जो नाभी-दर्शिनी साड़ी पहनकर उस वेशभूषा का पाश्चात्यीकरण धड़ल्ले से कर रही हैं। सोनिया की कलाई में कलावा का धागा भी देखने को मिलता है। आलोचना करनी ही हो तो उसमें भी लोग खामियां ढूंढ ही लेंगे। परन्तु उनसे पूछा जायेगा कि वो स्वयं कितने भारतीय रह गये हैं तो बगलें झाकेंगे।

यह समझना जरूरी है कि भारत में लाख कमियां, कुरीतियां दिखाई पड़ती हों तब भी इसकी अच्छाईयां अधिक तथा ज्यादा असरदार हैं। एक तरह से संक्रामक है। एक बार कोई इसे समझने की चेष्टा करे तो इससे प्रभावित हुए बगैरे रह ही नहीं सकता। नीरद चौधरी जैसे लोग भी जब इसका रहस्य नहीं समझ पाये तो इस देश को कांटीनेन्ट आफ सर्सी कहकर अपनी बात कहते हुए चलते बने। सर विद्यासागर नॉयपल को यह एन एरिया ऑफ डार्कनेस लगा, तो प्रवर आर. झाववाला को हीट एण्ड डस्ट ही लगा और शशि थरूर दी ग्रेट इंडियन नािवल कह कर संतुष्ट हो गये। पर बिना महात्मा गांधी की तरह गाँव-गाँव घूमे और वेद, उपनिषद, पुराण, मीमांसा, रामायण, महाभारत, रामचरित मानस, सूर, कबीर, रहीम, रसखान पढे़ कोई इस देश को नहीं समझ सकता है! प्रकृति की अनुपम कृपा से यहां छः ऋतुओं और बारहमासे का अपना ही आनन्द है। तब कोई भी अगर इस देश को जानने की कोशिश करेगा तो यहाँ का होकर ही रह जायेगा। उस समृद्ध परम्परा की आधुनिक कड़ी है गांधीवाद। जिसका मूर्त रूप रहा है कांग्रेस पार्टी। अगर कोई आज की कांग्रेस पार्टी की दशा और दिशा पर सवाल पूछता है तो उसी तरह जैसे भारतीय बौद्धिक चिन्तन पर पूछता है। किन्तु बात यह है कि जो कांग्रेस को, उसकी विचारधारा को जानने निकल पड़ेगा उसका सोनिया की तरह परिवर्तित होना स्वाभाविक ही है। उस पर उसे इंदिरा गांधी की देखरेख में विकसित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। साथ ही कांग्रेस मंत्री, कार्यकर्ता, नेता, प्रदेशों के मुख्य मंत्री, नौकरशाह, सरकारी कर्मचारी और आम जनता के व्यवहार को करीब से देखने का अवसर मिला। अपने परायों सभी को देखा-परखा-झेला। साथ ही कांग्रेस की वैचारिकता का गहराई से अध्ययन भी किया। इन सब तैयारियों ने सोनिया को सार्वजनिक जीवन में उतरने का आत्मविश्वास और हिम्मत दी।

राजीव की मृत्यु के बाद सोनिया शायद पहली बार इतने नाजुक दौर से गुजरी थी। कुछ भी हो सकता था। जब राजीव का सफाया किया जा सकता था, इंदिरा गांधी को गोलियों से भूना जा सकता था, तो सोनिया को ठिकाने लगाना कौन बड़ी बात थी? यह तो उसके वच्चों का भाग्य था कि उनके सिर पर उनकी माँ का साया बना रहा। लेकिन अपनी माँ की सुरक्षा को लेकर बच्चे कितने भयभीत थे इसका अंदाजा 2004 में राजीव पुत्र राहुल की वेदना भरी वह बात थी जब उसने कहा कि हम अपनी माँँ को नहीं खोना चाहते हैं।

सोनिया की असुरक्षा का अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि राजीव गांधी फाऊंडेशन के लिए 200 करोड़ रूपये की राशि बजट पेश करते समय तत्कालीन सरकार ने देनी चाही थी। यह रकम बोफोर्स के साठ करोड़ रूपये से कहीं अधिक थी। अगर सोनिया पैसे ही के लिए जीने वाली व्यक्ति होती तो तुरंत इस राशि को स्वीकार कर लेती। यह उनको फंसाने का बड़ा ही कारगर तरीका होता। लेकिन सोनिया गांधी ने यह रकम ठुकरा कर सिद्ध कर दिया कि रूपया उनकी चाहत नहीं है, न ही लक्ष्य है। उस समय यह इतना पैसा था कि इतने धन से हैदराबाद के पूर्व निज़ाम के आभूषण खरीदने की भी पेशकश उसी दौरान की गई थी।

सोनिया भारतीय संदर्भ में रूपये के महत्व और उसको सफलता से राजनैतिक अस्त्र के रूप में प्रयोग करने के बारे में जानती थी। 1947 के बाद भ्रष्टाचार के आरोप रूपये को लेकर ही लगाये जाते रहे हैं – राजनैतिक विचारधाराओं के टकराव के आधार पर नहीं। बोफोर्स की कीचड़ उछाल कर चन्द सफेदपोशों ने राजीव को जनता की निगाहों में दागी साबित करने की भरसक कोशिश की। अगर कुछ होता तो सत्ता पर काबिज होने पर ये लोग राजीव को दोषी जरूर साबित कर सकते थे। परन्तु कर नहीं सके। उनका अभीष्ट तो इल्जाम लगाने भर से पूर्ण हो गया। आज भी हिन्दुस्तान में झूटे आरोप लगाने वालों पर कोई लगाम नहीं कसी गई हैं। टौर्टस में अगर झूठा इल्जाम लगाने वालों के खिलाफ मानहानि के हर्जाने के बतौर (हर्जाने के रूप में) करोड़ों रूपये दिलवाना शुरू कर दिया जायेगा तो इन अपराधियों को सबक सिखाया जा सकता है। वरना ये इसी तरह सरकारों को अस्थिर करते रहेंगे। ईमानदार अधिकारियों को कर्तव्य निर्वहन नहीं करने देंगे, दलालों के साथ सांठ-गांठ करके अपनी गैर कानूनी कारस्तानियों से बाज नहीं आयेंगे।

यह एक दिलचस्प बात है कि छोटे स्तर पर इस काम को अंजाम देने वाला चोर कहलाता है, थोड़ा बड़े स्केल पर करने वाले को डाकू कहते हैं, ज्यादा शहरीकृत अंदाज में किये गये काम को अंडरवर्ल्ड डॅान का काम कहते हैं, उससे बड़े स्तर पर वही काम माफिया या माफियोसी की कारस्तानी कहलाता है, गैर सरकारी तौर पर करने पर वही आतंकवाद कहलाता है, पर प्रजातंत्र में उसे जन प्रतिनिधियों द्वारा जनहित में किया गया काम कहते हैं। इसे वो बेफिक्र होकर अंजाम देते रहते हैं। बल्कि टी.वी. के कई स्टिंग आपरेशनों ने तो पोल ही खोल कर रख दी कि इनके लिए यह काम इनके दलाल एजेन्ट या मसलमैन भी करते हैं। जब तक मुआवजा इनकी नाजायज कमाई से 10-20 गुना नहीं होगा इनकी हरकतें भी नहीं रुकेंगी।

सोनिया को महत्वहीन आंकने की यह भूल थी कि उसके उभरते हुए राजनीतिक कद को छोटा कर मापा गया। यह वैसा ही था जैसा इंदिरा गांधी के बारे में सोचा गया था और बाद में राजीव के बारे में। दरअसल गांधीवादी विचारधारा से विलग ऐसे कांग्रेसजन जो सत्ता की राजनीति का खेल खेलने में महारत हासिल कर चुके थे उनकी नजरों में न तो कांग्रेस की विचारधारा कोई मायने रखती थी न ही गांधी का आदर्शवाद, न व्यक्ति का चरित्र और न ही भारत की गरीब, अनपढ़, भावुक जनता जिनका वोट चुनावी राजनीति में अपनी झोली में समेट लेने की खासियत इन लोगों ने पैदा कर ली थी। ऐसे लोग न केवल तब बल्कि आज तक इस बात में विश्वास करते हैं कि राजनीति का कुल मतलब जनता का वोट बटोरना भर है चाहे साम, दाम, दंड, भेद का प्रयोग क्यों न करना पड़े और उसके मुकाबले ईमानदार और सच्चरित्र नेतृत्व का कोई महत्व नहीं है। तभी तो इनकी लाल बहादुर शास्त्री  के प्रति उदासीनता और मोरारजी देसाई के प्रति द्वेष तो सर्वविदित है। ऐसे लोगों ने भारतीय जनतंत्र को दूषित करके कलंकित और बदनाम किया है। हर उस कार्यकर्ता और नेता को, जो कभी भी और किसी समय भी स्वस्थ और गांधीवादी राजनीति करना चाहेगा, ये ताकतें उसी तरह घेरेंगी जैसे राजीव को घेरा था या सोनिया की घेराबंदी कर रही है।

अब सोनिया मैदान छोड़कर भाग नहीं सकती है। राजनीति के महाभारत में कोई धृतराष्ट्र तो कोई भीष्म, कोई कर्ण तो कोई कोई दुःशासन तो कोई भीम, कोई दुर्योधन तो कोई युधिष्ठिर, कोई द्रौपदी, कोई कृष्ण, कोई गांधारी, कोई कुन्ती, कोई अभिमन्यु, कोई द्रोणाचार्य तो कोई अश्वथामा का किरदार अनवरत निभाता रहता है। यह चक्रव्यूह तो बनता ही रहेगा। आदर्शवाद का नारा लगाने वाले की गति अभिमन्यु की जैसी होगी। अपने-अपने विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए सारे रथी, महारथी और अतिरथी उसे घेर कर मार डालेंगे। इनकी व्याख्या, समालोचना, विवेचना, मीमांसा, समीक्षा युद्ध के परिणाम के अनुसार बाद में कर ली जायेगी। सच यह है कि इस महाभारत में कोई तटस्थ नहीं रह पायेगा। भाग प्रत्येक को लेना होगा। इसका स्वरूप, गति, स्थिति यही है। आदर्श सदा यथार्थ से टकराता है। एक बार जीतता है, फिर आहत होता है, फिर पुनः स्थापित हो जाता है। सोनिया भी अगर दूसरे कांग्रेसजनों की तरह यथार्थ की तरफ आकृष्ट हुई तो ज्यादा दिन टिक नहीं पायेगी। लेकिन अगर मर्म समझ गई हो तो केवल त्याग करते रहने पर उच्च स्थान अवश्य पा जायेगी। भारत में कोई सन्यासी भी हो जाये तब भी उसके त्याग की परीक्षा लेने के लिए उसके बाल या मांस या हड्डियां तक दान में मांग ली जाती हैं – यह जांचने के लिए कि व्यक्ति किस सीमा तक त्याग कर सकता है। सारा राज्य, धन, सम्पत्ति, परिवार, यहाँ तक कि शरीर के वस्त्र तक दान कर चुके व्यक्ति तक से ऐसा त्याग करवाया गया है। पर गांधी का सिद्धांत कि लक्ष्य ही उच्च न हों, किन्तु साधन भी उच्च हों, अपनाने योग्य है। जिन लोगों ने इसके विपरीत आचरण में आम आदमी की आस्था जगाई है वो अल्पकाल के लिए अवश्य सफल हुए, पर उनकी ख्याति व्यवहार कुशल लोगों की सी ही हुई। वो कोई आदर्श स्थापित नहीं कर सके और न ही आदर्श पुरुष बन पाये। उनके कारनामे और उपलब्धियां उन्हीं के साथ चली गईं। महात्मा गांधी की तरह वो लोग जन मानस पर अंकित नहीं हो पाये। आदरणीय नहीं बन पाये। चाहे वो सरकार के सर्वोच्च पद पर ही आसीन क्यों न हो गये हों। सोनिया ने दो सौ करोड़ रूपये की पेशकश को ठुकराकर पुत्र या पुत्री के पालने में पाँव देखे जाने या कहें कि होनहार बिरवान के होत चीकने पात का संकेत तो दिया है। देखना है कि उनके चरित्र में कितनी मजबूती है। यह सिद्ध होगा उन ताकतों की असफलताओं से जो उन्हें समय-समय पर पथभ्रष्ट करना चाहेंगी।

‘‘आफिस ऑफ प्रोफिट’’  मामले में सभी राजनीतिक दलों ने जो नीति अपनाई है वह इस बात को प्रमाणित करती है कि कर सब वही रहे हैं जिसकी आलोचना करते हैं किन्तु ठीकरा कांग्रेस के मत्थे मढ़ना चाहते हैं। कांग्रेस के इसलिए कि केन्द्र में उसकी सरकार ज्यादा लम्बे समय तक चली है। सभी उतावले हैं कि जल्दी से जल्दी ऐसा कानून लाया जाये जिससे उनके हित सुरक्षित हो सकें और उनकी संसद की सदस्यता बरकरार रह सके। ऐसा करने में वे सफल भी हुए है। पर भविष्य में ऊँट किस करवट वैठेगा यह कोई नहीं जानता है। यानी अपने सभी सही गलत काम के लिए जन प्रतिनिधि को चाहिए विशेषाधिकार। इस बात को नकारा नहीं जाना चाहिए कि चुने हुए नुमाइंदों का आफिस आफ प्रोफिट पर काम करना गैर कानूनी है, असैंवाधानिक है और संविधान के प्रति उनकी उठाई हुई सौगन्ध की खुली अवहेलना है। बजाये इसके कि गलत कानून बनाकर गलत कामों को प्रश्रय दिया जाये, जन प्रतिनिधियों को वो सारे लाभ बतौर चुने हुए नुमाईंदे होने पर उपलब्ध करा दिये जाये जिससे की घुमा – फिराकर लाभ उठाने की अवांछनीय हरकतों से बचा जा सके। जन प्रतिनिधि आदर और सम्मान पा सकेंगे तो ही भारतीय प्रजातंत्र मजबूत होगा। तभी भारत आर्थिक और सामरिक महाशक्तियो की गणना में आ सकेगा। ये रोज के स्केंडल, आरोप, जांच कमीशन, भारतीय प्रजातंत्र को खोखला कर चुके हैं। इसकी जड़े कमजोर पड़ चुकी हैं। अगर स्थिति को सुधारा नहीं गया और उल्टे-सीधे कानून पारित कर या उनकी गलत-सलत कानूनी व्याख्या कर अवैध कामों को वैध ठहराने का कुप्रयास किया गया तो यह देश फिर से पराधीन हो सकता है। आज स्थिति यह है िक ईमानदारी से निर्भीक होकर सरकार को कोई भी सेवक सही सलाह देने से बचता है, जो कि उसका सेवक कर्तव्य होता है। नियमानुसार सचिव पद में वे सभी पद शामिल हैं जो किसी मामले की जांच के आदेश और संसद/विधायिका के निदेश प्राप्त करने के लिए अपनी सलाह देते हैं।

इससे यह स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार और सदाचार को लेकर स्थिति कैसी है। ऐसे में जो पूरी नैतिकता और ईमानदारी से सच्ची लगन और त्याग भावना से देश की सेवा करेगा, वही शीर्ष पर पहुंचेगा और बना रहेगा। धोखा, छल, प्रपंच करके जो पहुंच भी गया तो ज्यादा दिन टिका नहीं रह सकेगा। इसलिए त्याग को दिखावा या महज राजनीतिक चाल के बतौर इस्तेमाल करना दुःख देने वाली भूल होगी।

सोनिया के इस्तीफे के बाद बिना एक पल की देर किए इन सभी लोगों को इस्तीफा दे देना चाहिए था जो आफिस आफ प्रोफिट पर आसीन थे। डा. कर्णसिंह ने उदाहरण भी पेश किया। बाकी सब ऐसे इधर उधर देखने लगे जैसे कौरवों की सभा मैं बैठे सभासदगण द्रौपदी के चीरहरण किए जाने पर अगलें-बगलें झांकने लग गये थे। कानों में रूई डाल बैठे। जुबान को तो जैसे लकवा ही मार गया हो। नैतिकता की बात करने वाले, राजनीतिक विचारधारा का निनाद करने वाले, भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान चलाने वाले इस सारे घटनाक्रम के बाद भी अपना आफिस आफ प्रोफिट छोड़ने को तैयार नहीं हैं। वो कानून दूसरों के लिए बनाते हैं, अपने लिए नहीं। वो अपने लिए सार्वभौमिकता का उद्घोष करते हैं। वैसे सब कुछ केवल जनता की सार्वभौमिकता के अधीन है। इसलिए हम चाहते हैं लोग कम से कम आफिस आफ प्रोफिट तो छोड़ दें। भले ही संसद या विधान परिषदों की सदस्यता नहीं। और अगर उन्हें आफिस आफ प्रोफिट ज्यादा लाभकर लगे तो डा. कर्ण सिंह का अनुसरण कर लें।

परंतु सोनिया जिस रास्ते पर निकल पड़ी है उन्हें उसी पर चलना होगा। उन्हें अपनी सीमाओं का सतत आभास रहना चाहिए। भारतीय संदर्भ में उनका प्रधान मंत्री बनना संभव नहीं है। ऐसे में उन्हें कांग्रेस को वहाँ लाकर खड़ा कर देना चाहिए जहाँ वह 1969 के विघटन के पहले थी। कांग्रेस नेतृत्व का जनता से सीधा वास्ता रहे, न कि क्षेत्र विशेष के सामन्तों के माध्यम से। 1964 का कामराज प्लान जैसी कोई योजना फिर से लानी पड़ेगी। आफिस आफ प्रोफिट इसके लिए अच्छा अवसर हो सकता था पर समयानुकूल नहीं। पार्टी इस समय बहुत कमजोर स्थिति में है। यह परिणाम है सिद्धान्तों से समय समय पर किए गए समझौतोंं का, जिसने तिकड़म, हेरा फेरी, बेईमानी, भ्रष्टाचार को ही सर्वोत्तम नीति के रूप में स्थापित कर दिया। इसलिए नैतिक मूल्यों की स्थापना करनी पड़ेगी। उतना ही कहा जायेगा जितना किया जा सके। जनता देख रही हैं देश में नैतिक नेतृत्व की राह। उसने अपने प्रयोग 1967, 1977, 1980, 1984, 1989, 1998, 2004 और 2009 में कर लिए हैं। जनता का विश्वास किसी में नहीं रहा। उसे नेतृत्व ने निराश किया हैं। कांग्रेस जैसे संगठन को लेकर आगे बढ़ने वाले व्यक्ति को अपार संभावनायें न्यौता दे रही है। इस देश में सभी लोग चाहते तो हैं कि कोई उनके लिए त्याग करें पर स्वयं त्याग करने को तैयार नहीं हैं। हाँ, दूसरे की आरती उतारने, उसे महात्मा या देवता कहकर संबोधित करने या उसकी मूर्ति पूजा करने में सबसे आगे आ जाते हैं। चढ़ावा जो चढ़ने लगता है!

नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए रचनात्मक कार्यक्रम शुरू करने पड़ेंगे। इनका जादुई प्रभाव होता है। इनकी विराट आर्थिक, सामाजिक और नैतिक उपयोगिता तो है ही, सिम्बोलिक महत्व भी कम नहीं है। खादी का सूत कातना एक ऐसा ही सशक्त, प्रभावोत्पादक और उपयोगी कार्यक्रम है। नित्य चरखा चलाकर सूत कात कर उसका कपड़ा तैयार कर वस्त्र धारण करने से जो चेतना जगाई जा सकती है उसका बयान करना मुश्किल है। एक तो उससे जुड़ने वाले लोग निष्ठावान होंगे जैसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान थे। दूसरा ये ढोल, ताशे, तमंचा, कटुवचन वक्ता समूह सही रास्ते पर आ जायेंगे और राष्ट्रीय नेतृत्व को हल्का और सस्ता बनाकर प्रस्तुत नहीं कर सकेंगे। ऐसे रचनात्मक काम में जुटे पार्टी कार्यकर्ता पैदा हो गये तो समाज में आतंक के सारे गठजोड़ स्वतः ही नष्ट हो जायेंगे। भारत को न तो पुलिस राज माफिक आता है न ही ये खर्चीला न्याय तंत्र जिसमें गरीब आदमी को निराशा ही हाथ लगती है। नैतिक मूल्यों की स्थापना बढ़ते हुए अपराधीकरण पर अंकुश लगा सकेगी। आज तो हमारा इतना पतन हो चुका है कि वृद्ध माँ-ूबाप की देखभाल की जिम्मेदारी बच्चों को सम्हालने के लिए सरकार कानून बना चुकी है। हिमाचल सरकार ने इस बारे में सबसे पहले पहल करी थी।

अनेक रचनात्मक कार्यक्रम गांधी दर्शन में है जिनसे रोजगार मिलता है, उत्पादन बढ़ता है, बेरोजगारी की समस्या पर काबू पाया जा सकता है, भाईचारा और सद्भाव बढ़ता है, समाज में शांति और एकता बढ़ती है। वैचारिक पुष्टता अपने आप में एक उपलब्धि है। बजाय झुग्गी-झोंपड़ी या घेटो बनाकर अपराध को पनपाने के कम आमदनी वाला खादी और ग्रामोद्योग बेहतर है। इससे न केवल गांव से शहरों को पलायन ही रुकता है बल्कि शिक्षा से वंचित व्यक्ति भी रोजगार की आशा कर सकता है। सबसे बड़ी बात यह स्त्रियों के लिए उनके घर या झोंपड़ी पर रोजगार मुहैया कराने की क्षमता रखता है जिसे वे अपनी सुविधानुसार कर सकती है। आधुनिक मैनेजमेंट की शब्दावली में इसे ‘‘फ्लेक्सी टाईम’’ या ‘‘लचीले काम के समय’’ की संज्ञा दी जाती है। फिर इस कार्यक्रम में उच्च तकनीकी कार्य शामिल किया जाना वर्जित नहीं है। खादी और ग्रामोद्योग तो महज शुरूआत है, संभावनायें असीमित हैं। नेतृत्व उसे और अधिक पुष्ट कर सकता है।

इससे कामगारों का विस्थापन उसी प्रकार रुकता है जैसे पेड़ों से कृषि भूमि का कटाव या वन संरक्षण से पर्यावरण की सुरक्षा। शहर या औद्योगीकरण ऐसे वर्ग को खपाने में असमर्थ होता है। उसके लिए मानव हाथ और मस्तिष्क दोनों ही एक प्रकार का कच्चा माल होता है। औद्योगीकरण कुशल कामगारों के लिए अवसर उपलब्ध कराता है, जो कि बहुत सीमित संख्या में होते हैं। फिर उभरते हुए ज्ञान संचालित समाज में तो केवल अति-कुशल या हाईटेक कामगार ही रोजगार पा सकेंगे। वैसे भी मशीनें दसीयों कामगारों का काम अकेले ही करने की क्षमता रखती है। जबकि काम हर हाथ को और रोटी हर पेट को चाहिए। भारत की जनसंख्या 104 करोड़ के करीब है। हरेक भारतीय को काम तो चाहिए ही। उधर स्वास्थ्य सेवाओं ने औसत आयु भी बढ़ा दी है जिसका सीधा मतलब है आदमी को लम्बे अरसे तक रोजगार के अवसर की अपेक्षा रहती है। इतना काम लगातार (न कि वर्ष में केवल 100 दिन या कुछ दिन या सीज़नल) चाहिए होता है। तभी तो गांधी ने खादी और ग्रामोद्योगों पर इतना जोर दिया था। गांधी इस देश की आवश्यकतायें समझते थे। इस देश को समझते थे, दुनिया की स्थिति से वाकिफ थे और भविष्य द्रष्टा थे। उनकी बताई राह आज भी तर्कसंगत है। जिन लोगों ने गांधी-नेहरू को अलग करके देखने की कुचाल चली है वो कांग्रेस विचारधारा को नहीं समझते और न ही गांधी का महत्व ही समझते हैं। गांधी और नेहरू एक ही विचारधारा का वृहद स्वरूप है। राजीव तक आते-आते यह और भी मजबूत हुई है। इसी के माध्यम से योजनाओं का धन लक्षित समूहों तक पहुंचेगा – पूरे सौ के सौ पैसे, न कि सौ पैसों में से केवल पन्द्रह पैसे।

गांधी को केवल एक रक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल करने की परम्परा को इतना बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए जितना कि उनके बताये रास्ते पर चला जाना चाहिए। इसी तरह गांधी को राजनीतिक पैंतरेबाजी के लिए भी इस्तेमाल करना ठीक नहीं है। गांधी एक संगत विचारधारा का नाम है जो न केवल राजनीतिक दर्शन का प्रतिपादन करता है बल्कि सुगढ़ सामाजिक परिवेश तैयार करता है और मजबूत आर्थिक व्यवस्था की नींव भी रखता है। एक उदाहरण समीचीन होगा। गांधी का डांडी मार्च बहुत मशहूर है। सन 2005 में प्रसिद्ध डांडी मार्च की 75वी बरसी मनाई गई,जिसमें उसकी पुनरावृत्ति करके एक झलक दिखाई गई। सोनिया गांधी को केन्द्र में रखकर। इस पूरे कार्यक्रम में कहीं भी गांधी के मार्च की वह भावना और आत्मा नहीं झलकी। कारण यह मात्र एक राजनीतिक स्टंट था। इसका उद्देश्य गांधी के इस अचूक अस्त्र और उसके पीछे आर्थिक-सामाजिक विचारधारा तथा सिद्धांतो पर चर्चा करना नहीं था। यह गांधी को इस्तेमाल करने का एक फीका प्रयास था। वरना इस एक आंदोलन के पीछे की विचारधारा ही राष्ट्र को एकता, भाईचारे की ओर ले जाने में सक्षम है।

इसलिए इस नमक सत्याग्रह या डांडी मार्च को थोड़ी गहराई में समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए और भी क्योंकि आज नमक आसानी से पूरी मात्रा में उपलब्ध है, आयात नहीं करना पड़ता है, दूसरे लोगों के जहन में ये कोई बड़ी चीज नजर नहीं आती। पर है बहुत बड़ी चीज। पलभर को सोचा जाये कि अगर नमक आयात करना पड़ता या केवल राशन की दुकान से सीमित मात्रा में मिलता तो क्या होता। (कभी चीनी प्रत्येक व्यक्ति को 400 ग्राम महीने भर के लिए मिलती थी तो उसी हिसाब से नमक मिलता) कोई भी व्यक्ति बिना शक्कर मर नहीं जायेगा, पर बिना नमक जरूर मर जायेगा। एक व्यक्ति का जीवन बिना नमक के संकट में पड़ सकता है, उसका जीवन समाप्त हो सकता है। फिर भारत में तो गरीब आदमी का भोजन या रोजाना की डाईट ही सूखी रोटी और नमक था, और बहुतों के लिए आज भी है। जिन्हें गरीबी रेखा से नीचे के परिवार कहा जाता है, वहाँ की रोजमर्रा की डाईट यही रोटी और नमक भर ही है। यही हालात थे नमक आंदोलन के पहले भी। यही कारण था नमक आंदोलन करने का। गांधी को मजबूर कर दिया अंग्रेज सरकार की क्रूरता, वहशियानेपन ने, जो भारत की गरीब जनता से उसके भोजन से नमक छीन लेने पर आमादा थी – यानी नमक तभी खाया जा सकता था जब पहले सुपर टैक्स अदा कर दिया गया हो। उस देश में जहाँ इतनी लम्बी समुद्री सीमा थी कि अपनी जरूरत का नमक, सहज बनाया जा सकता था। उस पर सांभर झील, मंडी लवण खान जैसे अनेक अन्य स्रोत भी थे, जिन्हें इन्लैंड साल्ट सोर्सेज कहा जाता था। भारत के लोग चिर काल से अपने नमक की जरूरत खुद ही पूरी करते आ रहे थे। परन्तु अंग्रेजो को इसमें राजस्व बटोरने का एक अच्छा जरिया मिल गया, साथ ही व्यापार करने का मौका भी।

राजस्व तो इतना बटोरा कि पढ़कर कोई भी चौंक उठेगा – नमक टैक्स से अंग्रेज सरकार की कुल राजस्व आय 2,50,00,000 पाऊंड (दो करोड़ पचास लाख पाऊंड) स्टर्लिंग थी, जबकि सकल राजस्व 80,00,00,000 पाऊंड (अस्सी करोड़ पाऊंड स्टर्लिंग) था। यह आय एक ऐसे स्रोत से की जा रही जो भारतीयों का प्राचीन मौलिक अधिकार था। समुद्र के खारे पानी से यहाँ के लोग अनंतकाल से नमक बनाते आ रहे थे; सांभर झील और मंडी नमक खानों जैसे स्रोतों से नमक प्राप्त करते आ रहे थे। अंग्रेज सरकार ने भारतीयों से ये अधिकार छीन लिया। अंग्रेजी हुकुमत ने लोगों को कुदरत की इस देन का उपभोग न करने की ताकीद की और उन्हें नमक आयात करने के लिए मजबूर किया। अंग्रेजों ने देसी राजा-महाराजा और नबाबों से तरह-तरह की सन्धियां कीं, जिनमें उनके अधिकार एकदम सीमित किये गये थे। इन संधियों में एक शर्त यह भी होती थी कि रियासत के नमक बनाने के काम को बन्द कर दिया जायेगा और उसकी एवज में अंग्रेज सरकार, राजे महाराजों को निजी उपभोग के लिए एक सीमित मात्रा – कुछ मन जो कुछ क्विंटल के बराबर था – में नमक बिना कोई कीमत यानी फ्री देगी। इसका मतलब यह हुआ कि जनता को हम निचोड़ेंगे परन्तु आप कुछ नहीं बोलेंगे। बेचारे! नवाब राजे-महाराजे करते भी क्या अंग्रेज सरकार के सामने!

नमक केवल इंसानों के खाने की ही चीज नहीं है इसको जानवरों, खेती और उद्योगों के लिए भी उपयोग में लाया जाता है। बिना नमक इंसानों की तरह जानवरों का जीवन भी खतरे में पड़ जाता है। मगर अंग्रेजों ने नमक को लेकर कैसे-कैसे दुष्कर्म लिए इन्हें जान लेना जरूरी है। सन 1835 में ब्रिटिश सरकार ने एक नमक आयोग का गठन किया। इस कमीशन को नमक टैक्स का रिव्यू करना था। इस आयोग ने सिफारिश की कि भारतीय नमक पर टैक्स लगाया जाना चाहिए जिससे कि लिवरपूल में बना अंग्रेजी नमक जो भारत में आयातित किया जा रहा था, की बिक्री बढ़ाई जा सके। इससे नमक के दाम बढ़ गये। इसके बाद नमक अधिनियम (साल्ट एक्ट) ने तो नमक उत्पादन पर सरकार का एकाधिकार ही स्थापित कर दिया। इस कानून के प्रावधानों का उल्लंघन दण्डनीय अपराध घोषित कर दिया गया जिसके तहत छः महीने कारावास की सज़ा दी जा सकती थी और नमक को जब्त किया जा सकता था।

सन 1882 में भारतीय नमक अधिनियम या इंडियन साल्ट एक्ट (XIIवां 1882 का) लागू हो गया। एक दूसरा कानून बाम्बे साल्ट एक्ट के नाम से पहले से ही लागू था। 1888 में नमक टैक्स बढ़ाया गया और 1922 में इसे दुगुना कर दिया गया। इस बीच 1914 से 1925 के दरम्यान भारत में कुल नमक का तीस प्रतिशत (30%) नमक सरकार बनाती थी, तीस प्रतिशत आयात होता था और बाकी एक्साईज अदा करके लाईसेंसधारी बना सकते थे।

नमक कानून के दण्डात्मक प्रावधानों का जिक्र किए बगैर नमक सत्याग्रह की जरूरत और महत्व को नहीं आंका जा सकता है। क्योंकि इन प्रावधानों को अंग्रेज सरकार सख्ती के साथ लागू करती थी। इसके तहत नमक कानून को लागू करने वाले कर्मचारी किसी स्थान में घुस सकते थे जहाँ गैर कानूनी तरीके से नमक बनाया जा रहा हो। उनके इस काम में कोई बाधा डाले तो वे किसी भी दरवाजे को तोड़ सकते थे और दूसरी बाधा को हटा सकते थे। जिससे वे उस मकान, जमीन, स्थान, घेराबन्द स्थान में प्रवेश पा सकें और गैर कानूनी नमक को अपने कब्जे में ले सकें या उसे नष्ट कर सकें। किसी भी खुले स्थान में, पारगमन में ले जायी जा रही वस्तु या बंडल या पोटली में रखी वस्तु को अपने कब्जे में लेने का अधिकार था जिसमें अवैध रूप से नमक ले जाये जाने की शंका हो और साथ ही ऐसे किसी बक्से या वाहन या ढुलाई के काम में लाये गये जानवर को भी जब्त करने का अधिकार था। नमक अधिकारी किसी भी व्यक्ति की तलाशी ले सकते थे। और जरूरी समझने पर उसे गिरफ्तार भी कर सकते थे। इस शक की बिना पर कि उस व्यक्ति के पास गैर कानूनी नमक पाया गया था या उसने नमक राजस्व संबंधी कोई अपराध किया है।

बॅाम्बे नमक कानून में प्रावधान था कि नमक अधिकारी सारा अवैध नमक, पात्र, जहाज या नाव, जानवर, सवारी गाड़ी, जो भी इस अवैध नमक की ढुलाई के काम में लाई जा रही थी और सारी वस्तुओं, पोटली, गठरी आदि जिसमें अवैध नमक पाया गया तथा प्रत्येक उपकरण, औजार, बर्तन या कोई अन्य वस्तु जो नमक बनाने, खनन करने, एकत्र करने, या बिना लाईसेंस हटाने या प्राकृतिक नमक को या लवणीय मिट्टी का उपयोग नमक कानून के प्रावधानों के विपरीत करता पाया जायेगा उसे जब्त कर सकेगा। इन प्रावधानों ने नमक का जो काला धन्धा भारत में शुरू किया वह राजनीति के अलावा साहित्य का भी सरोकार बना | हिंदी के प्रसिद्ध कहानीकार मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘‘नमक का दरोगा’’ बेहद मशहूर हुई। पर राजनीतिक हल्कों में अंग्रेजों के नमक कानून और नमक टैक्स पर आलोचना, प्रत्यालोचना देश में ही नहीं विदेशों में भी हो रही थी। यूरोप के विचारकों ने तो इसे ‘‘अनजस्ट’’ और ‘‘वारवैरिक प्रैक्टिस’’ यानी अन्यायपूर्ण और बर्बरतापूर्ण दस्तूर तक कह दिया। प्रधान मंत्री बनने से पहले रामसे मैकडोनेल्ड भी इस कानून और टैक्स के आलोचक थे। देश में कांग्रेस के 1885, 1888, 1892 और 1902 के अधिवेशनों में इस टैक्स की जमकर आलोचना की गई। ऐसी अपेक्षा की गई कि अंग्रेज सरकार कांग्रेस अधिवेशन में व्यक्त किए गये विचारों पर ध्यान देगी और सुधारात्मक कार्यवाही करके भारत की गरीब जनता को राहत पहुंचायेगी। पर ऐसा कुछ हुआ नहीं। अंग्रेज अपनी बर्बरता पर अड़े रहे।

महात्मा गांधी ने नमक पर अपना पहला लेख 14 फरवरी 1891 को महज 22 साल की उम्र में लिखा था। यह लेख ‘‘दी वेजीटेरियन’’ में प्रकाशित हुआ था। इस समय भारत के ज्यादातर लोग रोटी और नमक पर ही गुजारा कर रहे थे। मगर उनकी इस सार्वजनिक चेतना को 39 बरस लग गये एक राष्ट्रव्यापी सशक्त, युगान्तकारी और ऐतिहासिक जन आंदोलन एवं जन चेतना बनने में। अकेले गांधी की चेतना को पूरे देश की चेतना बनने में।

नमक कानून को चुनौती देकर महात्मा गांधी ने अंग्रेज सरकार की नींव हिला दी। हालांकि यह टैक्स बड़ा लगता नहीं था परन्तु गांधी ने इसे अंग्रेजों के दमन का प्रतीक बनाकर ऐसे पेश किया कि यह सत्याग्रह भी बन गया, अवज्ञा आंदोलन भी बन गया और भारतीय स्वतंत्रता का सशक्त माध्यम भी बन गया। इस कानून को चुनौती देकर गांधी ने अपनी राजनीति, प्रतिभा और चतुराई का परिचय दिया।

डांडी यात्रा का शुभारंभ 12 मार्च, 1930 को सुबह 6.30 बजे 78 स्वयंसेवकों के साथ महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम से किया। लेकिन उसके पहले गांधी ने वायसराय को पत्र लिखकर अंग्रेज सरकार को विवेकपूर्ण आचरण करने, सहयोग करने और सदाशयता का परिचय देने के लिए 2 मार्च 1930 को पत्र लिखकर वार्ता करने का आग्रह किया। लार्ड इरविन को लिखे पत्र में गांधी ने देशवासियों की दुर्दशा का विस्तृत विवरण देते हुए लिखा कि जमीन पर जमींदारों का नहीं रैयतों का मालिकाना हक होना चाहिए। उन्होंने यह भी लिखा कि वायसराय को 21000 (इक्कीस हजार) रूपये महीने का वेतन और दूसरे परोक्ष लाभ तथा ब्रिटिश प्रधान मंत्री का 5400 (पाँच हजार चार सौ) रूपये महीने का वेतन दैनिक औसत के हिसाब से 700 रूपये और 180 रूपये बैठता है जो आम भारतीय के दो आना रोज और आम अंग्रेज के दो रूपये रोजाना के औसत से बहुत अधिक है। जिसका कोई औचित्य नहीं है। गांधी ने आगे लिखा कि उनका इरादा ब्रिटिश सरकार को नुकसान पहुंचाना नहीं है लेकिन ब्रिटिश हुकुमत को भी भारतीयों के हितों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। परन्तु वायसराय ने वार्ता का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। परिणाम स्वरूप गांधी ने स्वतंत्रता का उद्घोष कर दिया, नमक कानून तोड़ने का अपना इरादा जताकर। पूरा कार्यक्रम बहुत सोच विचार कर बनाया गया था जिसमें किस रास्ते से यात्रा की जायेगी, स्वयंसेवक अपना बिछौना साथ लेकर चलेंगे, क्या खा सकेंगे, गिरफ्तार किए जाने पर कौन नेतृत्व सम्हालेगा, महिलायें साथ नहीं जायेंगी क्योंकि आंदोलन को उनकी सेवाओं की भविष्य में जरूरत पड़ेगी आदि आदि। अपने प्रयाण पर निकलने से पहले प्रार्थना सभा को संबोधित करते हुए गांधी ने कहा था कि या तो पूर्ण स्वराज्य लेकर साबरमती लौटूंगा अन्यथा वापिस नहीं आऊंगा। और सचमुच बापू फिर कभी लौटकर साबरमती आये ही नहीं – पहले वर्धा चले गये और फिर सेवाग्राम में ही रह गये।

पर 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से निकल कर 200 मील तक पैदल चलकर समुद्र के किनारे डांडी में छः अप्रैल को नमक कानून तोड़ दिया। मुट्ठी भर नमक उठाकर गिरफ्तार किए गये पर तब तक आंदोलन इतना प्रबल हो चुका था कि बापू के साथ एक लाख लोग गिरफ्तार किए गए। इसका जितना असर भारत देश में, अंग्रेज साम्राज्य में तथा पूरी दुनिया में हुआ उतना अंग्रेजों को विवेकशील बनाने के लिए काफी था।

इस महान आंदोलन का पुर्नसृजन क्या सोच कर किया गया यह आज तक समझा नहीं जा सका है। जिस उद्देश्य ‘स्वराज’ के लिए यह शुरू किया गया था वह तो पूरा हो चुका था। राष्ट्र को जिस एकता के सूत्र में बांधा था इस आंदोलन ने 75वां साल मनाने वालों ने देश का मत विभाजन करके उस उद्देश्य को भी प्राप्त नहीं किया। आज भी जनता का गुजारा सूखी रोटी और नमक है, कम से कम पैतीस करोड़ (350,000,000) भारतीयों का। मगर अफसोस नमक उन्हें नसीब नहीं है – चौदह रूपये किलो बेचा जा रहा है नमक गांधी के भारत में। ऐसा तब जबकि यह नमक शत प्रतिशत शुद्ध नहीं है क्योंकि इसमें सोडियम क्लोराईड की मात्रा 70-80 प्रतिशत से अधिक नहीं है। शेष अलवणीय़ पदार्थों का मिश्रण है। इसका कारण नमक की कमी नहीं है। भारत में नमक की प्रति व्यक्ति औसत खपत 13 किलोग्राम आंकी गई है। अपनी जरूरत का नमक बनाकर उसका करीब 30-50 प्रतिशत निर्यात भी किया जा रहा है। अगर डांडी सत्याग्रह की 75वीं वर्षगांठ पर भारतीयों को नमक एक रूपया प्रति किलो भी उपलब्ध कराया जाता तो यह बापू के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होती। मगर उद्देश्य बापू नहीं किसी और को प्रचारित करना था। गांधी के बराबर में किसी को खड़ा करने से पहले  ऐसी ताकतों को उत्तर का एहसास होना चाहिए। लेकिन अगर ऐसा करना उनकी योग्यता से परे हो तो नेता बनने की चाह रखने वाले व्यक्ति को तो विवेकशील होना ही चाहिए। बिना विवेक कोई भारत का नम्बर एक का राष्ट्रीय नेता हो ही नहीं सकता।

गांधी से हटकर रास्ता ढूंढने वाले भयंकर ऐतिहासिक भूल कर चुके हैं जिन्हें सुधारा नहीं जा सकेगा। कोई देश का विभाजन कर बैठा तो किसी ने समाज को ही विभाजित कर दिया और कुछ अन्य राष्ट्र का विघटन करने में लगे हुए हैं। सत्ता लोलुप लोग अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए कुछ भी कर सकते हैं भले ही देश की आजादी ही खतरे में क्यों न पड़ जाये। गांधी दर्शन देश को अभी बचा सकता है, बशर्ते कि उस पर ईमानदारी से अमल किया जाये।

नेताओं को बरगलाने वालों की इस देश में कमी नहीं रही है। चाटुकारिता के नये नये आयाम छुए हैं हमारे लोगों ने। धरम परिवर्तन भी किए हैं और अपने नाम तक ऐसे रख लिए हैं कि अपना सामाजिक परिवेश छुपा कर रख सकें। यहाँ तक तो कुछ भी असामान्य नहीं है। परन्तु सत्ता के दुरूपयोग की हर दास्तां क्रूरता की कहानी होती है। भारतीय जब क्रूर व्यवहार करने लगता है तो कंस, रावण, जरासंध भी पीछे रह जाते हैं। इमरजेंसी में कुछ नौकरशाहों ने जो जुल्म भारतीयों पर किए हैं उनकी मिसाल पूरे भारतीय इतिहास में नहीं मिलती। जैसे लोगों के नाखून नुचवा देना, उनके पैरों पर से रौलर फिरवा देना, अत्याचार करना, मार डालना, हत्या करवा देना, अपहरण करवा देना, परिवार मित्र या अन्य नजदीकी लोगों को सताना आदि आदि। ऐसे लोगों ने सार्वजनिक रूप से अपने कुकर्मों के लिए आज तक माफी नहीं मांगी है। ये लोग फिर से सत्ता के इर्द-गिर्द पहुंच गये हैं। इनको दूर नहीं रखा गया तो ये ताकतें फिर से नेतृत्व की बुद्धि भ्रष्ट कर देंगी, उसकी मति बदल देंगी, उसे गलत रास्ते पर ले जायेंगी और स्थिति को इतना बिगाड़ कर रख देंगी कि फिर ये शक्तियां नेतृत्व को पुनः इमरजेंसी जैसा कोई बेवकूफी भरा दुश्कृत्य करने के लिए उकसायेंगी। कमजोर पडा नेतृत्व अपने आपको विरोधी खेमों से घिरा पाकर भय के कारण इन आततायी ताकतों के प्रभाव में आकर भूल कर बैठेगा। इसलिए उसे ये पहले से ही निश्चित कर लेना चाहिए कि उसे जन साधारण का सहयोग चाहिए या इन चन्द गुलमटो का जो सिर्फ दल्लेभर हैं! राजनीति, कम से कम भारतीय राजनीति, इतनी हल्की चीज नहीं है जिसे दल्लों के सुपुर्द करके बाजार में नीलाम होने के लिए बिठा दिया जाये। यह राजनीति महात्मा गांधी जैसी हस्तियों से पोषित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होती आई है। इसलिए इसका व्यवहार करने वाले भी उतने ही सुलझे हुए और समझदार लोग हो सकते हैं, उतने ही सम्माननीय भी। इस मामले में कोई समझौता नेतृत्व के लिए संभव नहीं है।

मानव सभ्यता का पाषाण युग में लौटना संभव नहीं है। हथियारों के बलबूते पर कोई भी समाज या राष्ट्र ज्यादा दिन नहीं चल सकता है। दो विश्व युद्धों, शीतयुद्ध और पिछले साठ सालों के अनेक छोटे-बड़े युद्धों (गृह युद्धों सहित) ने साबित कर दिया है कि मध्यकाल की शस्त्र संस्कृति अब असंगत हो चुकी है। यह संस्कृति शुद्ध अभारतीय संस्कृति है जिसका परिणाम भारत जैसे सुसंस्कृत समाजों ने सदियों तक भोगा है। कारण कि भारतीय राजनीतिक विचारधारा, शांति, समानता और मानव अधिकारों पर आधारित रही हैं। भारतीय दृष्टि में मानव समाज के सुख और समृद्धि के लिए केवल न्याय पर आधारित ऐसी शासन व्यवस्था ही उपयुक्त है जो चहुँ ओर शांति का संदेश फैलाये | हमारी विचारधारा केवल हमारे ही राष्ट्र के लिए लाभकारी नहीं है अपितु पूरे मानव समाज के लिए हितकर है। हमारी दृष्टि में समस्त मानव समाज एक परिवार है। ग्लोबालाईजेशन पश्चिमी देशों के लिए नितान्त नई वैचारिकता होगी। हम वसुधैव कुटुम्बकम् के ही प्रतिपादक नहीं रहे हैं बल्कि पूरे मानव समाज के कल्याण की विचारधारा का अनुसरण करते आये हैं जिसके अनुसार सब लोग सुखी हों, सब निरोग हों, सब समृद्ध हों और भ्रातृ-भाव के साथ जियें। हथियारों के हिमायती अगर अपनी सफलता-विफलता का जायजा लेंगे तो पायेंगे कि उन्हें कुछ समय के लिए ही विजय मिली, नुकसान ज्यादा हुआ। इसके विपरीत जब-जब जहाँ-जहाँ मानव समाज शांति स्थापित कर व्यवस्था कायम कर पाया, वहाँ उन्नति की नई-नई ऊंचाईयां छू गया। वहाँ श्रेष्ठ संस्कृतियां पनपीं। आज भी उन्हें सराहा जाता है। गांधीवाद शांति के इसी महत्व को दोहराता है। यह भारत की पूरे विश्व को सबसे बड़ी देन है। किन्तु यह देन हमारे लिए भी है। एकमात्र निर्यात के लिए नहीं, जैसा कि गौतम बुद्ध के साथ हुआ, जिनके बताये मार्ग पर भारत में नगण्य किन्तु विश्व में करोड़ों लोग आचरण करते हैं। हम भी अगर अपने देश में न्याय का शासन स्थापित कर सकें तो चारों ओर शांति कायम की जा सकती है। शांति के माहौल में लोगों की शक्ति और प्रतिभा-पूंजी विकास के काम में लगेगी। आसुरी वृत्तियों का दमन-शमन हो सकेगा। लोग सद्व्यवहार करने लगेंगे। समाज में प्रेम और सौहार्द का वातावरण पनपेगा। देश मजबूत होगा। वह अपनी सुरक्षा करने में सक्षम होगा। सही मायनों में भारत एक महाशक्ति बन सकता है। शांति के मार्ग पर चलकर ही महाशक्ति बना भारत दुनिया के दूसरे देशों के सामने मिसाल भी कायम कर सकता है और शांति के ऐजेन्डा को आगे बढ़ा सकता है। भारत की यह राजनीतिक विचारधारा दुनिया की सारी राजनीतिक विचारधाराओं या पोलिटिकल इज्मस से बेहतर है, ज्यादा स्वस्थ और पुष्ट है, सबके हित में है, भोगौलिक सीमाओं के बंधन से परे है, बेहद कम खर्चीली है और सबसे ज्यादा आसान होने के साथ-साथ शीघ्र प्राप्त की जा सकने वाली है। गांधी ने इसी को पुनर्स्थापित किया है। भारत का अस्तित्व इसी पर अमल करने पर टिका है। उसी पर विश्व शांति, स्थिरता और स्वास्थ्य टिका हुआ है।

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21वीं सदी के दूसरे चरित


वींसवी शताब्दी के अन्तिम दशक में इक्कीसवीं शताब्दी के प्रति अप्रतिम उत्साह था। सूचना क्रांति के फल उपलब्ध होने लग गये थे। वर्ल्डवाईड वैव, ई-मेल, ई-सर्विसेज तथा आई. टी. सर्विसेज ने विश्व का आर्थिक और तकनीकी परिवेश इस कदर प्रभावित कर दिया था कि हर कोई व्यक्ति उभरते ज्ञान-समाज से लाभान्वित होना चाहता था। अपार संभावनाओं से युवावर्ग तो विशेष रूप से उत्साहित था। इसलिए 21वीं शताव्दी के स्वागत में दुनिया भर के देशों ने प्रशासन और व्यापार दोनों ही के कम्प्यूटरीकरण पर हजारों करोड़ रुपये खर्च कर दिये। दुनिया के राजनेता माईक्रोसॉफ्ट के बिल गेटस् से मिलने के लिए लालायित रहते थे। जबकि पच्चीस बरस से कम समय पहले वो उसी बिल गेटस को मिलने का समय मांगने पर भले ही देते। संभावनाओं से उत्साहित होना स्वाभाविक है। उसी तरह स्वाभाविक है राह में रोड़े आना या सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने का। प्रकृति का नियम ही कुछ ऐसा है कि यहाँ सृजन के साथ-साथ ध्वंस भी प्रकट होता है। 21वीं शताब्दी उस प्राकृतिक स्वाभाविकता का अपवाद नहीं हो सकती थी। इसलिए हुई भी नहीं।

सदी के पहिले ही साल में ऐसा कुछ हुआ जिसने उत्साह को ठंड़ा करने का प्रयास प्रारम्भ कर दिया। सभ्यता की नई ऊंचाईयां छूने की उम्मीद लिये जो सदी  जन्मी थी उस पर पहिले ही वरस में वर्वरता, वहशीपन, नृशंसता और अमानवीयता ने प्रबल चोट करके अपने इरादे जतला दिये। मध्यकालीन संस्कृति के पक्षधरों ने दो विश्वयुद्धों के उपरान्त और शीत युद्ध की समाप्ति पर उभरी  शांति और विकास की संभावनाओं को, यह जतला कर ठेस  पहुंचा दी कि उनकी पिछड़ी सोच और वर्वरता उदार और खुले मानव समाज की स्थापना नहीं होने देगी। 9/11 नाम से बदनाम उनकी ये काली करतूूतें जग जाहिर है। उनके इरादों, मन्सूबों और नीयत को कम करके आंकने वाले, विश्व पटल पर घिर रहे खतरे के बादलों की नासमझ अनदेखी कर रहे हैं। जिसे कल तक बड़े राष्ट्र द्विपक्षीय  विवाद के रूप में देखते आ रहे थे, वही मध्ययुगीन प्रवृत्तियां आज विश्वभर के देशों को सता रही हैं। आज उनके कारण पूरा विश्व आतंकित, भयभीत और असुरक्षित है। कुछ लोगों की हरकतों ने विश्व का पूरा राजनैतिक वातावरण प्रभावित कर दिया है। विश्व शक्ति संतुलन पुनर्निर्धारित होने लगा है। उसी प्रक्रिया में विश्व का आर्थिक संतुलन लड़खड़ा गया है। मन्दी की मार ने अनेक देशों में बड़े-बड़े बैंक और उद्योग घरानों को दिवालिया कर दिया है।

अगर कुछ लोगों की गतिविधियों का यह मात्र अल्पकालिक परिणाम ही होता तो उसे नजर अंदाज किया जा सकता था। पर ऐसा है नहीं। इसमें विश्व सभ्यता के विनाश के लक्षण उभर कर  सामने आ रहे हैं। जब हर मानव मूल्य और मर्यादा तोड़ दी जाये तो विनाश होना  अवश्यम्भावी है। दुनिया में अब भले ही तीसरा विश्व युद्ध न लड़ा जाये। पर आतंकी गतिविधियों से संहार उससे भी ज्यादा होने की पूरी आशंका है। यह युद्ध का एकदम नया तरीका है। अमानवीय दुष्कर्मों में पेय जल को विषैला करना, जीवाणुओं से हमला करना, रासायनिक हमले, अणु हमले जैसे खतरनाक हथियार काम में लिये जाने है। विज्ञान, तकनीक, सूचना तकनीक, नैनो-तकनीक, वायोतकनीक आदि इसकी सफलता की गारंटी होंगे। छोटे-छोटे मासूम वच्चों को, लडकीयों को, गर्भवती महिलाओं को, बूढे-लाचार लोगों को, अपंग व्यक्तिओं को मानव-बम्ब बना कर न केवल विस्फोट कराये जा रहे हैं अपितु उन्हें कैमीकल और वायोलोजीकल हमले करने के लिए तैयार किया जायेगा। पूर्व में विष-कन्याओं का उपयोग किया ही जाता था। पर उनका परिमाण उतना बड़ा नहीं होता था जितना अब होता है। अब हर सभ्य परम्परा, सुअवसर, त्यौहार, यहाँ तक कि प्रार्थना-स्थल तक पर दहशत फैलाने का काम किया जायेगा। बर्बरता हर सभ्य पर्व को अपने हमले का निशाना वना कर दहशत फैलाती है। पत्रकार, वह भी महिला पत्रकार को वेईज्जत कर उसका गला काट कर सरे-आम हत्या करना बर्बरता को शोभा देता है। आधुनिक सभ्य समाज की उपलव्धियों से वंचित रहे लोग बर्बर तथा क्रूर व्यवहार करने के लिये उस समाज की उपलब्धियों को नष्ट-भ्रष्ट कर देना चाहते हैं। अपना सुधार करना उन्हें अच्छा नहीं लगता। पर दूसरों का िबगाड़ करना उन्हें बहुत पसंद है। इन ताकतों को सही रास्ते पर लाना आसान नहीं है। न ही आसान है उन्हें समूल नष्ट कर देना। चूंकि दुनिया में जनतांत्रिक शासन व्यवस्था लोगों को सुख-सुविधा मुहैया कराने में सफल हुए है। इसलिए उसे बर्बरता भी कबूल कर ले, आतंक को मंजूर नहीं है। उसे इस प्रक्रिया में अपनी सत्ता खत्म होने का खतरा स्पष्ट दिखाई देता हैं। बर्बरता, जंगलीपन और कानून का शासन साथ-साथ नहीं चलते है।

विश्व में उभरते उन खतरों से भारत अपने आप को अलग नहीं रख सकता। महज इसलिए कि जब हम पर आतंक का साया मंडरा रहा था तो विश्व ने उसकी अनदेखी कर दी थी। हम विश्व में उभरे उस खतरे की अनदेखी नहीं करें तो ही हमारा हित सिद्ध होगा। चाहे हम सभ्यताओं के टकराव की थीसिस को पूरी तरह नकार दें। पर यह तो सच है कि विश्व में सभ्यताओं का टकराव होता आया है। हो रहा है और होता रहेगा। ऐसे में गुट निरपेक्ष होना हमें हमेशा के लिये कमजोर कर देगा। हमारी वैदिक, सांस्कृतिक, वैचारिक सम्पदा कभी भी लुट सकती है। उसके सदा-सदा के लिए नष्ट किये जाने का खतरा है। जिस दिन हमारे पड़ौस के एक छोटे से राज्य श्रीलंका में गार्ड आफ हानर का निरीक्षण करते हुए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर एक सैनिक ने अपनी वंदूक से हमला किया, हमे उसी दिन समझ लेना चाहिये था विश्व के देशों में हमारे लिये कैसी सोच है। यह महत्व नहीं रखता कि हमला एक सिपाही ने किया या जनरल ने। महत्व इस बात का है कि उसने हमला करने की हिम्मत जुटाई। हमले का मुकावला तो किया ही जायेगा – चाहे हारें या जीतें। पर राष्ट्र की शक्ति उसमें दृष्टिगोचर होती है कि आप पर कोई हमला करने की सोच भी सकता है और असल में हमला करने की जुर्रत भी कर सकता है। देश में आये दिन किये जा रहे बम्ब धमाकों को जिस आसानी से और सफलता पूर्वक आतंकी करके निकल जाते हैं उससे तो यही प्रमाणित होता है कि हमारे पड़ौसी मुल्क हमसे न तो सौहार्द रखते हैं न ऐसे कुकृत्यों के परिणामों से डरते हैं। यह संकेत भयावह है। कब तक हम ऐसे कुकृत्यों की निन्दा, भर्त्सना भर करते रहेंगे? कितनी बार हम हमलावरों को बख्श्ते रहेंगे? पृथ्वीराज चौहान ने ये गलती सतरह बार की। पर अठारहवी बार का उसे मौका ही नहीं मिला। कितनी सदियाँ देश की जनता ने गुलामी में काटी उसकी उस भूल के लिये? क्या हम फिर उसी तरह की गलती दोहरा रहे है? अगर नहीं तो हमें अपने पडौसी राष्ट्रों से अपने सबंधों पर स्पष्ट विचार करना होगा और राष्ट्रीय हित में विश्व शक्ति संतुलन का आकलन करके अपनी चाल-ढाल जल्दी ही वदलनी होगी। हम पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे देशों की सहानुभूति के सहारे स्वतंत्र और सशक्त राष्ट्र नहीं रह पायेंगे। न ही हम हिंदी चीनी भाई-भाई का नारा लगाकर खुश हो पायेंगे। दुनिया के अन्य देशों, विशेष कर आसीयान देशों के बारे में भी हमारी नीति तुरंत प्रभाव से बदलाव की अपेक्षा रखती है। भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र तभी वन सकेगा जब हमारा नेतृत्व शक्तिशाली होगा और उसका चरित्र शक्तिशाली होगा। राजीव के बाद पुरानी सोच फिर लौटी थी। कथनी-करनी की दूरी फिर वढ़ने लगी थी। नेतृत्व का अर्थ कुछ महत्वाकाक्षाओं ने प्रधान मंत्री नियुक्त किया जाना लगा लिया। ऐसा हुआ भी। पर ज्यादातर, एक अपवाद को छोड़कर, कर्म से संकीर्ण विचार, दूषित कर्म और दुराचरण करने में ही व्यस्त रहे। जबकि देश को आवश्यकता थी नये विचार, नये जोश, नये संकल्पों और उनके क्रियान्वयन करने वाले नेतृत्व की। अभी तक तो इस दौर ने अधर्म को धर्म (गठबन्धन या कुलीशन धर्म), उप-राष्ट्रीयता को राष्ट्रीयता और अन्याय को न्याय बताकर सब अच्छे-बुरे कामों को संगत ठहरा दिया है।

विश्व में फैलती यह अराजकता सर्वत्र शासन प्रणालियों को प्रभावित करनेवाली है। खुलापन फिर से लोहे की दीवारों में कैद हो कर रह जाने वाला है। उस पर भारत अपनी कितनी खुली व्यवस्था चाहेगा, यह निर्णय अभी करना आवश्यक है। जिस तरह पाकिस्तान-बांग्लादेश-अफगानिस्तान से घुस पैठिये यहाँ आ जाते हैं, और आसानी से विधायिकाओं के मेम्बर तक चुन लिये जाते है, यह शोचनीय है। शोचनीय वह मानसिकता भी है जो ऐसे विषयों पर चर्चा करने पर किसी को भी सहज ही साम्प्रदायिक कह वैठती हैं। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि राष्ट्रीय एकता और भ्रातृत्व को मजबूत करने के सभी प्रयास आज कमजोर पड़ चुके हैं। उनका स्थान ले लिया है तरह-तरह के स्वार्थ-गुटों ने। आज भारत में जात-बिरादरी-सम्प्रदाय-मत और दलों ने इतना िबखराव तथा अलगाव पैदा कर दिया है कि भारत आतंकवादीयों के लिये एक आसान या नरम राष्ट्र बन गया है। जहाँ उन्हें वही उत्तर देना अपेक्षित था जो अमरीका ने 9/11 के बाद दिया तो स्थिति इतनी नाजुक कभी नहीं होती। पर हम करते रहे निन्दा, निन्दा और केवल निन्दा!

उस संदर्भ में यह ध्यान देने योग्य बात है कि विश्व क्षितिज पर उभर चुके आतंकवाद से वही देश सफलता पूर्वक  निपट सकेगा जो आतंकीयों को अपनी सर-जमीं पर नहीं बल्कि उनकी ही सर-जमी पर ध्वस्त करेगा। जो भी देश आतंकियों को अपने देश में घुस आने देगा और फिर उनका मुकावला करना चाहेगा, वो पिट जायेगा। ये बर्बर और नृसंश लोग हैं जिनकी संस्कृति आधुनिक सभ्य मानव समाज की सोच से मेल नहीं खाती है। इन्हें इन्हीं की भाषा में, इन्हीं के तरीके से, इन्हीं की पनाहगाह में नष्ट किया जाना जरुरी है। भारत की इस विषय़ में हिचकिचाहट हमारे अस्तित्व ही को समाप्त कर देगी। अगर हम फिर से पराधीन हो गये तो क्या करेगी हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था और क्या करेगा धर्म निरपेक्ष दर्शन? एकला चल कर हम कहीं नहीं पहुंचेंगे। वास्तविकता यह है कि आज केन्द्र सरकार के निर्देश सभी राज्यों में निष्ठापूर्वक क्रियान्वित नहीं किये जा रहे हैं। आतंकवादीयों के जडें जमा लेने पर यही राज्य सरकारे अगर स्वतंत्र राज्य की तरह बर्ताव करने लगें तो क्या होगा? हमारा राजनीतिक तंत्र कमजोर हो चुका है, प्रशासनिक ढांचा घुन खा चुका है, सामाजिक स्तर विखर चुका है और सांस्कृतिक विरासत अपनों के हाथों क्षत-विक्षत हो रही है। देर तो इतनी हो चुकी है कि हमें सम्हलने का मौका भी न मिले। हमारे साथ किसी सुपर पावर का कंधा से कंधा मिलाकर दिखाई न पड़ना चिन्तनीय है। जबकि पाकिस्तान के साथ चीन तथा अमेरीका दोनों ही गलबहियाँ डालने के लिए होड़ लगा रहे हैं। हम तो खुद अपनी ही शक्ति को नष्ट करने पर तुले हुए हैं। एकता ही हमारी शक्ति है। हमें चहुँ दिशाओं में अपनी शक्ति का एहसास कराना है। हमारा राष्ट्रीय चिह्न उस बात का प्रतीक है। इसको राज की ताकत के प्रतीक शेर सुरक्षित रखे हुए हैं। शक्तिशाली भारत ही शांति की स्थापना करके सह-अस्तित्व की रक्षा कर सकेगा। हिंसक संगठन कितनी भी हिंसा फैलायें, अन्ततः शांति कायम करनी ही पड़ेगी। अगर हम अपनी शक्ति को सजो सकें तो कोई कानी आँख भी हमारी स्वतंत्रता की ओर देखने का दुस्साहस नहीं कर सकता है।


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कठपुतली नहीं नेतृत्व


भारत को कमजोर राज्य की छवि दिखाने में कठपुतली सरकारों का अहम रोल रहा है। कभी नेतृत्व अपने राजनीतिक दर्शन, सूझबूझ, सदकर्मो से पहचाना जाता था। धीरे-धीरे उसमें गिरावट दर्ज की जाने लगी। जल्दी ही हालात वहाँ जा पहुंचे जहाँ सबसे कमजोर व्यक्ति के हाथ में, राज्यों में सरकार चलाने की जिम्मेदारी सौंपी जाने लगी। जन समर्थन विहीन ऐसे मुख्यमंत्री निर्वाचित न होकर नियुक्त होने लगे। वो कुछ सत्ता के दलालों के हाथो की कठपुतली बन गये और हाईकमांड की गुलामी ही उनका लक्ष्य रह गया। इसके लिये कानून की धज्जियां उसी तरह उड़ाई जिस तरह नौकरशाहों ने ईमर्जेन्सी में उड़ाई थी। ऐसी कठपुतली सरकारों का अस्तित्व किसी रिमोट (दूर नियंत्रक) के हाथ में होता था। मुख्यमंत्री ये नाम ही के होते थे, असल में सत्ता का संचालन कोई अन्य अमूर्त व्यक्ति ही करता था। यह परम्परा जब प्रधान मंत्री पद तक आ पहुंची तो भारत पर आतंकी हमलों पर हमले बढ़ने लगे। यह सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण था कि देश की बागडोर किसी सक्षम और कुशल राजनेता के हाथ में न होकर रिमोट के हाथ में पकड़ा दी गई थी। इसको संगत बताने के लिये जो भी कहा जायेगा,कम ही है। भारत के संविधान में न तो रिमोट की कोई अहमियत है और न ही कार्यसंचालक (कार्यवाहक भी नहीं) प्रधान मंत्री की व्यवस्था। अगर प्रधान मंत्री किसी कारणवश उपलब्ध नहीं है तो किसी दूसरे प्रधान मंत्री की व्यवस्था आवश्यक है। न कि काम चलाऊ व्यवस्था। विश्व का जो स्वरूप उभरता नजर आ रहा है और राष्ट्रीय एकता में जो सेंध लगाई जा चुकी है, उस का तकाजा है कि देश में एक मजबूत, समझदार, दूरदर्शी नेता हो। एक ऐसा नेता जो नायक के सभी गुण रखता हो, भले ही उसका एक दोष भी हो। एक दोष नहीं होगा तो नायक मंच से हटेगा कैसे ? वह तो भीष्मपितामह की तरह परिवर्तन को थाम कर खड़ा हो जायेगा। नायक अपना काम कर के चलता बने उसी में सब की भलाई है। फिर दूसरा नायक उभरकर सामने आ ही जायेगा। नेतृत्व तलाशता भारत वंश परम्परा से बंधकर नहीं रह सकता। जो भी व्यक्ति नेतृत्व सम्हाले उसे अपनी योग्यता सिद्ध करनी ही चाहिए, वरना चिपकू लोग राष्ट्र को ही निगल जायेंगे।

ऐसे नेता को पहिले भारत को समझना, देखना और परखना होगा, जैसा कि राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं, विशेषकर मोहनदास करमचन्द गांधी ने किया जो एक नवयुवक से शुरू करके महात्मा और राष्ट्रपिता के परम आदरणीय पद पर पहुंच गये। देश की समस्याओं और जनता की आवश्यकताओं का आकलन करके ऐसा नेतृत्व समाधान के उपाय ढूंढता है न कि कोरे गाल बजाता हो या भाषणबाजी करता हो। कुटिलता, कृपणता, क्रूरता जो आज के नेताओं, विशेषकर विधायकगण में लक्षित होती है वह नेतृत्व की नहीं दुष्टता की पहचान है। ऐसा व्यक्ति जब राष्ट्रीय समस्याओं को भी नहीं समझता हो तो उससे अन्तर्राष्ट्रीय स्थितियों की समीक्षा करने की अपेक्षा अनर्थक है। ऐसा व्यक्ति छुटभैया नेता तो हो सकता है पर दूरदर्शी राजनीतिज्ञ नहीं। छिंटे-फौंटा तो हो सकता है पर महात्मा नहीं। न ही युवक राजीव। इसलिये सुलझे हुए नेतृत्व को दिग्गज राष्ट्रीय नेताओं की ओर प्रेरणा के लिये देखना होगा, बौने तिकड़मबाज स्वार्थसाधना करने वाले प्रपंचीयों के नहीं। दाँव पर लगा है भारत का अस्तित्व, उसकी आन, बान, और शान। दाँव पर लगा है भारतीय जनता का भविष्य। उसका सुख-दुख, उसकी सुरक्षा-समृद्धि और सार्वजनिक हित। दाँव पर है विश्व शांति और सह अस्तित्व। हथियारों की दौड़ ने दुनिया को कहीं का नहीं छोड़ा है। आज आदमी ने जितनी प्राप्ति की है उतनी इतिहांस में पहिले कभी होने का प्रमाण नहीं है। किन्तु आज मानव जितना भयाक्रांत है उतना भी शायद कभी पहिले हुआ हो। उसका भी इतिहास कोई प्रमाण नहीं देता है। पर शांति और सहअस्तित्व आज से कहीं ज्यादा मात्रा में कायम रहा है, इस बात के प्रमाणों से इतिहास अटा पड़ा है।

भारत का हित इसी में है कि उसे एक स्वतंत्र, कुशल, निर्भीक, न्यायप्रिय, सच्चरित्र, लालचरहित और इक्कीसवीं सदी की सोच रखने वाला नेतृत्व मिले। उसका आधा जिम्मा तो जनता का है जिसे न केवल अपने मताधिकार का विवेकपूर्ण प्रयोग करना है वल्कि उस प्रकार के गुणों को प्रोत्साहित करके समाज को उत्तम नागरिक देना भी है, जिनमें से आगे चलकर कुशल और सक्षम नेतृत्व फलीभूत हो सके। फिर भी तात्कालिक रूप में राष्ट्रीय सोच की पार्टियों को उस ओर कदम उठाने होंगे। भारत में बढ़ती उप-राष्ट्रीयता, जो यह प्रचार करते नहीं थक रही हैं कि अब राष्ट्रीयता का नहीं प्रान्तीयता का जमाना आ गया है, अगर सफल होती है तो देश के अनेकानेक विभाजन अवश्यम्भावी है। पहिले प्रान्तीयता उपजेगी, फिर उपजेगी उप-प्रान्तीयता। फिर क्षेत्रीयता और अन्त में ले-देकर वही परिवारवाद। विखरकर भारत केवल टूट सकता है। एक हो कर वह अजेय होता रहा है।

सदियां गुजर गई है भारत को पराधीन हुये। पहिले जो सोने की चिड़िया कहलाता था उस देश में गरीबी जड़ जमा कर बैठ गई। उससे मुक्त होने के लिए ही तो राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन चला। उम्मीद थी कि गरीबी, भूख, पिछड़ापन और बीमारी से मुक्ति मिलेगी। स्वतंत्रता के बाद इस ओर कदम उठाये भी गये। पर जैसा कि पहिले कहा गया है वो धीमे तो थे ही, उनके रास्ते में कम रोड़े नहीं अटकाये गये। आर्थिक विकास भारत जैसे देश की अहम जरुरत है। विना आर्थिक सम्पन्नता के हम न तो सौ करोड़ से ज्यादा नागरिकों के भोजन की व्यवस्था कर सकते हैं, न कपड़ो की और न ही आवास की। विना आर्थिक सम्पन्नता सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा कोरे सपने रह जायेंगे। एक तो गुलामी की मार, उस पर माया (धन) के प्रति वितृष्णा पैदा करके उपदेशकों ने धनोपार्जन की क्षमता रखने वाले नागरिकों को पथभ्रष्ट कर निकम्मा बनाया है। विना धन के न राजतंत्र चला है न प्रजातंत्र चल सकता है। विना धन के न व्यक्ति जी सकता है न गृहस्थी चल सकती है। विना धन के राष्ट्र की सुरक्षा ही खतरे में पड़ जाती है। आज जब संसार ज्ञान-समाज की स्थापना कर चुका है, भारत को भी उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा।

धनोपार्जन के सभी साधनों का विकास राज्य का पहला कर्तव्य है। धनोपार्जन के सभी अवसर सभी नागरिकों को समानरूप से उपलब्ध कराना उसका ध्येय होता है। ऐसा राज्य किसी कुशल नायक के नेतृत्व में ही विकसित हो सकता है। इसकी वजह से उत्पादन की नई-नई ईकाईयाँ स्थापित होंगी। रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे और आर्थिक विकास में तेजी आयेगी। भारत के अपार आर्थिक विकास की संभावनाओं को किस आधार पर आकलन किया जाये, यह विचारणीय है।

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भारतीय क्षमतायें


भारत पर कुदरत बहुत मेहरबान रही है। यह देश प्रकृति के प्रसाद से लाभान्वित होते हुए अपने कौशल और श्रम के आधार पर समृद्ध होता आया है। संसार के अनेक देश ऐसे हैं जो समानरूप से भाग्यशाली रहे हैं। पर हमें भारत की क्षमताओं का संक्षिप्त वर्णन उचित लगता है। इनमें से कुछ इस प्रकार हैं :–

  1. भारत प्राकृतिक साधनों से भरपूर देश है।
  2. भारत की जलवायु बेहद खूबसूरत है।
  3. यह वीरों का देश तो है ही, यहाँ के लोग बेहद मेहनती हैं।
  4. भारत के लोग कुशाग्र बुद्धि वाले है।
  5. यहाँ पढ़े-लिखे कुशल कारीगर उपलब्ध हैं।
  6. यहाँ का श्रमिक विश्वसनीय है।
  7. यहाँ के लोग सृजनशील और आविष्कारक है।
  8. यहाँ प्रचुर बौद्धिक सम्पदा उपलब्ध है।
  9. यह बहुभाषी लोगों का देश है जो विश्व की प्राय सभी भाषायें बोल-समझ सकते हैं।
  10. भारत के लोग सभी धर्म और संस्कृतियों के साथ मिलजुल कर रहते हैं।
  11. यहाँ के लोग प्रकृति से आध्यात्मिक हैं।
  12. भारतवासीयों का दृष्टिकोण अनूठा है। ये विश्व और मानवता को एक समाज मानते है। जो वैश्वीकरण से पूर्व की अवधारणा है।
  13. भारत ने अपने हित साधने के लिये कभी किसी दूसरे देश का शोषण नहीं किया है।
  14. शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व भारतीय सोच का एक विशिष्ट स्तम्भ है।
  15. भारत एक विशाल प्रजातांत्रिक देश है।
  16. भारत में स्थायित्व है और व्यवस्थित सरकारी तंत्र कार्यरत है।
  17. यहाँ विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी की अवस्था उन्नत है।
  18. विस्तृत और विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाये यहाँ उपलब्ध हैं।
  19. यहाँ की संचार व्यवस्था अब काफी परिष्कृत है।
  20. तेजी से विकसित होती अर्थ व्यवस्था है।
  21. भारत का विस्तृत तटीय प्रदेश है।

अनेक में से उपरोक्त कुछ विशेष क्षमतायें है जिन्हें कुशल नेतृत्व राष्ट्रीय उन्नति के लिये काम में ला सकता है। नेतृत्व की कमी में ये व्यर्थ जायेगा। विश्व बहुत जल्दी ही वैश्वीकरण की धुरी छोड़कर राष्ट्रीकरण की ओर पुनः झुकने लग गया है। भारत में भी अगर राष्ट्रीयता का उच्च स्थान उप-राष्ट्रीयतायें लेने में सफल होती है तो यह विकास की गति को उल्टी दिशा में मोड़ देने के समान होगा। ऐसी क्षमताओं का उपयोग राष्ट्रहित में होना ही चाहिये। विशेषकर तब जब कि अन्तर्राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था आमूल-चूल परिवर्तन के लिये छटपटा रही है और नई व्यवस्था जन्म लेने के लिये तैयार हो रही है।


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ब्रेन ड्रेन नहीं, ब्रेन गेन


एक लम्बे समय तक नियंत्रित अर्थव्यवस्था की जकड़न के कारण भारत से बड़ी संख्या में प्रतिभा का पलायन हुआ है। यहाँ पूंजी की कमी थी। अच्छे रोजगार उपलब्ध नहीं थे। लिहाजा जिसको मौका मिला वो ही योरोप या अमरीका चला गया। बजाय उनकी मेधा का राष्ट्रीय विकास में उपयोग करने के। उनके द्वारा अपनी कमाई का एक हिस्सा भारत में परिवार को भेजे जाने को उपकारी मान लिया गया। भारतीय उत्पादों का निर्यात न हो तो न सही, यहाँ की क्षमता का ही निर्यात सही। हर साल के बजट में विदेशी मुद्रा की बढ़ती आवक की सूचना सराहनात्मक वाणी में की जाती रही है। राजीव के उदारीकरण के बाद उस रवैये में कुछ बदलाव अवश्य आया जब बहुत से प्रवासी भारतीय देश वापिस लौटकर यहाँ उत्पादक ईकाईयाँ स्थापित करने लगे। कुछ ने बाहर जाने के वजाय यहाँ रहकर ही नई आवोहवा में अपना कारोबार शुरू किया और इतनी सफलता हासिल की कि परम्परागत उद्योगपतियों से ज्यादा पूंजी अर्जित करके दिखा दी। अब समय आ गया है कि भारत विकसित देशों की तरह ब्रेन गेन करने लगे। दूसरे शब्दों में विश्व के सभी देशों से प्रतिभा को यहाँ आकर उत्पादन और विकास करने के लिये प्रेरित कर अपनी प्रगति की गति बढ़ाये। नगर राज्यों से लेकर आधुनिक विकसित राष्ट्रों के उत्थान और वैभव का इतिहास गवाह है कि जहाँ कही भी प्रतिभाओं को पनपने में राज्य अगुवाई करता रहा है, वहाँ प्रगति अपने उच्च शिखर पर पहुंची है।

बौद्धिक सम्पदा व्यक्ति, परिवार और राष्ट्र सभी की बहुमूल्य थाती होती है। इसके लिये मेधा का निरन्तर उन्नयन करना शासन की जिम्मेदारी है। इस नितान्त अदृश्य क्षमता का महत्व राजनीति के दावेदारों ने कम ही समझा है। एक तरह से ज्ञान अर्जन करने वालों को नीति, नियम, कानून के नाम पर हतोत्साहित करके बाहर धकेल दिया गया है। राजीव को गुजरे दो दशक से ज्यादा होने को हैं। उनके उपरान्त राजनीतिक गतिविधियां पुनः उनके पूर्व की स्थितियों में लौटने लगी हैं। पिछले दरवाजे से तरह-तरह के नियंत्रण और बंधन हावी होने के लिये प्रयास रत हैं। होना यह चाहिये था कि वींसवीं सदी के अन्तिम दशकों में हुए ज्ञान के विस्फोट का पूरा लाभ उठाने के लिये हमें अपनी प्रतिभाओं को तो प्रोत्साहित करना ही चाहिये था, साथ ही प्रतिभाओं का बड़े पैमाने पर आयात करके घरेलू उत्पादन को बढ़ाना चाहिये था। आज हमारा निर्यात उत्पादों का नगण्य सा है। जबकि कृषि उत्पादों, खनिजों, सेवाओं आदि का अधिक है। अभी हमें भारतीय उत्पाद, तकनीक, डिजायन आदि के निर्यात को बढा़ने का लक्ष्य लेकर चलना होगा, जिससे रोजगार के अपेक्षित अवसर उपलब्ध हो सकें।

आज दुनिया के सबसे ज्यादा नोबेल पुरस्कार और पेटेन्ट अमरीका के नाम दर्ज होते हैं। कारण प्रतिभा आयात की उनकी खुली नीति। अमरीका की उन उपलब्धीयों में भारत जैसे देशों की प्रतिभाओं का उल्लेखनीय योगदान रहा है। समय आ गया है जब हम भी अपनी क्षमताओं का भरपूर विकास और उपयोग करें। जिससे नालेज प्रोसेस आऊटसोर्सिंग, क्लीनिकल रिसर्च आउटसोर्सिंग (सी. आर. ओ़) के माध्यम से दूसरे राष्ट्रों के लिये किया जा रहा यह योगदान एक तरह की सेवा से आगे बढ़कर सचमुच ही लाभकारी इन्डस्ट्री बन जाये (अभी अर्थशास्त्रीय भाषा में उसे सर्विस इन्डस्ट्री कहा जा रहा है)। टाटा मोटर्स की नैनो कार को एक उदाहरण के रूप में देखें तो समझ जायेंगे कि राजीव उपरान्त भारत में उस तरह के सराहनीय प्रयासों के फलित होने में कितने विघ्न, कितनी बाधायें, कितने रोड़े अटकाये जाते हैं। जिस उपलब्धि पर हम सब को नाज़ है, निहित स्वार्थों और राजनीति को उससे कितना कष्ट होता है। भारत की प्रगति को कितना, कैसे और किन-किन तत्वों ने भरपूर ताकत से रोका है, यह उस दृष्टान्त से उजागर हो जाता है। तब भारत में उदारीकरण कितना कठिन काम रहा होगा उसका अंदाजा लगाया जा सकता है। क्रांतिकारी और तीव्र कदम उठाकर राजीव ने कितना खतरा अनजाने ही मोल ले लिया था। इसका भी अंदाजा लगाया जा सकता है। सुधार की कोई भी प्रक्रिया क्यों न हो, उसका ऐसा अनुभव होना ही है। जब कभी भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (फेयर प्राईस शॉपस) में सुधार की बात की जायेगी, इससे कम उथल-पुथल नहीं होगी। पर खतरों के भय से कदम आगे बढ़ाने से तो रोके नहीं जा सकते। उम्मीद है कि 1947 के बाद जन्मी पीढ़ी अवश्य ही कुछ नया कर दिखायेगी। उसके लिये उसे प्रतिभाओं का आदर और पोषण करना होगा।

आधुनिक ज्ञान-समाज में हमारा राजनीतिक दर्शन और मुहाबरा दोनों ही प्रतिभाओं के प्रोत्साहन का होना ही है। बासी राजनीतिक विचारधाराओं को दर किनार कर नयी विचारधारा को अंगीकार करना आवश्यक है। भले ही आर्थिक मंदी का दौर आ जाये, प्रतिभायें ही राष्ट्र को मंदी से उबारेंगी। प्रतिभायें हमेशा मूल्यवान रहेंगी। वल्कि आर्थिक मंदी के समय प्रतिभाओं को अपने लिये काम में लाना सही दिशा में सही कदम उठाना होगा। किसी एक क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता प्राप्त करके भारतीय ब्रांड-नाम, या साख को स्थापित करना सामयिक होगा। वायोटेक्नोलौजी और नैनो-टेक्नोलौजी में उपलब्धि की अपार सम्भावनायें है। इन क्षेत्रों के लिये तकनीकी और वैज्ञानिक विशेषज्ञ हमारी विशेषता है। मानव संसाधन विकास एक जबरदस्त क्षमताओं वाला क्षेत्र हो सकता था, पर उसे सही स्थान तक ले जाने से पहले राजीव की सरकार का कार्यकाल समाप्त हो गया। जहाँ सम्भावनाओं की खान मौजूद है वहीं हमने मिट्टी डाल दी है। उसी तरह आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और योग जैसी समृद्ध परम्परा के देश से एक भी ऐसी नई दवा दुनियों में उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है जिससे भारत का नाम रोशन हो जैसे कि कोई कैंसर की दवा। अभी भी हम सिर दर्द की गोली, खाँसी की दवा और दूसरी पापूलर दवाईयाँ विदेशी कम्पनीयों द्वारा बेची गई ही खरीदकर काम चलाते है। जब कि ऐसी ब्रांडेड दवाई हमारी इंडस्ट्री को भी बनाने के लिये उत्साहित किया जाना चाहिये। उसमें लागत और समय दोनो की बहुत ज्यादा मात्रा में जरुरत होती है। जबकि हम अफसरशाही के मार्गदर्शन में सार्वजनिक क्षेत्र में होते हुए पहिले लघु उद्योग में रिजर्वेशन का अनुभव लेते हुए अभी भी लक्ष्य से मीलों दूर हैं। चीन तथा कोरिया जैसे देश ईर्ष्या करने योग्य हैं कि उन्होंने अपनी क्षमताओं को इतना अधिक बढ़ा लिया है कि उनके यहां ज्यादातर चीजों का उत्पादन घरेलू स्तर पर होता है। हम जल्दी नहीं बढ़े, तो हमारी प्रतिभाओं का पुनः पलायन होना दूर की बात नहीं है।

प्रतिभाओं के फलने-फूलने से ही भारतीय नागरिकों को विश्व स्तर के उत्पाद और सेवायें उपलब्ध हो पायेंगी। भारत की औद्योगिक और आर्थिक विकास दर बढ़ सकेगी। शिक्षा, चिकित्सा, न्याय जब उच्च स्तरीय होगा तभी जन संतोष पनपेगा, जिससे अच्छे भारतीय समाज का स्वरूप उभर कर सामने आ सकेगा। न तो लोग टूटी-फूटी-गढ्ढों वाली सड़कों को लेकर अपना असंतोष दर्ज करायेंगे, न ही टूटे-फूटे-बदसूरत भवनों को आलोचना का विषय बनायेंगे। भारत में भी एक नहीं अनेक कैम्ब्रिज, आक्सफोर्ड और हार्वर्ड जैसे संस्थान स्थापित किये जा सकेंगे। अगर आई. आई. टी. और आई. आई. एम. जैसे संस्थान स्थापित करके कीर्ति अर्जित की जा सकती है, तो अन्य संस्थान भी स्थापित किये जा सकते हैं। इन संस्थानों से अनुसंधान को बढ़ावा मिलेगा। स्तरीय ग्रंथों की संरचना हो सकेगी। अभी भी भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा उच्च स्तरीय शिक्षा से वंचित रह जाता है। भारत के राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने भी उस बात की चर्चा की है कि उच्च शिक्षा का स्तर सुधारने की आवश्यकता है। योजना आयोग भी उस बात पर जोर दे रहा है। राष्ट्रीय प्रतिभा कोष का सदुपयोग आम जीवन में खुशहाली लाने की स्थितियाँ पैदा कर सकेगा। यह निष्कर्ष उस बात से स्वयं सिद्ध है कि उदारीकरण का लाभ आम आदमी तक पहुंचा है। चाहे वह सूचना क्रांति हो अथवा यातायात अथवा संचार माध्यम (विशेषकर मोबाईल फोन) या रोजगार के नये अवसर। भारत जो समय-समय पर निद्रास्थ होता आया है और जिसे समय-समय पर यह कहकर जगाया जाता रहा कि ‘‘उत्तिष्ठ, जाग्रत’’ या ‘‘चरैवेति, चरैवेति’’ (यानी उठ, जाग या चलते रहो, चलते रहो) को एक बार फिर हचेड़कर उठाना होगा, चलाना होगा और पुनः उसे उसका गौरवमय स्थान दिलाना होगा। ज्ञान अर्जन करनेवाले (नालेज क्रियेटर्स) विषिष्टजन होते हैं। उन्हें प्रश्रय देना राष्ट्रीय नीति का एक शुभ लक्षण होना चाहिये। ज्ञान-सृजक परम स्वतंत्र व्यक्तित्व के धनी लोग होते है। उन्हें राजनीति के दाँव-पेच और अफसरशाही की कुटिल चालों से महफूज रखना हितकारी नीति होती है।


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अब चूके तो फिर . . .


कहावत पुरानी जरुर है पर आज भी उतनी ही सार्थक है। कहा गया है कि अनी चूकी सौ बरस की जाये। राष्ट्रीय हितों के बारे में यह उक्ति शत प्रतिशत सत्य है क्योंकि सुंई की नोक के बराबर चूक भी अगर हो जाये तो उसका सुधार सैंकड़ो वर्षो में भी नहीं हो पाता। गल्ती करता है कोई, फल और सज़ा भुगतती हैं सदियाँ! भारत 1989 और 2009 कुछ ऐसा ही समय प्रकट होने की दस्तक देता लगता है। सन 1989 में शुरू हुआ था विचारों के दूषित होने का सिलसिला। शुद्ध राजनीतिक विचारधारायें भी तात्कालिक लाभ के लिये डगमगाने लग गईं। उच्च राष्ट्रीय लक्ष्य क्षुद्र व्यक्तिगत लक्ष्यों का स्थान लेना शुरू कर चुके थे। सौहार्द और भाईचारे का स्थान प्रतिशोध और प्रतिशोध और भी अधिक प्रतिशोध ने लेना शुरू कर दिया। विचारों का दूषित बनने का क्रम प्रारम्भ हो चुका था। वंचक व्यक्तित्व राष्ट्र की बागडोर पकड़ने की जुगाड़ में लग चुके थे। भारत की आम जनता की राजनीति और राजनेताओं से निर्लिप्ति उन तत्वों को मजबूत करने में सहायक सिद्ध हुई। भारतीय मतदाता की उदासीनता का आलम ये है कि किसी भी आम चुनाव में 51% मत नहीं डाले गये हैं। जहाँ मतदान केन्द्रों पर 80% या  95% मतदान हुआ है वहाँ की दास्तान कुछ अलग थी जिसका बयान खुद प्रयोग में लाई गई भाषा है जिसमें शामिल हैं : बूथ कैपचरींग, वोट छापना, जाली मतदान, स्टाम्पिंग आदि।  100% मतदान किये जाने पर तो कई बार पुर्नमतदान स्वंय चुनाव आयोग ने ही कराये हैं। उसके बाद धौंस, धमकी, डाँट-डपट, डराना जैसी  कार्यविधियों का अपना अलग योगदान रहा है। उस रवैये का थोड़ा खुलासा जरूरी हैं।

भारत का आम नागरिक अपने आप को राजनीति से दूर ही रखता है। इसके कारण पैदा होने बाले वैमनस्य और लड़ाई-झगड़ों से वह अपने आप को सुरक्षित रखना चाहता है। स्थानीय नेताओं के आचरण से आम व्यक्ति ज्यादातर पीड़ित है। इसलिये नाराज भी है। जो साधारण नागरिक परेशानी दूर करना प्रशासन की कानूनन जिम्मेदारी है, वह भी िबना लिये-दिये नहीं होता। जन्म-मरण के प्रमाण-पत्र से लेकर, स्कूलों में दाखिला, नौकरी, चिकित्सा, सुरक्षा, न्याय, स्वरोजगार, उद्योग, व्यवसाय कोई भी ऐसा काम नहीं है जो आम नागरिक का वास्ता तो रोज का हो, पर िबना भ्रष्टाचार का अभय दान पाये नियमित रूप से अपने-आप हो सकता हो। चुनावी भाषणों में जुटने वाली भीड़ शनैः-शनैः इतनी कम पड़ गई है कि अब पैसे देकर भीड़ जुटानी पड़ती हैं। नेता और जनता के बीच का परस्पर विश्चास का कच्चा धागा टूट गया है। राजनीतिक दलों का चुनाबी घोषणापत्र एक खोखला दस्तावेज़ भर रह गया हैं। उस सबने मिलकर आम आदमी की राजनेताओं के प्रति अरुचि इतनी बढ़ा दी कि लोग उनसे पूरी तरह नाउम्मीद और नाराज हो गये हैं। ऐसे में चुनाव के अवसर पर प्रपंचीयों का बोल-बाला बढ़ जाता हैं। खादी पहनना, राजनीतिक रूप से बेचे जाने योग्य भाषा का प्रयोग करना, अपने प्रतिद्वन्दी की छवि धूमिल करना, समाज में विभाजक प्रवृतियों को वीररस में घोलकर सभ्य लोगों को भी मूर्छित करना, अपनी बलवती लालसा को छुपा कर जनसेवा करने का ढिंढोरा पीटना इत्यादि ऐसे अनेक अस्त्रों का प्रयोग करना जिससे लोगों की सोच उस समय उनके पक्ष में हो जाये। आज 2009 में सिर्फ वीस सालों में इन कारस्तानीयों ने भारत को वहाँ ला खड़ा कर दिया है जहाँ अब स्थिति को सम्हाला नहीं गया तो न जाने कितनी शताव्दीयाँ लग जायेंगी।

आज भारत में सही मायनों में एक भी राजनीतिक विचारधारा शुद्ध नहीं है। दूषित होते-होते आज राजनीति यहाँ तक जा पहुँची है जहाँ स्वार्थ सिद्ध करने के लिये कोई भी व्यक्ति अथवा दल किसी भी व्यक्ति या दल से चुनावी समझौता करने को तैयार रहता है। ऐसे समझौते अक्सर विरोधी विचारधाराओं के बीच ही नहीं, दुश्मनों के बीच भी हो रहे हैं। सरकार का समर्थन भी ये आपस में करते हैं और विरोध भी साथ ही साथ करते हैं। चुनाव में ये या तो गठबन्धन करते हैं या सीट शेयरींग करते हैं या  फ्रेंडली फाईट करते हैं। जनता इनसे इतनी भ्रमित होती है कि उन्हें अपने जैसे न समझकर अपने से बहुत उपर का व्यक्ति समझने लगती हैं। और तो और, घोर नास्तिक नेता और नास्तिक दल, आज के इस वैज्ञानिक युग में, ‘‘धर्म’’ शब्द का धड़ल्ले से प्रयोग करने लगे हैं। इनकी शिकायत रहती है कि गठबन्धन की अगुवाई कर रहा दल ‘‘गठबन्धन धर्म या कुलीशन धर्मा’’ का पालन नहीं कर रहा हैं। इनकी धर्म में आस्था न होते हुये भी दूसरों से धर्माचरण की अपेक्षा रहती है। ये लोग, इनके दल, इनकी समझ, इनकी विचारधारा, इनकी भाषा सब कुछ धर्म शब्द के जिक्र भर कर देने पर भड़क उठते हैं। अब जब ये धर्म को जीवन से बाहर निकाल ही चुके है तो धर्माचरण की अपेक्षा क्यों करते हैं? कैसे करते हैं? धर्म का आचरण कुछ शाश्वत नियमों पर चलकर होता है जो सर्वमान्य होते हैं। एक का धर्म दूसरे का धर्म ही होता हैं। किसी का धर्म किसी दूसरे का अधर्म नहीं होता। किन्तु धर्म का उपदेश करने वाले स्वयं धर्म का पालन नहीं करके उसका हवाला देकर दूसरे को धर्म के दायरे में बाँधकर निष्क्रिय किये रखना चाहते हैं। क्या यह कुलीशन धर्म कहा जा सकता है कि कुलीशन पार्टनर अपनी ही सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों, योजनाओं की सार्वजनिक भर्त्सना करें, तीखी आलोचना करें, मखौल उड़ायें और सरकार के पैरों में बेड़ियाँ डालकर रखने की कुचेष्टा करें और फिर भी सरकार को कुलीशन धर्म के पालन का प्रवचन करें?

1989 के बाद एक किस्सा हुआ था जिसमें किसी व्यक्ति ने तत्कालीन प्रधान मंत्री को एक करोड़ रूपया देने का बखेड़ा खड़ा किया था। वह एक विशेष प्रकार का व्यक्ति था। कई साल तक भारतीय बजट पर बजट पेश होने के बाद उससे प्रमुख रूप से चर्चा की जाती थी। उसकी राय माँगी जाती थी। उसका देश के आर्थिक तथा वित्तीय  तंत्र से गहरा संबंध हुआ करता था। कोई अचम्मा नहीं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री तुरंत हरकत में आते और तुरंत कार्यवाही वल्कि प्रभावी कार्यवाही करते। ऐसा हुआ भी। उस एक करोड़ ने करोड़ की ऐसी महिमा का देश में मंड़न किया कि भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक को भी उस पर टिप्पणी करनी पड़ी। उस एक करोड़ के गर्भ से जन्म हुआ एक ऐसी योजना का जो अनूठी तो थी ही, देश में पहली बार सोची और लागू की गई। यह योजना एम.पी. लैड़ स्कीम के नाम से जानी जाती है। इसमें हर मैंम्बर ऑफ पार्लियामेन्ट को अपने लोकल एरिया में  डेवलपमेन्ट करने के लिए राजकोष से प्रति वर्ष दो करोड़ रुपये तक खर्च करने के लिए धन उपलव्ध कराया गया था। यानी पाँच साल के कार्यकाल में एक संसद सदस्य को दस करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध कराई गई। उसके बाद एक करोड़ की चर्चा होना ही बंद हो गया। मूलतः उस योजना का उद्देश्य यही था की सांसद अपने मतदाताओं की अपेक्षा के अनुसार विकास कार्य करवा सकें। यह राशि उस क्षेत्र के योजनागत खर्च के अतिरिक्त होती है और उसे जिला कलेक्टर की अध्यक्षता वाली कमेटी उन मुद्दो पर खर्च करती है जिन्हें  सांसद ने प्रस्तावित किया हो। स्कीम कितनी कारगर हुई, यह अभी बताया जाना शेष है। पर अगर भारत के महालेखापरीक्षक ने निष्पक्ष और पैनी जाँच कर कोई रिपोर्ट जल्दी पेश की तो दूध का दूध हो ही जायेगा।

कोई भी योजना अच्छे या बुरे परिणाम दे सकती है। यह उस बात पर निर्भर करता है कि योजना को किन कर कमलों ने छुआ है। अच्छे हाथ जहाँ लगे वहाँ बहुत अच्छे परिणाम सामने आये और बुरे हाथों ने अपने हाथों की सफाई के भी नमूने पेश कर दिये। पर उस योजना ने उस बात को पुख्ता कर दिया कि सचमुच में जनता और सरकार के बीच संवाद चटका हुआ है, कि विकास की सारी योजनायें कुछ गिने चुने क्षेत्रों तक सीमित रह गई हैं और यह कि राष्ट्रीय योजना आयोग में निर्मित अच्छी-अच्छी योजनाओं का लाभ ज्यादातर क्षेत्रों में आम आदमी तक नहीं पहुँच रहा है। उस योजना की तर्ज पर शुरु हुई राज्यों में विधानसभा सदस्यों की उसी प्रकार की योजना ने इस बात को और भी बल दिया। योजनागत धन पहिले ही से वर्ष-दर-वर्ष विना खर्च किये मार्च के महीने में वापिस राजकोष को लौटाया जा रहा था। इन नई योजनाओं का भी अधिकतम पैसा बिन खर्च किये रह गया और जो खर्च भी हुआ उनमें से कुछ ही उन कामों पर खर्च हुआ जो जनता की माँग थी। प्रशासन की अयोग्यता का उससे ज्यादा और क्या सबूत चाहिये था? सरकार, नेता, राजनैतिक दल, राजनैतिक विचारधारा और प्रशासन से खिन्न, दुखी और निराश नागरिक 2009 में इतना विभ्रमित हो चुका था कि इस चुनाव ने अगर देश को एक साहसी, दूरदर्शी, विचारक, गंभीर, चरित्रवान, जनसेवक और राष्ट्रवादी नेता नही िदया तो भारत की ओर लपकती िवनाश की लपटें, जन असंतोष, कलह, हिंसा, भूख, गरीबी, बीमारी, अशिक्षा, पिछड़ापन, नैतिक पतन देश को ले डूबेगा| इस बार यह विनाश दासता के पिछले सभी रिकार्ड तोड़ देगा! चुनाव परिणामों ने विचारवान लोगों को निराश किया है।

भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाने की जिम्मेदारी अब नेतृत्व की है। जनता का विश्वास खो देने के ऐसे संकटकाल ही में नेतृत्व के कुशल होने या न होने का प्रमाण मिलता हैं। अगर भारतीय संविधान पर निष्ठा से अमल किया जाये तो कोई कारण नहीं कि यह राष्ट्र एक महाशक्ति न बन जाये। िबना ऐसा हुए उसका अस्तित्व ही खतरे में हैं। देश ही में सभी क्षेत्रों में नागरिक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। हिंसा के शिकार हो रहे हैं। अपने ही घर में शरणार्थी बने कैम्पों में अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं। फिर प्रवासी भारतीयों की रक्षा तो दूर की बात हैं। आये दिन भारतीयों पर दूसरे देशों में जानलेवा हमले हो रहे हैं, उन्हें खदेड़ा जा रहा हैं। ये वही भारतीय या भारतभूमि के प्रवासी हैं जिनको भारत में पूंजी लगाने के लिये बहलाने-फुसलाने के वास्ते हर प्रांत के मुख्यमंत्री से लेकर भारत सरकार के मंत्री तक न जाने कितनी-कितनी बार कितने-कितने देशों का भ्रमण कर चुके है और आगे भी जाते रहेंगे। उससे तो कोई गुरेज नहीं। पर एक प्रश्न अपना उत्तर अवश्य चाहता है। वह यह कि जब उनकी जान-माल खतरे में होगी तो भारत सरकार उनकी कितनी मदद करेगी और कितनी जल्दी करेगी? आज कोई अमरीका, यूरोप, रूस, चीन जैसे किसी देश के नागरिकों के साथ बुरा सलूक करके देख ले कि परिणाम क्या होते हैं। इन देशों का खौफ ही इतना है कि करने वाला करने से पहले सौ बार सोचेगा। भारत के विषय में वह कर पहिले देंगे और सोचना पड़ा तो बाद में सोचेंगे। किया है किसी देश ने आजतक अफसोस जाहिर अपने यहाँ बसे हुए भारतीयों के मारे जाने पर? अभी तो हमारे भू-भाग से जुड़े हमारे पड़ौस के देश तक निर्विघ्न भारतीयों पर अत्याचार किये जा रहे हैं और हम है कि प्रयत्न कर रहें है कि विश्व समुदाय उन्हें दण्डित करे। इतिहास में तो ऐसा कहीं भी कभी भी हुआ नहीं है और कोई अगर स्वप्न ही लेना चाहे तो उसकी मनाही भी नहीं हैं। महाशक्तियों का स्वरूप ऐसा नहीं होता हैं। उनसे तो शक्तिवान भी दोस्ती और संधि करना अपने निजी हित में समझते हैं और छोटे-मोटे राज्य तो उन्हें गलती से भी नाराज न कर देने की सावधानी बरतते हैं। अगर भारत ऐसा नहीं रहा होता तो उसकी हस्ती कब की मिट चुकी होती। उसने भले ही किसी दूसरे राष्ट्र की हस्ती कभी न मिटाई हो, पर राष्ट्र के प्रतीक अशोक स्तम्भ के शेरों की तरह अपनी सामर्थ्य का चहुर्दिशि उद्घोष अवश्य किया हैं। उसको फिर से गुंजाना जरूरी है। कारण कि हिंदुस्तान पर फिर से हुकुमत करने की हिलोरें बहुत लोगों के दिलों में अर्से से उठ रही हैं। ऐसे लोग दिन में भी सपने देखते हैं। इसका एक निर्णायक उत्तर महाशक्ति भारत ही हैं।

भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अशोक-स्तम्भ का चयन राष्ट्र के बुलन्द इरादों और नेक-नीयती का एक खुला दस्तावेज़ है। शक्तिशाली बनने के साथ इस प्रजातंत्र को धर्म का शासन स्थापित करना था। यह धर्म आज की भाषा में कानून का शासन है जहाँ सभी नागरिक निर्भय होकर जीवन के सभी साधनों का कानून के अनुसार समान रूप से उपयोग करने का अधिकार रखते है। महात्मा गांधी ने देशवासीओं को निडर होना सिखाया था। यह निड़रता उन्ही अंग्रेजो के न्याय-तंत्र की देन है जिनका दिया कानून स्वतंत्र भारत में आज भी चलता है। पर आज आम नागरिक के लिये यही वेहतर है कि वह कानून से डरे, क्योंकि जब कभी शासन व्यवस्था ने उसे किसी कानूनी दाँव-पेंच में उलझा दिया तो पुलिस, अदालत और वकीलों के बीच वह ही नहीं, संभवतः उसकी कई पीढ़ीयाँ भी उलझ जायेंगी। इसीलिये लोग, पुलिस-कचहरी के पचड़े में पड़ने के बजाय अपने लिये चैन खरीदना ज्यादा मुनासिब समझते हैं। कानून का डर जहाँ अपराधी को होना चाहिये, आज कानून का पालन करने वाले हर नागरिक को सता रहा हैं। इस मामले में एक साधारण किसान अगर लपेट में आ गया तो पहिले तो उसकी बैलों की जोड़ी बिक जायेगी, फिर जमीन, और फिर शुरु हो जायेगा कर्ज के बोझ का कुचक्र, पर उसे न्याय नहीं मिलेगा। मिलेगा तो एक अदालत से चल कर दूसरी में अपील। वहाँ से तीसरी में अपील और वहाँ से फिर उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के लिये मुँह जोहती रहेगी और तब तक वह किसान ही नहीं उसका बेटा और संभवतः उसके बेटे का भी बेटा अपनी उम्र पूरी कर चल बसे होंगे। यह स्थिति शुरु के कुछ सालों में नहीं पनपी है अलबत्ता 1969 के बाद हालात दिन-ब-दिन बद से बदतर ही होते चले गये हैं। अगर देश में कानून का शासन दर किनार करके धन या ताकत का शासन लागू होगा तो बाकी सब कुछ तो केवल मृग मरीचिका बन कर ही रह जायेगा। जब तक दो करोड़ सालाना ने नेताओं को पूरी तरह पथभ्रष्ट नहीं किया तब तक राजनीतिक हलके महज राजनीति के अपराधीकरण पर ही चिन्ता जताया करते थे। पर जब से ये दो करोड़ लपलपाने लगे हैं नेताओं के तो बारे ही न्यारे हो गये हैं। आज भारत में करोड़पति नेताओं की संख्या लाखों में है। कई कई तो सैकड़ों करोड़ के मालिक हैं। 1980 के बाद आमदनी बढ़ी। पर 1984-89 में फिर से नीचे आ गई जो 1991 के बाद तो आसमान ही पर पहुँच गई। अब हाल ये है कि चुनाव एक बहुत बड़ा इन्वेस्टमेन्ट हो गया है। उसमें उद्यमियों की सी जोखिम झेलनी पड़ती है। हार का मतलब बर्बाद हो गये, लुट गये। और जीत का मतलब है मालामाल हो गये| लूट ही लूट करने वाले कुशल राजनीतिज्ञों की जमात के दक्ष और कुशल सदस्य बन गये। उस प्रकार का तंत्र पनप तो रहा है पर पूरी तरह जो पनपा तो राष्ट्रीय चिन्ह के नीचे लिखा ‘‘सत्यमेव जयते’’ झुठला जायेगा, क्यों कि फिर कोई कैसे कह सकेगा कि सत्य की विजय होती है।

राष्ट्र के सशक्तीकरण के लिये न केवल शासन का सशक्तीकरण जरुरी है परन्तु नागरिकों का भी सशक्तीकरण जरुरी है। जिन आर्थिक सुधारों के सूत्र के लिये राजीव गांधी के वोल्ड इनिशियेटिव की चर्चा की गई है, मूलभूत परिवर्तन के दृष्टिकोण से किये गये सुधार थे। वे इधर-उधर की टीमटाम या मेकअप के लिये उठाये गये कदम नहीं थे। उनके द्वारा भारत में राजनीतिक हलकों में सोच में जबरदस्त तव्दीली लाई गई। संसद और विधानसभाओं के सदस्यो को आर्थिक उन्नति और औद्योगिक प्रगति में सहायक होने की प्रेरणा दी गई थी। पग-पग खड़ी की जा रही बाधाओं को रास्ते से हटाने की आवश्यक शुरुआत थी। व्यर्थ की हड़तालों, घेराबन्दीयों, तालाबन्दीयों, चक्का-जाम, कलमबन्द आन्दोलनों, काम समय के अनुसार आदि श्रमिकों और कर्मचारियों के अहित के राजनीतिक स्टंटों से दूर कर उनके भले की राह उजागर करने की पहल थी। और सब से ज्यादा तथा सब से बड़ी पहल थी एक निगेटिव और अडियल नौकरशाही को दुरस्त कर रास्ते पर लाने की। इस बात का जिक्र किया जा चुका है कि किस प्रकार राजीव के डी-लाईसेंसिंग के आदेशों को विफल करने के लिये 72 नये पद मांगे गये थे। यह जानते हुए भी कि पदों के सृजन पर पूर्णतः रोक लगी हुई थी। उसका अर्थ था कि पदों के सृजन पर फाईल उद्योग भवन से नार्थ ब्लाक और नार्थ ब्लाक से साउथ ब्लाक और वहाँ से फिर नार्थ ब्लाक होती हुए उद्योगभवन की यात्रा में ही उतना समय िबता देती कि प्रधानमंत्री का एक टर्म क्या दो टर्म भी बीत जाते तो भी कोई सकारात्मक निर्णय नहीं होना था और उस तरह का उदारीकरण लाईसेंस कोटा-परमिट राज को मिटाने से पहिले स्वयं ही कही दम तोड़ देता। राजीव के पहिले फाईलों की गति से जो लोग वाकिफ हैं वे बता सकते हैं कि कैसे-कैसे अनर्गल आब्जेक्शनों के साथ फाईलें एक मंत्रालय से दूसरे मंत्रालय में घूमती रहती थी और वित्त के नाम पर अड़चनों पर अड़चनों का सामना करती रहती थी। बजाय 72 नये पदों की मांग करने के तकनीकी विकास महानिदेशालय (डी.जी.टी.डी) को अपने दफतर में 40% स्टाफ कम करने का प्रस्ताव करना चाहिये था क्योंकि उन्ही के अनुसार डी-लाईसेंसिंग के कारण लाईसेंसिंग का 40% काम घट जायेगा। यह तो एक स्पष्टवक्ता उप-सचिव का उत्साह था कि िबना एक भी पद मांगे उसने सारा डी-लाईसेंसिंग का काम करबाकर महज चार महीने में ही 1,400 करोड़ की लागत के प्रस्तावों को डी-लाईसेंस रजिस्ट्रेशन जारी करवा दिये। उसमें उसकी टीम ने जरुर बहुत मेहनत की और सहयोग दिया। राजीव, जिन्हें ‘‘यंग मैन इन ए हरी’’ कह कर छीटों से नवाज़ा गया था, का एक क्रांतिकारी कदम विफल किये जाने से बच गया। उसके बाद तो उद्योगों के प्रति दक्षिणोमुखी, वाममुखी, चौराहे पर खड़े सभी विचारों के लोगो की सोच में फर्क आ गया। उद्योग लगाने और प्रोत्साहन देने के लिये राज्यों में होड़ मच गई। लेकिन यह शुरुआत भर थी। काम को अभी आगे बढ़ना था।

सुधारों की यह कड़ी यहाँ के बाद कमजोर पड़ती चली गई। जैसा कि यहाँ रवैया रहा है मुख्य लक्ष्य से भटक कर चाल ईधर-उधर की डगर पकड़ने लगी। डिस-इन्वेस्टमेन्ट, जो सार्वजनिक उपकर्मों में लागू किया गया, ऐसा ही एक कदम है। जब राष्ट्रीयकरण किया गया था तब राष्ट्र हित में टैक्स बढ़ाया गया था। जब कर्मचारीयों की मेहनत से उपक्रम लाभ-कमाने लगे तो उन्हें औने-पौने दामों में निजी क्षेत्र के हाथों बेच डाला गया। यह तो नहीं था राजीव का इरादा। असल में पुराने खयालात, तौर-तरीके चोरी छिपे फिर सरकार पर हावी होने लग पड़े और देश की प्रगति में फिर बाधायें खड़ी करने लगे। उनका परिणाम न केवल घटी हुई उत्पादकता के रूप में हुआ,बल्कि सिकुड़ते हुए रोजगार के अवसरों के रूप में भी हुआ है। आज आर्थिक सुधार मंजिल से बहुत दूर खड़े हैं, जब कि उन्हें 1990 के दशक में ही पूरा कर लिया जाना चाहिये था।

रोजगार के साधन कृषि के बाद उद्योग और व्यापार ही हो सकते है। बेरोजगारी भारत की पुरानी बीमारी हैं जो स्वतंत्रता आंदोलन में उम्मीद की घुट्टी पी कर जीती रही, और स्वतंत्र भारत में ‘‘गरीबी हटाओ’’ जैसे नारों की खुराक पीकर। इक्कीसवीं शताव्दी के तेवरों को भांपते हुए राजीव गांधी ने जो कदम उठाये थे उससे रोजगार के अवसर भी बढ़े और गुणवत्ता भी। पर पिछले पाँच साल में रोजगार दिनों-दिन घटा है। समस्या देहात में तो विकराल है ही, शहरों में भी भयावह होती जा रही है। आये दिन हो रहे अपराध बेरोजगारी के दर्दनाक असर की असली दास्तां खुद ही बयान कर रहे हैं। उस पर दुनिया भर की िबगड़ी आर्थिक हालत और उसकी वजह से पैदा हुई मंदी की मार भी अपना असर दिखाने लगी है। वैश्वीकरण के अनुरूप भारत ने भी ‘‘हायर एंड फायर’’ की इजाजत उद्योगों को, विशेषकर सेवा उद्योग को, दे रखी थी। अब वैश्वीकरण का जोर-जोर से ढिंढोरा पीटने वाले देश ही उसके विपरीत काम कर रहे है और एक तरह से पुनःश्च राष्ट्रीयकरण करके अपने लोगों के रोजगार बचाने के लिये वैश्वीकरण के सभी वायदों से मुकर रहे हैं। उसका असर भारतीय नवयुवकों और नवयुवतियों के रोजगार पर पड़ रहा है। वैश्वीकरण के चलते उन्होंने उसे स्वीकार लिया था, पर जिस तरह सैकड़ो कर्मचारीयों को िबना किसी नोटिस के यकायक नौकरी से निकाला जा रहा है, उससे सबकी चिन्ता बढ़ी है। यह आचरण भारतीय व्यावसायिक चलन के विपरीत है और भारतीय श्रमिक कानून भी उसकी इजाजत नहीं देते हैं। फिर विकसित राष्ट्रों की तरह यहाँ कोई सोशल सिक्योरिटी की प्रणाली तो काम कर नहीं रही है कि आज बेरोजगार हुए तो आज ही से अगला रोजगार मिलने तक जीवन-यापन भत्ता मिलना शुरु हो जायेगा। यह भत्ता इतना होता है कि जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये काफी है। इसलिये भारत में हायर एंड फायर पुराने श्रमिक आंदोलनों को पुनर्जीवित कर देगा और वाममार्गी अपनी खिसकती जमीन फिर से पाने के लिये आर्थिक अराजकता को बढ़ावा देंगे। उन्हें तो उदारीकरण कभी पसन्द ही नहीं था। एक तरह से उन्होंने पैसे से नितान्त भारतीय वैचारिकता के अनुरूप मोह नहीं रखा। पर इसका एक उलट परिणाम यह हुआ कि आर्थिक बल और शारीरिक बल का सही-सही आकलन करने में वो इतने असफल रहे कि बीस करोड़ का जिक्र करते हुए एक प्रमुख राष्ट्रीय नेता ने सार्वजनिक तौर पर टेलिविजन पर इतना अचम्मा व्यक्त किया कि उनकी आँखे फटी-की-फटी ही रह गई। जब कि सांसदों की खरीद-फरोस्त में बीस करोड़ का यह आकड़ा तो कब का बासा पड़ चुका है। जब एक सांसद का चुनाव 70-75 करोड़ तक ले बैठता हो, तो भला कोई 20 करोड़ पर क्या विचार करेगा? ऐसे में किसी भी दीगर आर्थिक नीति पर निर्णय करना कोई आसान काम तो नहीं। पर फिर भी अगर ये हायर एंड फायर का मामला शीघ्र ही रोका नहीं गया तो भारतीय अर्थ-तंत्र को प्रभावित किये िबना नहीं रहेगा जिससे भारत के आर्थिक महाशक्ति बनकर उभरने के प्रयास आहत होंगे। सुधारों का यह क्रम तब ही पूर्ण होगा जब भारत में एक ऐसी शासन व्यवस्था कायम हो जाये जिसमें हर व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार उद्योग, व्यवसाय, रोजगार, व्यापार आदि कोई भी गतिविधि अपनाने की सुविधा हो और उसे राज्य का प्रश्रय और प्रोत्साहन मिले – जैसे कि मूल अधिकारों के अन्दर संविधान में समाहित है। एक जीवंत अर्थ व्यवस्था किसी भी राष्ट्र के महाशक्ति बनने की प्राथमिक शर्त है। इसलिये फिर किसी ऐसे नेतृत्व की अपेक्षा रहेगी जो वाक़ई जल्दी से जल्दी सुधारों की रूकी हुए प्रक्रिया को पूरी करे।

आर्थिक सुधार वित्तीय प्रक्रिया में तुरंत ढाँचागत सुधारों की मांग करते है। वित्तीय नियंत्रण कभी एक जरुरत रही है। आज सिर्फ एक मार्ग अवरोध ही है। उसके कारण कोई भी काम तीव्र गति से हो ही नहीं सकता। हर प्रोजेक्ट में समय अवधि बढ़ाया जाना आवश्यक हो जाता जिसका नतीजा लागत में अनअपेक्षित बढोतरी है। जो कई बार तो कई-कई हजार करोड़ तक पहुंच जाती है। उसी तरह टेंडर प्रक्रिया के कारण सरकार को अत्यधिक वित्तीय नुकसान उठाना पड़ता है और चीजें भी घटिया क्वालिटी की ली जाती है। आन्तरिक वित्त सलाहकार की व्यवस्था ईमानदारी से काम न होने देने के लिये ही बनी लगती है। एक जूनियर वित्तीय सलाहकार उस ज्ञान को रखने समझने का दावा रखता है जो किसी प्रोजेक्ट या योजना या कार्यक्रम की बुनियाद होती है। बौद्धिक सम्पदा अधिकार तो प्रभावित होता ही है, पहिले ज्ञान-विहीन सलाहकारों को शिक्षित करना आवश्यक हो जाता है। उस पर भी अगर वो न समझे या समझना न चाहे तो पूरा का पूरा कार्यक्रम ही लटक जाता है। जितनी अक्ल और जितना वित्तीय औचित्य सरकार के उस वित्तीय सलाहकार के पास होता है, उससे अधिक ही किसी भी प्रोजेक्ट या स्कीम के उस विशेषज्ञ के पास होता है जिसे व्यर्थ ही में वित्तीय स्वीकृति के लिये पहिले शुरु में और फिर प्रोजेक्ट चालू होने पर हर बार खर्चा करने के लिये वित्त विभाग के चक्कर काटने पड़ते हैं, जो अनावश्यक होने के साथ-साथ अवमानकारक भी है। अार्थिक सुधार अपनी सही दिशा में तीव्र गति से बढ़ते रहें उसके लिये वित्तीय सुधार एक मुश्त ही कर देना आवश्यक है। वित्त मंत्री या वित्त सचिव की कुर्सी दूसरी कुर्सीयों से ज्यादा चमकीली होने का कोई औचित्य नहीं है। सेवा अगर लक्ष्य है तो सभी काम एक जैसे माने जाने चाहिये।

दरअसल सुधार तो कई अन्य क्षेत्रों में भी किया जाना अत्यावश्यक है। महाशक्ति बनने जा रहे देश का प्रशासनिक ढाँचा भी महाशक्तिवान देशों जैसा ही होना चाहिये। यहाँ तो दुराचरण की इन्तिहा है। प्रशासन सेवा नहीं करता वल्कि पीड़ा देता है, त्रास देता है। प्रशासन के छोटे से लेकर बड़े अधिकारी तक सब व्यक्तिगत हित साधने में जुटे हुए हैं न कि सार्वजनिक हित। अब प्रशासन नेतागिरि की नर्सरी बन चुका है। जिस नेता को ‘‘अंगूठा छाप’’ कह कर प्रशासनिक अधिकारी अपनी उंगलियों पर नचाते थे, वह अब इतना अनुभवी हो गया है कि अफसरी तो करता ही है, बाबुगिरि भी धड़ल्ले से खुले आम करता है और अफसर को अपनी उंगलियों पर नहीं ईशारों पर नचाता है। नेता को कुछ संकेत देने की जरुरत नहीं क्योंकि प्रशासनिक अधिकारी मंत्री की चाहत को पढने का हुनर विकसित कर चुके हैं। इस रोल बदलने से कुछ अफसर राजनीति करने लगे हैं जिससे ईमानदारी से अपनी ड्यूटी कर रहे कर्मचारी का कैरियर चौपट करके भ्रष्ट अधिकारी का कैरियर बनाया जा रहा है। सर्तकता की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। इन राजनीति करने वालों में से कुछ नियमों-कानून की अपने सरकारी नौकरी के कैरियर में होली जला कर सांसद या विधायक और मंत्री तक बन गये हैं। अभी इन्हें हल्के-फुल्के मंत्रालय या विभागों का काम ही सौंपा गया है। पर अफसर रहे ये मंत्री बाबूगिरि से बाज नहीं आते। इनके विभाग कुछ खास नहीं होने के कारण इनके सचिव और दूसरे अधिकारी भी साधारण अफसर भर होते हैं जो इनकी तरह-चतुर राजनीतिज्ञ- अधिकारी नहीं होते और जो कानून विरुद्ध काम करने से हिचकिचाते हैं। ऐसे अफसर रहे मंत्रीयों के इरादे उसके ठीक उल्टे होते हैं। अफसरी का अनुभव उन्हें यह सिखा चुका है कि किसी अधिकारी को कैसी चोट ज्यादा पीड़ादायक होगी। नतीजतन उनके मातहत अधिकारी उच्च रक्त चाप, हृदयरोग, डायविटीज जैसे भयंकर रोगों से पीड़ित  हो रहे हैं। कुछ तो स्वयं सेवा निवृत्ति लेकर चले गये है, कुछ को इनके उत्पीड़न और यंत्रणा ने धरती से ही विदा कर दिया है। ट्रांसफर और सस्पेन्सन, जो कि आचरण नियमावली और सेवा नियमावली में दण्ड नहीं है का खुलकर बेज़ा इस्तेमाल हुआ है। ट्रांसफर तो एक जानी मानी कमाऊ इंडस्ट्री है। राज्यों में तो पुलिस सब-इन्सपैक्टर वल्कि उससे नीचे भी, तक का पोस्टिंग चीफ मिनिस्टर के द्वारा किया जाता है। हालात बेहद निराशाजनक है। प्रशासनिक सुधारों के नाम पर अभी तक अंग्रेजों के उपनिवेशवाद का पोषण करने के लिये बने नियम-कानूनों की झाड़-पोछ भर करके संतुष्टी कर ली गई है, जब कि जरुरत है एक नई व्यवस्था की, नई सोच की। अंग्रेज भारतीय अफसरों को आम आदमी से दूर रख कर उसमें हुकुमत की बू भरते थे ताकि वो उनकी गुलामी सहर्ष सादर स्वीकार कर जनता का शोषण करने में अंग्रेज़ सरकार का सेवक बन कर रह सके। क्या महाशक्ति के रूप में उभरने वाले भारत के लिये ऐसी कंटक व्यवस्था उचित है? क्या अब कोई उस व्यवस्था को ध्वस्त करके नव-निर्माण की जोखिम उठाकर अपने नायकत्व का सबूत पेश करेगा?

अगर इस ओर किसी नेतृत्व ने अगुवाई की तो पुलिस सुधार, जो पहिले ही बिलम्ब का शिकार बन चुके है, पर भी अवश्य कार्यवाही की जायेगी। पुलिस से आम आदमी का नित का वास्ता है। सरकार की आधी आलोचना का कारण ये पुलिस व्यवस्था है। अंग्रेज सरकार पुलिस के डंडे से निहत्थे बेगुनाह भरतीयों को पिटवा कर डराती थी। जिससे वो आलोचना न करें वल्कि दमन तथा अत्याचार को चुपचाप सहते जायें। हमारे राजनीति के खिलाडियों को उससे बढिया और क्या सौगात मिल सकती थी? सो उन्होंने अंग्रेजी पुलिस को अंग्रेंजो से भी ज्यादा दमनकारी बना कर इस्तेमाल किया है। मानकर चलिये कि अगर महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरु, सुभाष चन्द्र बोस, बाल गंगाधर तिलक जैसे परम आदरणीय नेता आज के भारत में कोई आंदोलन कर रहे होते तो उनके सिर पर भारत के राज्यों की पुलिस उसी निर्दयता से डंडे बरसाती जिस निर्दयता से अंग्रेज सरकार की पुलिस ने लाला लाजपतराय के सिर पर डंडे बरसा-बरसा कर उनकी नृशंस हत्या कर दी थी। पुलिस का जनता के प्रति रवैया तो दोस्ताना नहीं हुआ। पुलिस कानून में ही कुछ बदलाव ले आना चाहिए था। भारत पुलिस राज्य नहीं बनने दिया जा सकता। अगर राजनीति अपनी दुष्टता से बाज नहीं आई तो मानकर चलिये जल्दी ही दुष्ट को दुष्ट उसी तरह नष्ट करने लग जायेगा जैसे साँप को साँप निगल जाता है।

सुधारों की जब भी बात उठती है तो विधि-विधान संबंधी सुधारों की आवश्यकता पर भी ध्यान जाता है। आज हालात ये हैं कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश तक सर्वोच्च न्यायालय से यह लिखित अनुरोध करते हैं कि उन्हें किसी दूसरे न्यायालय में भेज दिया जाये क्योंकि वकील उनकी अदालत में मुकदमे नहीं लड़ना चाहते। महत्वपूर्ण मुकदमों में चार्जशीट ही 2800, 3500 या उससे भी अधिक पन्नों की होती है। कुछ कमीशन तो दसों साल तक इन्क्वारी ही चलाते रहते हैं। न्याय की लालसा में नागरिक हलफनामे, वकालतनामे, एप्लीकेशन ही पेश करता रहता है। इतना कागज वेस्ट किया जाता है, इतनी लम्बी-चौड़ी कहानी बनाई जाती है, इतनी गवाहीयाँ होती है, इतनी पेशियाँ पड़ती है, इतनी अपीलें दायर होती हैं कि दुखी नागरिक कंगारु अदालतों पर ज्यादा भरोसा करता है। ये कष्ट है दूसरे समाज की कानूनी प्रक्रिया को अपनाये रखने की जो उनके कानूनो के मुताविक बनाई व्यवस्था है जो उनके मतलब की है। हमारे देश में गरीबी भले ही हो, उन कोर्ट कचहरीयों के चक्कर काटने का टैम (समय) किसी साधारण नागरिक के पास भी नहीं है। यहाँ समय का इतना वैज्ञानिक प्रवंधन दैनिक जीवन में किया गया है कि हर काम के लिये दिन या अवधि या समय निश्चित कर दिया गया है जब पूरा समाज अपने काम ठीक से निपटा सके। उदाहरण के लिये अपने प्रियजनों की आत्मा की शांति के लिये और उन्हें स्मरण करने के लिये एक पखवाड़ा तय कर दिया गया है जब सारा समाज अपने दिवंगत स्वजनों को याद कर ले। उसे श्राद्धपक्ष कहा गया है। उसके लिये रोज-रोज जन्मतिथि और पुण्य-तिथि मनाने की आवश्यकता नहीं है। वल्कि ऐसा करना उचित भी नहीं है। उसके विपरीत आजकल रोज-रोज दो-चार महत्वपूर्ण व्यक्तियों की तरह-तरह की तिथियाँ मनाई जाती हैं। एक तरफ जन्म-तिथि / पुण्य तिथि मनाई जा रही है, दूसरी ओर घर के वुजुर्गो, विशेषकर माँ-बाप की ऐसी दुर्दशा कर रखी है कि सरकार को बुजुर्गों की सहायता के लिये कानून बनाकर उनकी देखभाल का जिम्मा पुत्र-पुत्रीयों पर डालना पडा है। जब किसी काम के लिये रोजाना समय बर्बाद करना भारतीय विचार में अतार्किक है तो ये कोर्ट-कचहरी में रोज का आना-जाना कौन सा न्यायसंगत है? क्या ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती कि श्राद्ध पक्ष की तरह अदालतें भी न्याय किसी एक पखवाडे में करें? उसके लिये नगर-नगर में दण्डाधिकारी और न्यायाधीश मुकर्रर किये जा सकते हैं। जब पैंडेंसी ही नहीं रहेगी तो खर्चा भी संगत ही रहेगा। कम से कम ये कागज का कार्य करना तो कम किया ही जा सकता है। ये तो सतही दृष्टांत हैं पर सत्य यह है कि न्याय के क्षेत्र में सुधार अब ओबरड्यू हो चुके हैं। राष्ट्र की आय का 10 से 15% तक उस विकृत न्याय व्यवस्था की भेंट चढ़ जाता है। समय को रूपये में बदल कर देखेंगे तो यह कोई 2,50,000 से 3,50,000 करोड़ रूपये का हो सकता है। (आधिकारिक आंकड़े अन-उपलव्ध हैं)| यह महंगी न्याय व्यवस्था भारतीयों के काम की नहीं है। भारत के लिये अनुपयुक्त है। जो अनुपयुक्त है उसे पकड़े रहना महाशक्ति की पहचान नहीं है।

अब यह स्पष्ट हो चुका है कि सुधार भारत के महाशक्ति बनने के प्रयास में अचूक अस्त्र हैं। इनका सूत्रधार भले ही चला गया हो, यह जिम्मेदारी अगली पीढ़ी की है कि वह उनके महत्व को समझे, पूरे काम का आकलन करे, किये जा चुके कार्यो का मूल्यांकन करे, अगली रण-नीति तैयार करे, और उसे शीघ्रातिशीघ्र लागू करे। सबसे पहले सदाचार और नैतिक मूल्यों का आदर सम्मान करे। उन्हें प्रोत्साहित करे, उन्हें पुरस्कृत करे और स्वयं ऐसे आचरण करे कि राष्ट्र उससे प्रेरणा पाये। अमरीका स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के नैतिक मूल्यों की रक्षा में लगा प्रजातंत्र है तभी तो उसका एक राष्ट्र के रूप में सम्मान होता है। भारत भी उसी तरह से अपने नैतिक मूल्यों को मजबूती से स्थापित कर शक्तिशाली बन सकता है। बस इतना ध्यान अवश्य रहे कि वाहवाही लूटने वाले नारे भर नीतियों का स्थान न ले लें। नारों का खोखलापन जाहिर होने में ज्यादा समय नहीं लगता। पर नीतियों का असर सदियों तक रहता है। उदार भारत, आर्थिक रूप से सम्पन्न भारत, बलशाली भारत, भूमि पर बसे उस मानव समाज के कुटुम्ब का एक महाशक्तिवान सदस्य बनने की क्षमता से परिपूर्ण है।


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16 मई 2009


चुनाव 2009 भारतीय प्रजातंत्र की राज-नीति का एक महत्वपूर्ण चरण था। सन 2004 से मई 2009 की अवधि में भारतीय राजनीति ने जन मानस में इतना विष-वमन किया कि लोग बेहद निराश हो गये। एक तरफ मँहगाई अपनी मार मार रही थी तो दूसरी ओर अपने अपने अत्यन्त संकीर्ण और स्थानिक एजेन्डा लिये हुये राजनीतिक दल और गठवन्धन शेक्सपीयर के मशहूर पात्र शाईलॅाक की तरह अपने-अपने लिये केवल देश के दिल के समीप का ही मांस काट लेना चाहते थे। हर छोटा-मोटा नेता और दल ऐसे बोलने लग पड़ा मानो भारत में एक नहीं बीसीओं प्रधान मंत्री हों। जिसको जो मंत्रालय लूट-खंसौट में हाथ लगा वह उसी को निचोड लेना चाहता था। सरकारी कामकाज करने के लिये बने नियम आचरण में न लाकर और अपनी-अपनी मनमानी करके इन्होने जन आक्रोश इतना भड़का दिया कि जनता ने अपना मन बना लिया इन्हें सबक सिखाने का।

चुनाव 2009 की सबसे बड़ी उपलब्धि रही कि एक बार फिर से भारत एक हो गया। इस बार उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम, सभी ओर से जनता ने इन विष-व्यापी तत्त्वों को छिटक कर राजनीति से दूर कर दिया। इन्हें इतनी मार पड़ी है कि इनका पुनर्जीवन संभव ही नहीं हैं। यह इन दलों और इनके नेताओं के हित में होगा कि ये अपने विचार, आचरण और चाल बदल कर सामयिक बनें। अपने आप को रुके हुए पानी की तरह बदबू न फैलाने दे और बहते नीर की तरह जनचेतना के साथ चलें। उसी में हो सकता है इनका भला। अन्यथा बेहतर तो यह होगा कि ये दल अपने आप को लुप्त कर लें और इनके नेता इज्जत के साथ रिटायरमेन्ट ले लें। अब ये नहीं, इनके जाये घर की, गाँव की, नगर की, राज्य की, राष्ट्र की और जगत की जिम्मेदारी सम्हालेंगें। पुरानी पीढी के प्रति उस नई पौध की एक ही जिम्मेदारी बचती है – पुरानी का अंतिम संस्कार। अगर सृजन होना है तो पहिले विसर्जन एक अनिवार्य शर्त है। और सृजन तो होना ही है। यह शाश्वत क्रम है। यह स्थिर है, स्थाई है, अपरिवर्तनीय है। फैवीकॉल लगाकर पत्तों को कब तक डाल से चिपकाते रहोगे? मिलने दो उन्हें धूल में जिससे कि काल के इस चक्र में वे पुनः सृजन का उद्घोष कर सकें। जन कर जनक बन सकें।

बस यही रही है चुनाव 2009 की उपलब्धि कि उसने भारतीय राजनीति से विष को बाहर फेंककर उसे विष-रहित कर दिया है। पर जनता का यह न तो लक्ष्य था, न ही प्रथम कार्य। जनता तो चाहती है एक स्वच्छ प्रशासन, ईमानदार सरकार, विकास, आर्थिक उन्नति, सामाजिक सौहार्द, सुरक्षा, स्वस्थ न्यायव्यवस्था, अवसर की समानता, नैतिक मूल्यों की स्थापना, और राष्ट्रकुल में राष्ट्रीय सम्मान। उसके लिये उसे चाहिये था एक ऐसा दल जिसमें वह अपना विश्वास प्रकट कर सके। उसे इस ओर से निराश होना पड़ा। उसकी सारी शक्ति जहर उतारने में नष्ट हो गई। जनता ने किसी भी दल को 16 मई 2009 को उसके विश्वास का पात्र नहीं पाया। इसलिये उसने किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया। उस वास्तविकता को स्वीकारने वाला दल ही भविष्य में अपने अस्तित्व के प्रति आश्वस्त रह सकता है। चुनाव परिणामों से न तो किसी को निराश होना चाहिये और न ही मगरूर। न किसी के दुख का कारण है ये परिणाम और न किसी के हर्षोल्लास का। इनके कारण न कोई डिप्रेशन का शिकार बने, न ही हर्षातिरेक का । ढोल पीटने वाले व्यावसायिक व्यक्ति हैं, वो हर उस दरवाजे तक पहुंच जायेंगे जहाँ उन्हें सत्ता की गंध आयेगी। जो कांग्रेस के लिये ढोल पीटते दिखेंगे, अवसर आते ही वो ही लोग भारतीय जनता पार्टी के दरवाजे पर भी उसी शोर-शराबे के साथ कर्णफोड़ शोर मचायेंगे और सत्ता किसी तीसरे, चौथे, पाँचवे, छठे या सातवे गठबन्धन के यहाँ नजर आई तो वहाँ भी आपको मिल जायेंगे। उसी तरह मीडिया पर कब्जा जमाये लोग भी समझदार होते नजर आ रहे हैं। किसी का मन ही नहीं है सत्य वचन कहने का। आखिर जो दूध से हाथ जला बैठे हों वो अगर छाछ फूंक-फूंक कर छू रहे है तो इसमें आश्चर्य की बात क्या है? अब जीवन के चौथे पहर में कोई नया व्यवसाय अपनाये भी तो कैसे? भला इसी में है कि सत्ता से जो मिलता है लिये चले जाओ। सत्ता ने पहिले भी लोगों को 100 या 200 या 300 मिलियन डालर तक का लाभ उठा लेने दिया है। पर जो राजनीतिक दल ईमानदारी से भारत की जनता, केवल अपने वर्ग की नहीं, सेवा करना चाहते हैं उन्हें जनता के उस संदेश को नजरअन्दाज करने की भूल नहीं करनी चाहिये। ध्यान रहे, भारतीय जनता निर्णय करना जानती है। जब लोगों ने इन्दिरा गांधी को राजनीतिक रूप से लुप्त हुआ समझ कर, सेवा करना छोड़ जनता से छेड़खानी करनी शुरू कर दी तो, उसी जनता को लाख शिकायतों के बावजूद इन्दिरा गांधी को बहुत जल्दी ही दुबारा सत्तासीन करने में ज्यादा देर नहीं लगी। इस बार स्पष्ट बहुमत के िबना जो गठवन्धन सरकार बनायेगा, उसे इस बात का ध्यान रखना होगा कि भारतीय जनता को निर्णय करने में तनिक भी देर नहीं लगेगी। उसने अपना मत स्फटिक की तरह स्पष्ट कर दिया है कि अब केन्द्र में केवल दो प्रमुख दल ही सत्ता के अधिकारी होंगे। उन पर नजर रखने के लिये कुछ विशेष कौशल के नर और नारी संसद में रहेंगे जिनका दायित्व होगा इन दलों को समय-समय पर इस बात का एहसास कराने का कि वो प्रोबेशन पर है, कि उन पर नजर रखी जा रही है, कि उनके काम-कारनामे-आचरण-दुराचरण-वाणी-दुर्वाणी की सतत मानीटरिंग और समीक्षा की जा रही है। ज्ञातव्य है कि 2009 का भारत नारे-पोस्टरों-शराब-रूपया के प्रलोभनों से बहुत आगे निकल चुका है। यह भी ज्ञातव्य हो कि राजनैतिक विचारधारा, आर्थिक विचारधारा, धार्मिक विचारधारा, सामाजिक विचारधारा, क्षेत्रीयता आदि के नाम पर घृणा फैलाने का व्यापार अब चलने वाला नहीं है। आज कोई राजनीतिक विचारधारा, आर्थिक विचारधारा, या धार्मिक विचारधारा हावी अथवा संगत नहीं है। जैसा पहिले भी कहा है, भारत को अगर कोई एक विचारधारा सुरक्षित और सम्पन्न बना सकती है तो वह है गांधी की विचारधारा जो सबको साथ लेकर चलने वाली है। भारत की आर्थिक मजबूती है यहाँ के लोगों की मेहनत की कमाई खाने की खुद्दारी की लत| यहाँ अन्न उपजता है, जिसके िबना आर्थिक विचारधारा तो क्या टिक सकती है, आर्थिक और शासकीय व्यवस्था ही ध्वस्त हो जायेगी। यहाँ आर्थिक विकास के नाम पर दिनों दिन बढ़ता प्रदूषण, जिसने जल, वायु, जमीन, और जंगल सभी को दुष्प्रभावित किया है, को तुरंत रोकना होगा। भारतीय मूल्यों पर बेहूदा हमले बन्द करने होंगे, जिसमें वातावरण एक प्रमुख अंग है। जैसे नदीयों में गंदगी न डालना, जब कि इन मीठे जल स्रोतों में नगर की गंदगी, कूड़ा सभी कुछ बहाकर इन्हें गन्दे नालों में बदला जा रहा है। शुष्क जलवायु क्षेत्रों में पेड़ काटने पर प्रतिबन्ध और कड़े किये जाना आवश्यक है।

पर राजनैतिक दल की अपेक्षा नेता से ऐसी आशा करना अधिक तर्क संगत लगता है। दलों में बहुमत होता है। किसी भी िबन्दु पर समर्थन और विरोध के स्वर एक साथ उठते हैं। इनके कारण निर्णय करना मुश्किल है। इसीलिये देश को आवश्यकता है एक निर्णायक नेता की। एक ऐसा व्यक्ति ही देश का नेता बन सकता है जिसमें नायकत्व की क्षमता हो, जो नायक के गुणों से परिपूर्ण हो और उसके दायित्वों का पालन करने के लिये प्रतिबद्ध हो। चुनाव 2009 में जनता ने किसी भी उम्मीदवार को उस कोटि में रखने योग्य नहीं पाया। अगर ऐसा होता तो, जनता का मत उस नेता के नाम पर उस दल को स्पष्ट बहुमत दिला सकता था। अब अगर एक ऐसे दल  का नेता जो देश के विभाजन के लिये जिन्ना को जिम्मेदार ठहराता आया हो, और िबल्कुल सही हो, यकायक जिन्ना को महात्मा गांधी बनाने का प्रयास करने लगे, तो जनता उस पर विश्वास कैसे कर ले? क्यों कर ले? दूसरी ओर एक ऐसा दल जिसकी सारी शक्तियाँ एक दूसरे व्यक्ति के हाथों में हो और नेता कर दूसरे को पेश करे उस पर जनता विश्वास क्यों करे? जनता ने कहीं प्रयोग किया है तो भविष्य के लिये, पर सम्हल कर। नवयुवक अभी बहुत कुछ सीखेगा। 2004 में ही उसने अपने मन का भय सार्वजनिक किया था कि वह अपने पिता को खो चुका है और अपनी माँ को नहीं खोना चाहता है। उसके विपरीत राजीव गांधी ने प्रधान मंत्री का कार्यभार सम्हालते ही काम करना शुरू कर दिया था। उसके पास निजी अनुभव था, कौशल था, दक्षता थी। एक अन्य बहुत ही महत्वपूर्ण प्लस पाईंट था कि राजीव विवाहित था, उसके बच्चे थे। यह भारत और भारतीय राजनीति में बहुत अधिक महत्व रखने वाला तत्व है, जो आगे चलकर नवयुवक का भविष्य तय करेगा। स्त्री और उसकी शक्ति का आकलन स्वस्थ दृष्टिकोण के लिये आवश्यक है। क्योंकि अक्सर यह माँ-बहिन के प्यार की गुनगुनी धूप से अलग होता है। उस अनुभव से किसी भी राजनैतिक जिम्मेदारी को उठाने से पहिले गुजर लेना लाभकारी और बाद में गुजरने से हानिकारी भी हो सकता है। ऐसे में समय से पहिले नेतृत्व की बागडोर सम्हालना, पकने से पहिले फल में दाँत गड़ाने जैसा होगा। दरबारों में राजकुमारों को दरबारी लोगों से ही नहीं महलों के ड्योडीवानों तक से सतर्क रहना होगा। इसके लिये व्यक्ति की स्त्री पक्षीय पर्सनेल्टी ही उसकी सहायता कर सकती है। सुयोग्य पत्नी संसदीय बहुमत से कहीं अधिक मूल्यवान हैं। क्योंकि अदृश्य हमलों को वह आँख पर पट्टी बाँध कर भी देख सकती है। पति को समय रहते सतर्क कर सकती है और खतरों से उसकी रक्षा कर सकती है। बल्कि उसके प्रभा-मंडल के ताप से छोटे-मोटे खतरे तो अपने-आप ही दूर रहते हैं क्योंकि पास आने की उनकी हिम्मत ही नहीं पड़ती है और तप भंग करने के लिये भेजी गई उर्वशी या विषकन्या हमला करने में असफल रहती हैं। िबना पत्नी रूपी रक्षा कवच के कोई भी राज-पुरुष सुरक्षित नहीं है। विशेषकर प्राचीन परम्परा से लेकर आधुनिक जासूसी परम्परा तक में सौंदर्य-प्रहार और मोहिनी रूप सत्ताओं के पास एक अचूक अस्त्र के रूप में होता हैं। उसके लिये बाकायदा राजकोष से धन उपलब्ध कराया जाता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कितने राजनेताओं को मिटयामेट कर चुका है यह अस्त्र!

ऐसी स्थिति में नेतृत्व की कमी भारत को खलती रहेगी। हमारे पड़ौस में सुरक्षा का जो वातावरण बन रहा है उससे चिन्ता बढ़ रही है। विश्व में आर्थिक ऊथल-पुथल थमने वाली नहीं है। इसकी जगह नया विश्व आर्थिक तंत्र स्थापित होगा, जिसमें विकासशील देशों के शोषण के नये तरीके काम में लाये जायेंगे। भारत जैसे देश को जल्दी ही अपनी आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करना होगा। उसमें आशातीत सफलता के लक्षणों से ज्यादातर लोग उत्साहित है। सैंसेक्स तो 16 मई के पहिले ही उछल गया। उद्योग-व्यापार संघ भी 16 मई दोपहर के बाद गरमाने लगे हैं। विशेषकर नान-कांग्रेस, नान-बीजेपी की रट लगाने वालों के नान-ऐंटिटी बना दिये जाने पर। उन्हें भयमुक्त होने का हर्ष अधिक है जो रट बन्द होने के कारण संभव हुआ है। पर नेतृत्व की अपेक्षा अभी भी है। चाटुकारों और ढोल बजाने वालों को छोड़ दें तो यह गहरी चिन्ता का विषय है कि राष्ट्र में अभी भी नेतृत्व की कमी है और यह कमी निकट भविष्य में दूर होती दिखाई नहीं देती। जोड़-तोड़ की राजनीति से भारतीय मानस घृणा करता है। उसे उसने बहुत बुरी तरह पीटा है इस चुनाव में। उसकी अपेक्षा है एक मजबूत दल और एक विश्वसनीय नेतृत्व – कम से कम राजीव गांधी जैसा तो….


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भारत 2050 विश्व


भविष्य कम चुनौतीपूर्ण नहीं होगा। इसके लक्षण उभर रहे हैं। कल तक वैश्वीकरण के प्रखर हिमायती अब भारत से हाईटैक के क्षेत्र में खतरे से अपने लोगों को सावधान करने में जुटे हैं। भारत तो अभी कहीं नहीं पहुंचा है। बस एक झलक दी गई है कि उसकी क्षमता क्या है। हमें उदारीकरण, वैश्वीकरण और विश्व व्यापार संगठन (डब्लू.टी.ओ) की नसीहत देने वाले अब खुद ही इन अन्तर्राष्ट्रीय करारों से मुकरने लगे हैं। मुक्त व्यापार की अच्छाई हमें समझाने वाले देश कल तक हमको नसीहत देते नहीं थकते थे, पर खुद ही मुक्त व्यापार को अवरूद्ध करने के लिए नॉन-टैरिफ बाधायें खड़ी कर अपने हितों को ही सुरक्षित कर रहे हैं। उनकी आस्था इन मानवीय धारणाओं में शनैः शनैः कम होती जायेगी। 2050 ईस्वी में शांति बने रहने दें तो बहुत बड़ी बात होगी। विश्व के नेताराष्ट्र/लीडिंग नेशनस ऑफ द वर्ल्ड  जिन्हें अपने गुटों का समर्थन प्राप्त है, अन्य पिछड़े या उन्नतिशील राष्ट्रों के लिए परोपकार नहीं करेंगे। वो परोपकार का सहारा भी केवल व्यापारिक हित साधन के लिए करेंगे। उनसे अन्यथा आशा करना तर्कसंगत भी नहीं है। विशेषकर भारत जैसे राष्ट्र के लिए। भारत को महान शक्ति बनने से रोकने के लिए अभी से उससे होने वाले हाईटैक खतरे की घंटी बजाकर ये महाशक्तियाँ इस बड़े राष्ट्र को मात्र अपना बाजार ही बने रहने देना चाहेंगे। उसके लिए वे प्रजातंत्र, आर्थिक उदारीकरण, मानव अधिकार जैसे किसी भी नेक ख्याल का वाणिज्यिक लाभ उठाने के लिए तत्पर रहेंगी।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, इन राष्ट्रों द्वारा किये गये विनाश के बाद, इन्होंने आर्थिक पुनर्निर्माण का नारा लगाया। आर्थिक उन्नति को शीर्ष पर बिठा दिया। इनके हाथ लगी टैक्नोलॉजी और उपकरण आदि की बिक्री के लिए इन्हें मार्केट तो चाहिए ही था। आर्थिक उन्नति के नाम पर इन्होंने उन्नतिशील राष्ट्रों में सामाजिक उथल-पुथल को उकसाया। शीत युद्ध का लम्बा दौर पूरे मानव समाज के लिए अहितकर रहा है। सामाजिक मूल्यों के क्षरण ने ऐसी-ऐसी नई-नई विकट परिस्थितियां पैदा करके रख दी जिनका समाधान आज तक नहीं किया जा सका है।

इसने सबसे बड़ा खतरा पैदा किया नशीली वस्तुओं के अन्तर्राष्ट्रीय अवैध बाजार को बढ़ावा देकर। इस कुकर्म से जो अकूत सम्पत्ति इकट्ठी की गई, उसका इस्तेमाल करके कई राष्ट्रों में सत्ता पलट दी गई। लेकिन इसका सबसे भयंकर और दुखदायी परिणाम हुआ आतंकवाद के जन्म के रूप में।

आतंकवादक नामक एक ऐसा दैत्य जन्म ले चुका है जिसे ध्वस्त करना अब किसी के बस में नहीं है। आज भी दुनिया की तथाकथित महाशक्तियाँ इसे बहुत छोटा करके देखती अगर इसका प्रकोप उन्हें पीड़ित न करता। 11 सितम्बर को दुनिया के अभेद और अजेय समझे जाने वाले राष्ट्र अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले ने सबकों चौंका दिया। विकसित राष्ट्रों ने खतरे को फिर भी ठीक से नहीं आंका, वरना वो उन कदमों को नहीं उठाते जो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने उठाये। उनके इन कदमों का जवाब दिया गया लंदन की मेट्रो ट्रेनों में बम धमाके करके। इसके बाद फ्रांस, जर्मनी, ऑस्टेॅलिया, रूस आदि सभी इस आतंकवाद की लपटों में झुलसने लगे। मुट्ठी भर आतंकवाद इन सभी बड़ी ताकतों से बड़ा साबित हुआ। अब इसकी धमकी ही से बड़ी-बड़ी सरकारें डर जाती हैं। अमरीका के राष्ट्रपति पाकिस्तान में लुकछिप कर जाते हैं। अमरीकी रक्षा मंत्री और प्रेजीडेन्ट इराक में अघोषित यात्रा पर पहुंचते हैं। इंग्लैंड में कोन्डोलीज़ा राईस की यात्रा के विरोध में जुलुस निकाले जाते हैं। क्लैश ऑफ सिविलाईजेशन्स में अपना परचम लहराता देखने वाले दूसरों की ताकत देख सहम जाते हैं। फिनलैंड के विदेश मंत्री को इस्तीफा देना पड़ता है। एक नया बखेड़ा खड़ा हो गया है जिसने विश्व शांति को खतरे में डाल दिया है। अगर शक्तिशाली राष्ट्रों को अपना वर्चस्व क्षीण होता नजर आया तो वो पूरी विश्व व्यवस्था को बदलने से भी नहीं चूकेंगे। इसका इन्तजार वो सन 2050 से आगे तक नहीं कर सकेंगे।

भारत ने अपने बलबूते पर बहुत कुछ कर लिया है। हमारी ओर उछाले गये आतंकवाद का हमने हिम्मत से मुकाबला किया। उसके बावजूद सामान्य कानून व्यवस्था और जनतांत्रिक प्रणाली के अन्तर्गत हमने व्यवहार किया। हमने अभी हिंसा और आतंक को नहीं अपनाया है। शांतिप्रियता और अहिंसा भारत के पराधीन होने की एक बड़ी वजह रही है। आज भी गांधीवादी मूल्यों में आस्था रखने वालों को ‘‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’’ कहकर ताने मारे जाते हैं। जो लोग धार्मिक आस्थाओं और भावनाओं पर चोट होने के नाम पर सहज ही हिंसक हो उठते हैं वो अहिंसा के पुजारियों के देवी-देवताओं के बारे में घृणित कृत्य करके उनके संयम और धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं। ऐसा नहीं है कि अहिंसक लोग शस्त्र धारण नहीं कर सकते। आवश्यकता पड़ने पर कर सकते हैं। ऐसी भूलें भारत में आततायी और विदेशी आक्रांता कर चुके हैं, किन्तु उसके परिणाम उन्हें भुगतने पड़े। ताजा इतिहास से एक ही उदाहरण काफी होगा। अंग्रेज न केवल भारत से निकाले गये किन्तु उनका साम्राज्य ही नष्ट हो गया। आज इंग्लैंड आतंकवाद से आक्रांत एक छोटा सा राष्ट्र है। अन्तर्राष्ट्रीय नैतिक मूल्यों में और अधिक गिरावट आई तो स्थितियां ज्यादा विकट हो जायेंगी। युद्ध और शांति के क्षेत्र में सभी सही-गलत कामों को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता है, ठहराये जाने का प्रयास भी नहीं होना चाहिए।

दुनिया के लोग क्या चाहेंगे, यह समझना जरूरी है। सरकारें कुछ भी चाहे, लोग सुख से जीना चाहेंगे। वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम के मुकाबले में वर्ल्ड सोशल फोरम का खड़े हो जाना स्पष्ट संकेत दे रहा है कि लोग क्या चाहते हैं। सरकारें सौदागर न बनें तो ही श्रेयस्कर है। सामाजिक जीवन को किसी भी हालत में ग्रहण न लगने दिया जा सकता है। आर्थिक उन्नति भी केवल बेहतर सामाजिक जीवनयापन करने के लिए एक जरूरत है। इससे ज्यादा कुछ नहीं। सामाजिक जीवन का आधार है प्रेम, शांति, सौहार्द, सहकार, सहअस्तित्व। इसमें न तो हथियार कुछ कर सकते हैं न ही अर्थ ही अकेला कुछ कर सकेगा।

भारत देव भूमि है। प्रकृति ने यहाँ सब कुछ उपलब्ध कराया है। अपनी आर्थिक उन्नति करते हुए हम अपने राष्ट्र को इतना शक्तिशाली बना सकते हैं कि इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों का मुकाबला कर सकें। इसके लिए गांधी जी द्वारा प्रतिपादित नैतिक मूल्यों को दैनिक व्यवहार में लाना ही होगा। आर्थिक उन्नति के नाम पर लूट-डकैती-हत्या-भ्रष्टाचार सब कुछ साठ साल की अल्प अवधि में ही देश में गहरी जड़े जमा चुका है। यह नोट करने लायक बात है कि कैमरे के सामने देश की राजधानी दिल्ली के नेता छाती ठोककर कहते हैं कि यहांँ निर्मित भवनों और दुकानों का 98% अवैध निर्माण है। राष्ट्रीय चरित्र का ऐसा अपकर्ष भारतीय इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। इस चरित्र के साथ चुनौतियों का मुकाबला करने के बजाय हमारे लोग देश को परतंत्र करवाने में भी नहीं हिचकेंगे। अभी भी लाखों भारतीयों ने अपना पैसा अवैध रूप से विदेशों में रख छोड़ा है। यू.एन.ओ., वर्ल्ड बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, यूनीडो, यूनीसेफ, आइ.एल.ओ., डब्ल्यू.एच.ओ. जैसे संगठनों में नौकरी पाने या करने वाले देश की नीतियों को बदलने से भी नहीं हिचकिचायेंगे। देश ने जो थोड़ी बहुत तरक्की की है उसका श्रेय हमारी निष्ठा, चरित्र, लगन, सेवा, मेहनत और राष्ट्रीयता की भावना को  जाता है। अगर इन गुणों को बढ़ावा नहीं दिया गया तो आर्थिक रूप से उन्नत भारत भी महाशक्तियों के कुचक्र का शिकार होकर 2050 तक राष्ट्रकुल में अपने ऊंचे स्थान से हट जायेगा। हम गुट निरपेक्ष रहे हैं इसलिए हमारे साथ दूसरे लोग आयेंगे इसकी संभावना कम ही है। जो हमारा साथ देंगे उनकी जिम्मेदारियां हमें निभानी पड़ सकती हैं। लेकिन अगर हम अंदर से मजबूत होते चले जायें तो 2050 तक भारत विश्व का सबसे ज्यादा सम्माननीय और विश्वसनीय महाशक्ति बन जायेगा। फिलहाल हम सारी व्यवस्था की चूल हिला चुके हैं। विधायिकायें हों या कार्यपालिकायें या न्याय-पालिकाएं या प्रशासन, जनता का विश्वास सब पर से उठ चुका है। इसके लिए नैतिक नेतृत्व ही एकमात्र विकल्प है।

ऐसे नेतृत्व में जवाहरलाल नेहरू की नैतिकता, इंदिरा जी की दृढ़ता, राजीव की हिम्मत का समावेश जरुरी होगा। ऐसा नेतृत्व महात्मा गांधी के दर्शन का पालन करेगा तभी सैकड़ों करोड़ भारतवासियों का विश्वास प्राप्त कर सकेगा। विशुद्ध भारतीय परम्परा में यह कार्य सेवा का है, सन्यास का है। भारतीय नेतृत्व वो ही सम्हाले जो खुदपरस्ती, कुनबापरस्ती, जात-बिरादरीपरस्ती से ऊपर उठ चुके हों और जो राष्ट्र के लिए कुछ करना चाहते हैं। ऐसा वही कर सकते हैं जो समाज-ऋण निवृत्त होने की कामना करते हैं।

2050 का भारत इतना वैभवशाली और सम्पन्न बन सकता कि उससे अपनी प्रतिष्ठा और सम्पन्नता संभाले नहीं सम्हाली जायेगी। चरित्रवान नागरिक समाज ही उसकी सुरक्षा की इकलौती गारंटी है।

इति

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